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Home राजनीति

जनादेश का बीजेपी को सियासी सबक!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
June 6, 2024
in राजनीति, राष्ट्रीय, विशेष
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प्रकाश मेहरा


नई दिल्ली। मंगलवार को आए चुनाव नतीजे अप्रत्याशित रहे। दस साल बाद देश में। फिर से गठबंधन पर निर्भर सरकार बनने जा रही है। इन नतीजों को इसलिए भी आश्चर्य की नजर से देखा जा रहा है, क्योंकि तमाम एग्जिट पोल कयास लगा रहे थे कि भारतीय जनता पार्टी भारी बहुमत के साथ सरकार में लौट रही है। मगर नतीजे इससे उलट आए, भले ही भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई हो और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को बहुमत के लिए जरूरी आंकड़े भी मिल गए हों, लेकिन भाजपा अपने बूते बहुमत का जादुई आंकड़ा इस बार नहीं पा सकी।

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लोकतंत्र में लगातार उथल-पुथल

इस जनादेश में सबके लिए कुछ न कुछ संदेश है। पहला संदेश तो भाजपा को मिला है कि कोई भी बहुमत स्थायी नहीं होता। लोकतंत्र में लगातार उथल-पुथल चलती रहती है। जिस पार्टी को आगे बढ़ने का मौका मिलता है, उसे नुकसान भी उठाना पड़ता है। यह सही है कि भारतीय जनता पार्टी को कुछ इलाकों में बड़ी सफलता मिली है, मसलन ओडिशा में या दक्षिण भारत के राज्यों में और उसने गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे मध्य भारत के सूबों में भी अपना दबदबा बनाए रखा है, मगर जिस उत्तर प्रदेश को उसका मजबूत दुर्ग कहा जाता है, वह इस बार दरक गया है। इसी तरह, हरियाणा और राजस्थान में भी उसे बड़े झटके लगे हैं। फिलहाल कहना मुश्किल है कि किन वजहों से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन जैसा कि कुछ दिनों से लगातार कहा जा रहा था, देश के एक बड़े तबके में अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर असंतोष बना हुआ है। भाजपा संभवतः इस नाराजगी को पूरी तरह से पढ़ नहीं पाई।

उसके लिए एक और सबक यह है कि सिर्फ नरेंद्र प्रदेश, मोदी के चेहरे या गरीबों के लिए राशन योजना के नाम पर वह लगातार वोट नहीं जुटा सकती। फिर, ‘400 पार’ का नारा भी अति-आत्मविश्वास का संकेत समझा गया। विपक्ष ने इस नारे का इस्तेमाल पिछड़ी जातियों विशेषकर दलितों को यह समझाने में कर लिया कि संविधान बदलने की कवायद की जा रही है और उनका आरक्षण खत्म हो सकता है। भाजपा इस नैरेटिव की भी काट नहीं ढूंढ़ पाई।

गठबंधन ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया!

दूसरा संदेश कांग्रेस और मुख्य रूप से ‘इंडिया’ ब्लॉक के लिए है। निस्संदेह, विपक्षी दलों के इस गठबंधन ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया है। हालांकि, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में वह एनडीए पर भारी साबित हुआ, पर दिल्ली जैसे सूबे में कुछ खास नहीं कर पाया है। कांग्रेस केरल और पंजाब का अपना गढ़ बचाने में सफल रही और हरियाणा, तेलंगाना व राजस्थान में भी उसने अच्छा प्रदर्शन किया है, लेकिन गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहां उसका सीधा मुकाबला भाजपा से था, वहां उसे कुछ खास सफलता नहीं मिल सकी। कर्नाटक में भी उसका प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा है।

इस बार कांग्रेस की सीट और उसके मत-प्रतिशत में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। लगता है कि उसके आर्थिक न्याय की संकल्पना और जातिगत सर्वेक्षण जैसे मुद्दे कुछ मतदाताओं को प्रभावित करने में सफल रहे हैं। इसमें राहुल गांधी की भूमिका काफी अहम मानी जाएगी। उनकी दो भारत जोड़ो यात्राओं का भी शायद असर रहा है। इस गठबंधन के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि बेशक उसे अपनी सियासी जमीन जमाने के लिए एक सहारा मिल गया है, लेकिन उसकी आगे की राह काफी लंबी और जटिल है। इस गठबंधन की अहम पार्टियों जैसे उद्धव ठाकरे की शिवसेना या शरद पवार गुट की एनसीपी को सहानुभूति का लाभ मिला है और देखना होगा कि विधानसभा चुनावों तक यही परिस्थति बनी रहती है अथवा नहीं ?

