नई दिल्ली : राजधानी दिल्ली में हर वर्ष मानसून से पहले सभी विभाग जोर-शोर से यह प्रचारित करते हैं कि वह नालों की सफाई कर रहे हैं। कई विभागीय बैठक भी होती हैं। जिनकी कथित रूप से 15-20 दिन में समीक्षा भी की जाती है, लेकिन जब वर्षा होती है तो स्थिति वहीं होती ढाक के तीन पात। यानी सड़कों पर पानी।
कहीं अंडरपास पर डूबी बस खड़ी दिखाई देती है तो कई कालोनियों में घरों में पानी भरा। जिसकी प्रमुख वजह नालों की सफाई में होने वाला भ्रष्टाचार और लापरवाही ही है। अगर, लापरवाही न हो और भ्रष्टाचार न हो तो स्थिति ऐसी न हो जैसी कि हर वर्ष एनसीआर में होती है। दिल्ली नगर निगम के पूर्व महापौर फरहाद सूरी की जागरण संवाददाता निहाल सिंह से बातचीत पर आधारित
दिल्ली की बात करें तो इसमें बहुत बड़ा क्षेत्र ऐसा है जो अनियोजित बसा हुआ है। जहां पर आबादी घनी रहती है, नालों की क्षमता उतनी अधिक नहीं है। ऐसे में तेज नाले की सफाई हो भी गई है तो तेज वर्षा होते ही सड़क और गली का जलमग्न होना निश्चित है। क्योंकि नाले की चौड़ाई उस प्रकार से नहीं है कि वह पूरी कॉलोनी में बने घरों पर वर्षा के बड़े नालों तक पहुंचा सके, जबकि नियोजित ता अनियोजित कॉलोनियों की समस्या यह है कि नालों की सफाई में लापरवाही और भारी भ्रष्टाचार होता है।
नालों की सफाई का फंड हुआ कम
राजधानी में निगम के पास फंड की कमी है। जिन नालों की सफाई में 20-25 लाख रुपये का फंड खर्च होता था अब वह भी घटाकर 10-12 लाख कर दिया गया है। अब इतना ही फंड मंजूर होगा तो अधिकारी के पास तो यह बहाना होगा ही कि जितना फंड मांगा था उतना तो मिला नहीं। जितना मिला उसमें वह इस स्थिति में इतना ही काम कर सकते थे।
अधिकारी फंड मंजूर करते समय भी भ्रष्टाचार की गुंजाइश छोड़ देते हैं। वहीं, नालों की सफाई के लिए देखने में आता है कि जो एजेंसी नालों की सफाई करती हैं उसके दावों को ही हकीकत मान लिया जाता है। जबकि जिस प्रकार से सड़क बनाने में गुणवत्ता की जांच दूसरा विभाग करता है उसकी जांच भी उसी प्रकार से होनी चाहिए। देखने में आता है कि दावे तो किए जाते हैं कि इतनी मीट्रिक टन गाद को लैंडफिल पर डाल दी गई।
अब उसमें यह नहीं देखा जाता कि गाद के नीचे कहीं मलबा तो नहीं है। ज्यादातर ठेकेदार बिल बनाने के लिए इसी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। इससे नालों की सफाई और निकाली गई गाद की सही स्थिति सामने नहीं आ पाती है। इसके लिए निगरानी की जिम्मेदारी किसी न किसी की लगानी ही होगी। तब ही जाकर जिम्मेदारी तय हो पाएगी। साथ ही कैमरे की निगरानी में नालों की सफाई का कार्य होना चाहिए।
यह तो रही नालों की सफाई की बात, ड्रेनेज सिस्टम भी तो इन्ही एजेंसियों को ही बनाना है। हम हर साल इस बात पर चर्चा क्यों करें कि नालों की सफाई क्यों नहीं हुई? यह एजेंसियां क्यों बरसात के पानी के लिए मजबूत ड्रेनेज सिस्टम नहीं बनाती? क्योंकि दिल्ली में बहुनिकाय व्यवस्था है इसलिए सभी लोग अपनी जिम्मेदारी से बचना जानते हैं अधिकारी भी और नेता भी।
अगर आज हम यह निर्धारित कर दें कि चाहे इलाका किसी भी एजेंसी का हो वहां ड्रेनेज सिस्टम फलां एजेंसी बनाएगी। तभी इस पर गंभीरता से कार्य हो पाएगा नहीं तो जैसा होता आया है वैसा ही होता रहेगा।
एक एजेंसी ड्रेनेज सिस्टम बनाने का काम करेगी तो न केवल उस एजेंसी की जिम्मेदारी शहर में अलग-अलग एजेंसियों के पास नालों की जिम्मेदारी है। इसके अलावा बड़े नालों के ऊपर कहीं शिकायत के बोर्ड भी होने चाहिए, इसमें उच्च अधिकारियों के फोन नंबर होने चाहिए, ताकि नाले की सफाई ठीक ढंग से न हो तो लोग उसकी शिकायत कर सकें।







