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Home राष्ट्रीय

1971 के 6 हीरो, जिनके नाम कभी नहीं भूल पाएगा पाकिस्तान!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 16, 2023
in राष्ट्रीय
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6 heroes of 1971
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नई दिल्ली: भारतीय सेना 16 दिसंबर को ‘विजय दिवस’ के रूप में मनाती है. 1971 में पाकिस्तानी फौज ने भारत के साथ चले 13 दिनों के युद्ध में बुरी तरह मात खाने के बाद सरेंडर किया था. इस जंग में जमीन, आसमान और समंदर से भारतीय सेना पाकिस्तानी सैनिकों पर उनका काल बनकर टूटी थी. थल सेना, वायु सेना और भारतीय नौ सेना ने जिस साहस का परिचय दिया था उनके कुछ जाबांजों का नाम सुनकर ही पाकिस्तानी जनरलों और सैनिकों के दिल दहल जाते थे. आइए आपको उन पांच परमवीरों के नाम और उनकी यशोगाथा बताते हैं जो इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में लिखी गई है.

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भारतीय रणबांकुरों की बहादुरी और वीरता ने 1971 के युद्ध में भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाई. भारतीय सेना के पूर्वी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा को 1971 के युद्ध में भारत की जीत का सबसे बड़ा नायक माना जाता है. उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना को करारी शिकस्त दी और बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

लांस नायक अलबर्ट एक्‍का

यूं तो लांस नायक अलबर्ट एक्‍का को चीन के साथ भी लड़ने (India China War) का मौका मिला और पाकिस्‍तान को धूल चटाने की खुशनसीबी उनके हिस्‍से आई. एक्का का जन्म झारखंड के गुमला में 27 दिसंबर 1942 को हुआ. 1962 में बिहार रेजिमेंट में भर्ती हुए. 1971 के India Pak War में जख्मी होने के बावजूद उन्होंने पाक फौज के छक्के छुड़ा दिए. 2 और  3 दिसंबर 1971 की दरमियानी रात एक्का ने देखा कि विदेशी लाइट मशीन गन उनके साथियों को नुकसान पहुंचा रही थी. वो अपनी जान की परवाह ना करते हुए दुश्मन सेना के बंकर की ओर बढ़े. जहां से मशीन गन ताबड़तोड़ गोलियां बरसा रही थी. एक्का ने हैंडग्रेनेड से पाकिस्तान का बंकर उड़ा दिया. जंग में वो शहीद हो गए थे. उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों

चीन पहले से घात लगाए बैठा था. 3 दिसंबर, 1971 को भारत-पाकिस्‍तान में जंग शुरु होने के बाद देश के रक्षा प्रतिष्ठानों पर हमले का खतरा था. इस दौरान श्रीनगर एयरबेस को निशाना बनाया गया. 14 दिसंबर को पाक एयरफोर्स ने नापाक हरकत की तब भारतीय वायुसेना के फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों ने अकेले ही दुश्‍मन के 6-6 फाइटर जेटों को भगा दिया. सेखों भारतीय वायुसेना के इकलौते ऐसे जवान हैं जिन्‍हें परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया. उन्हें भी मरणोपरांत ये सर्वोच्च सम्मान दिया गया.

सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल

1971 की जंग में अरुण खेत्रपाल की बटालियन शंकरगढ़ में थी. 16 दिसंबर की सुबह 8 बजे पाकिस्तानी सेना ने सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की बटालियन पर हमला बोला. पाक फौज अमेरिकी पैटन टैंकों पर  थी. उन टैंको और PAK की जीत के बीच नौजवान अफसर अरुण खेत्रपाल था. बस 2 टैंकों के साथ आगे बढ़कर खेत्रपाल ने दुश्मन से लोहा लिया. मौत सामने थी, लेकिन खेत्रपाल के कदम नहीं रुके. युद्ध में अरुण ने कुल 10 पाकिस्तानी टैंकों के परखच्चे उड़ा दिए थे. जब उनका टैंक जलने लगा, तो उन्हें टैंक छोड़कर निकलने को कहा गया. उनका जवाब था, ‘नहीं सर, मैं अपना टैंक छोड़कर नहीं आऊंगा. मेरी मेन गन काम कर रही है और मैं दुश्मनों को छोड़ूंगा नहीं.’ ये अरुण की बहादुरी का ही नतीजा था कि पाक सेना के पांव उखड़ गए. परिवार को उनकी शहादत के बारे में 26 दिसंबर को तब पता चला. खेत्रपाल को अदम्य साहस के लिए  परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.

मेजर होशियार सिंह

1971 की भारत-पाक जंग में मेजर होशियार सिंह की बटालियन, 3 ग्रेनेडियर्स को बसंतसर में एक पुल बनाने का ऑर्डर मिला था. 16 दिसंबर को पाकिस्तान ने 3 बार घात लगाया. मेजर सिंह अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे. 17 दिसंबर को पाकिस्‍तान ने फिर हमला किया. मेजर सिंह की मशीन गन पोस्‍ट के पास शेल गिरा उनके जवान घायल हुए. वो खुद मशीन गन चलाने लगे. उनकी बहादुरी से दुश्‍मन उल्‍टे पांव भाग खड़ा हुआ. बुरी तरह से जख्‍मी सिंह ने कहा – चाहे जो हो जाए वो मैदान छोड़कर नहीं जाएंगे. आखिरकार जब संघर्ष विराम का ऐलान हुआ, तब सिंह को अस्‍पताल पहुंचाया गया.

सीमैन चिमन सिंह यादव

सीमैन चिमन सिंह यादव को मुक्ति वाहिनी को ट्रेनिंग देने का काम मिला था. 8 और 11 दिसंबर के बीच उन्‍होंने मोंगला और खुलना में चलाए गए ऑपरेशन में हिस्‍सा लिया. उसी दौरान उनकी नाव डूबी वो जख्मी हो गए. भारी फायरिंग के बीच वह अपनी पार्टी के दो लोगों को तट तक पहुंचाने में कामयाब रहे. उन्हें देखने देश की तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी अस्पताल पहुंची थी. उनकी ये तस्वीर उस दौर में बहुत वायरल हुई थी.

मेजर बलराम मेहता

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारत के पूर्वी मोर्चे पर लड़ा गया था. ब्रिगेडियर बलराम सिंह मेहता 45वें कैवलरी टैंक स्क्वाड्रन से थे. उन्होंने न केवल बांग्लादेश के लिए लड़ाई लड़ी बल्कि टैंक स्क्वाड्रन का नेतृत्व भी किया और भारत को जीत दिलाई. उनके बटालियन के साथियों ने उनसे एक किताब लिखने का आग्रह किया और तब बलराम सिंह मेहता ने ‘द बर्निंग चाफ़ीज़’ लिखी, जिसमें गरीबपुर की लड़ाई को दर्ज किया गया था. इसी किताब पर एक बॉलीवुड मूपी पिप्पा बनी है.

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