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Home राज्य

हिमाचल प्रदेश: ‘करोड़पति चायवाला’ जिनकी तुलना मोदी से हो रही है!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
November 1, 2022
in राज्य, विशेष
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Sanjay Sood himachal
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शिमला : “मैं कह सकता हूं कि मैं सातवें आसमान पर अपने आप को महसूस कर रहा था. क्योंकि मेरे जैसे छोटे कार्यकर्ता को इतना सम्मान देना, शिमला शहरी जैसी हॉट सीट से टिकट देना, ये बहुत ही सम्मान की बात है. ये मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता कि उस वक़्त मैं किस स्थिति में था.”

ये कहना है हिमाचल प्रदेश की शिमला शहरी विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उम्मीदवार संजय सूद का. संजय सूद को इस सीट पर चार बार से विधायक और मौजूदा बीजेपी सरकार में मंत्री सुरेश भारद्वाज की जगह टिकट दिया गया है. सुरेश भारद्वाज का टिकट शिमला शहरी सीट से कटा लेकिन उन्हें कुसुम्पटी विधानसभा सीट से टिकट दिया गया है.

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संजय सूद की शिमला के ओल्ड बस स्टैंड पर चाय की दुकान है. वो कहते हैं कि उन्हें टिकट मिलने की इकलौती वजह बीजेपी है, क्योंकि सिर्फ बीजेपी ही ये काम कर सकती है. संजय सूद बताते हैं कि उन्होंने कॉलेज में अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए अखबार बेचे और यही वो वक्त था जब उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़ने का मौक़ा मिला और यहीं से राजनीति में उनकी नींव की शुरुआत हुई.

संजय सूद दो बार पार्षद रह चुके हैं और उनका मानना है कि जनता के बीच उनकी इतनी पहुंच है कि बीजेपी ने उन्हें इस सीट पर चार बार लगातार विधायक रह चुके सुरेश भारद्वाज की जगह टिकट दिया है. संजय सूद ने अपने नामांकन में जो हलफ़नामा दिया है उसके मुताबिक़, उनकी कुल संपत्ति क़रीब तीन करोड़ रुपये है. हलफ़नामे में उन्होंने खुद को कारोबारी और समाजसेवक बताया है.

हलफ़नामे के मुताबिक़, संजय सूद, उनकी पत्नी और बेटी के पास कुल चल संपत्ति 1.1 करोड़ रुपये और कुल अचल संपत्ति 1.74 करोड़ रुपये है. संजय सूद के परिवार के पास सराहन और रामपुर में भी ज़मीनें हैं. उनके पास शिमला में भी प्रॉपर्टी है.

क़रीब तीन करोड़ की संपत्ति वाले चायवाले उम्मीदवार पर जनता सवालिया निशान भी उठा रही है. लेकिन संजय सूद जनता के बीच फैली इस बात पर कहते हैं, “मेरे बारे में कौन क्या कहता है, मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मेरे पैरो में कितने छाले हैं, सिर्फ मुझे दिख रहा है. जनता को क्या मालूम है उसका मैं कुछ जवाब नहीं दे सकता.”

संजय सूद को शिमला शहरी विधानसभा सीट से टिकट दिए जाने को लेकर कई तरह के सवाल भी उठ रहे हैं. बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच भी इसे लेकर असंतोष दिखता है. प्रदेश की राजधानी की सबसे अहम सीट संजय सूद को देने और चार बार के विधायक का टिकट शहरी सीट से काटे जाने को लेकर समर्थकों में रोष भी है. हालांकि ये विरोध दबी जुबान से है. पार्टी कार्यकर्ता खुलकर इस बारे में बात करने से बच रहे हैं.

संजय सूद का चुनावी एजेंडा क्या है?
संजय सूद दो बार पार्षद रहे हैं लेकिन विधानसभा सीट पर उनकी पकड़ कितनी मज़बूत है इसे लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. शिमला शहरी सीट पर सुरेश भारद्वाज के समर्थक उनसे नाराज़ दिखते हैं. हालांकि संजय सूद का कहना है कि बीजेपी में लोग चेहरा देखकर वोट नहीं करते. लोग पार्टी का चुनाव चिन्ह देखकर वोट करते हैं.

संजय सूद ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “बीजेपी में पर्सनल सपोर्ट बेस किसी का नहीं होता. यहां कमल के फूल के समर्थक होते हैं. मैं यहां से दो बार पार्षद रह चुका हूं, मैंने लोगों के काम किए हैं, सुरेश भारद्वाज जी भी अब मेरे प्रचार के लिए काम कर रहे हैं शिमला में, तो बीजेपी के समर्थक चेहरा नहीं कमल का निशान देखकर वोट करेंगे.”