चुनावी संग्राम में खासी मुश्किलों का सामना!

तीसरा संदेश उन विपक्षी पार्टियों के लिए है, जो न तो एनडीए में थीं और न ‘इंडिया’ में। जनादेश बताता है कि बिना खेमे वाले इन दलों को गहरी निराशा हाथ लगी है। बसपा जहां अपना खाता खोलने में भी विफल रही, वहीं बीजद को लोकसभा और विधानसभा, दोनों में करारी हार का सामना करना पड़ा है। दिल्ली में गठबंधन बनाकर लड़ने वाली आप को भी नुकसान उठाना पड़ा है। हां, पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने वाली तृणमूल कांग्रेस ने अपना दमखम बचाए रखा है, लेकिन बाकी तमाम दलों को तेज झटका लगा है। इससे प्रतीत यही होता है कि भारतीय राजनीति अब दो ध्रुवों में बंट गई है और यदि कोई पार्टी इन गठबंधनों का हिस्सा नहीं है, तो उसे चुनावी संग्राम में खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

चुनावी नतीजा एग्जिट पोल के बिल्कुल उलट!

चौथा संदेश चुनाव विश्लेषकों के लिए है। नतीजा बताता है कि एग्जिट पोल कई बार निष्प्रभावी भी हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और कुछ हद तक महाराष्ट्र में तो चुनावी नतीजा एग्जिट पोल के बिल्कुल उलट रहा। कुछ विश्लेषक जरूर भाजपा के नुकसान की बात कह रहे थे, लेकिन उनका अनुमान उतना नहीं था, जिस तरह के जनादेश आए हैं। मतदाताओं ने इन चुनावी पंडितों को संकेत दिया है कि एक ही चश्मे से पूरे देश को देखना गलत है। अलग- अलग हिस्सों में अलग-अलग समस्याए हैं और पार्टियों की ताकतें भी अलग-अलग होती हैं। जिन-जिन क्षेत्रों में चुनावी विश्लेषक इन समीकरणों को पढ़ने में सफल रहे, उनका नतीजा जनादेश से मेल खा गया, लेकिन जहां वे चूक गए, वहां मात खा गए।

लोकतंत्र को मजबूत रखने की अहम जिम्मेदारी!

पांचवां संदेश भारतीय लोकतंत्र के उन तमाम संस्थानों के लिए है, जिन पर लोकतंत्र को मजबूत रखने की अहम जिम्मेदारी है। फिर चाहे वे पारंपरिक व सोशल मीडिया हो या चुनाव आयोग जैसे संस्थान। जनता ने बताया है कि जनतंत्र जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए ही है। इसकी मजबूती के लिए लोकतंत्र के तमाम संस्थानों को आगे आना होगा। ये नतीजे इन संस्थानों के लिए सबक हैं कि वे अपना काम निष्पक्ष होकर करें, तभी जनता के हितों का पोषण हो सकेगा। वैसे, वोटरों ने राजनीतिक दलों को भी संदेश दिया है कि विनम्रता के साथ राजनीति करिए, क्योंकि लोकतंत्र में अहंकार की कोई जगह नहीं होती। साफ है, यह जनादेश सभी को कुछ न कुछ संदेश दे रहा है। जरूरत है, तो सिर्फ इसे पढ़ने और समझने की। यदि इन सबक पर अमल करने का प्रयास किया गया, तो निस्संदेह भारतीय लोकतंत्र और ज्यादा समृद्ध व परिपक्व बनकर उभरेगा।

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