कांग्रेस उम्मीदवार भी करोड़पति
संजय सूद को टिकट दिए जाने और उनकी चायवाला की छवि के बारे में शिमला शहरी से कांग्रेस के उम्मीदवार हरीश जनार्था कहते हैं कि बीजेपी में अंदरूनी कलह की वजह से सुरेश भारद्वाज का टिकट काटा गया और संजय सूद को टिकट मिला. वो कहते हैं, “वो तो बस नाम के चायवाले हैं. चाय की दुकान तो इनके भाई चलाते हैं. मुझे नहीं पता ये क्या करते हैं. उन्होंने जो संपत्ति घोषित की है उसके हिसाब से तो वो करोड़पति हैं. ऐसे आदमी के लिए बीजेपी ने एक वरिष्ठ और अनुभवी नेता का टिकट काट दिया.”

हरीश जनार्था कहते हैं, “मैं 2002 से, यानी पिछले 20 साल से शिमला की जनता की सेवा कर रहा हूं. पिछली बीजेपी की सरकार में जो काम यहां नहीं हुए, बिजली, पानी की समस्या हो या फिर टूरिस्ट डेस्टिनेशन होने की वजह से यहां सुविधाएं बढ़ाने की बात हो, विधायक बनकर मैं ये सब ठीक करूंगा. मैं यहां पार्षद भी रहा हूं और दो बार डिप्टी मेयर रहा हूं.”

वो कहते हैं, “मैं बचपन से शिमला में रहा हूं. मुझे यहां की एक-एक वार्ड की समस्याएं पता हैं. वो मैं दूर करने की कोशिश करूंगा.” कांग्रेस उम्मीदवार हरीश जनार्था भी करोड़पति हैं. उन्होंने चुनाव आयोग को जो हलफ़नामा दिया है उसके मुताबिक़ उनकी कुल चल और अचल संपत्ति 4.51 करोड़ रुपये है. दिलचस्प बात यह है कि 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने हरीश जनार्था को टिकट नहीं दिया था और उन्होंने पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा था.

इस चुनाव में बीजेपी उम्मीवार सुरेश भारद्वाज जीते थे और कांग्रेस से चुनाव लड़ने वाले हरभजन सिंह भज्जी तीसरे स्थान पर थे. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले चुनाव में जनार्था बेद कम वोटों से पिछड़े थे, इसलिए कांग्रेस ने इस बार उन पर भरोसा जताया है.

विधानसभा एक नज़र में
शिमला शहर विधानसभा सीट पहले शिमला के नाम से ही जानी जाती थी, लेकिन साल 2008 में परिसीमन के बाद इसे शिमला शहर और शिमला ग्रामीण दो सीटों में बांट दिया गया. शिमला शहर सीट पर काफी समय तक बीजेपी का कब्जा रहा है. साल 1967 में शिमला सीट पर जनसंघ के उम्मीदवार ने जीत हासिल की थी. साल 1998 में बीजेपी से नरेंद्र बरागट इस क्षेत्र के विधायक बने थे.

इसके बाद 2003 में कांग्रेस से हरभजन सिंह भज्जी और 2007 में सुरेश भारद्वाज ने जीत हासिल की और तब से लेकर अब तक इस सीट पर उन्हीं का कब्जा है.

टिकट के पीछे क्या है राजनीतिक गणित?
हिमाचल प्रदेश की राजनीति को करीब से देखने वाले राष्ट्रीय स्तंभकार केएस तोमर कहते हैं कि संजय सूद को टिकट देने के पीछे सबसे बड़ी वजह यह रही है कि सुरेश भारद्वाज ने आरएसएस की लीडरशिप को नाराज़ किया.

वो कहते हैं, “अगर बीजेपी के पास कुसुम्पटी में अच्छा उम्मीदवार होता तो सुरेश भारद्वाज को टिकट ही नहीं मिलता. लेकिन वहां बीजेपी को उम्मीदवार नहीं मिला इसलिए उन्हें मजबूरी में टिकट दिया गया. अगर ये बगावत करते तो बीजेपी को नुक़सान भी होता और शिमला की सीट हाथ से जाने का डर भी होता.”

केएस तोमर यह भी कहते हैं कि शिमला शहरी सीट पर कारोबारियों का प्रभाव रहा है. संजय सूद अपनी इसी छवि को भुनाने का प्रयास करेंगे. लेकिन उन्हें यहां सेब के बागानों में काम करने वाले लोगों की नाराज़गी भी झेलनी पड़ सकती है क्योंकि सेब की खेती करने वाले लोग बीजेपी सरकार से नाराज़ हैं. अगस्त में इन लोगों ने विधानसभा का घेराव भी किया था.

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