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Home राज्य

जनजातीय कानूनों की आड़ में चकमा दे रहा चर्च

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
June 18, 2023
in राज्य, विशेष
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Anand Kumar


मणिपुर हिंसा जब शुरू हुई तो कर्नाटक चुनावों का दौर था और उस क्षेत्र में केंद्र सरकार के सत्ताधारी दल का ही शासन था। ऐसे में उस पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। लेकिन चुप्पी साधना किसी समस्या का हल तो होता नहीं है। हिंसा थमी नहीं, जारी है।

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इसी बुधवार को पूर्वी इम्फाल के खामलांक इलाके में नौ लोगों की हत्या कर दी गयी जबकि दस लोग बुरी तरह घायल हो गये। इसी तरह केन्द्रीय मंत्री के आवास पर पेट्रोल बम से हमले के बाद शनिवार को मणिपुर भाजपा अध्यक्ष ए शारदा देवी के घर पर दंगाई हमला करने पहुंच गये।

स्वाभाविक है मणिपुर अशांत है और उसे शांत होने नहीं दिया जा रहा है। इस अशांति का कारण उस कानून में फेरबदल की संभावना को बताया जा रहा है जिसके तहत जनजातीय क्षेत्रों में उनके संरक्षण के प्रावधान किये गये हैं। इसीलिए जिन क्षेत्रों में जनजातीय आबादी है, उन क्षेत्रों के बारे में कानून बनाने से हमारी सरकारें करीब सात दशकों से हिचकिचाती रही है। इसमें जमीन का मुद्दा एक बड़ा मुद्दा है। भारत के किसी भी नागरिक को संवैधानिक रूप से भारत के किसी भी हिस्से में जाकर बसने की स्वतंत्रता तो है, लेकिन जनजातीय क्षेत्रों में, पहाड़ी इलाकों में, ये स्वतंत्रता लागू नहीं होती है।

वनवासी समुदायों की आबादी वाले क्षेत्रों की समस्याओं की बात शुरू होते ही फिर से कई साल पुरानी एक समस्या की याद आ जाती है। इस दिक्कत को “डीलिस्टिंग” कहा जाता है। ढेबर कमीशन जनजातीय क्षेत्र और जनजातियों के लिए बना पहला कमीशन था जिसने अपनी रिपोर्ट 1960-61 में सौंपी। इस कमीशन ने अनुसूचित क्षेत्रों का निर्धारण करने के लिए चार मापदंड दिए थे। इनमें से तीन तो क्षेत्र के आकार और विकास से सम्बंधित थे, मगर चौथा आबादी पर आधारित था।

चौथा मापदंड कहता था कि जहाँ जनजातियों की आबादी कम से कम पचास प्रतिशत हो, उसे ही जनजातीय क्षेत्र घोषित किया जा सकता है। इसी को करीब पचास वर्ष बाद 2013 में जनजाति मामलों के मंत्रालय ने भी माना और अपनी रिपोर्ट में कहा कि ब्लॉक (प्रखंड) या जिला तभी जनजातीय क्षेत्र घोषित होगा जब वहाँ जनजातियों की आबादी पचास प्रतिशत या उससे अधिक हो।

इससे अंतर क्या पड़ता है? अंतर मणिपुर में देख लीजिये। नागा और कुकी की आबादी वाले क्षेत्रों को जनजातीय क्षेत्र मानकर दूसरों का वहाँ जमीन खरीदना मना है। किन्तु मैतेई जो उनसे पहले से मणिपुर में रहते हैं, उन्हें जनजाति ही नहीं माना जाता, इसलिए वो नागा-कुकी की आबादी वाले क्षेत्रों में जमीनें नहीं खरीद सकते। मैतेई लोगों को जनजातियों में शामिल करने की बात वो बहाना था, जिस पर हाल ही में मणिपुर में दो बार हिंसा भड़की और गृहमंत्री की चेतावनी के बाद सैकड़ों की संख्या में हथियार थानों में समर्पित हुए।

अभी जिस डीलिस्टिंग की बात होती है, इसकी नींव वर्तमान झारखण्ड के लोहरदग्गा से सांसद रहे कार्तिक उराँव ने डाली थी। ब्रिटिश शासित भारत में 28 अक्टूबर 1924 को जन्मे कार्तिक उराँव तीन बार लोहरदग्गा से सांसद रहे और विमानन एवं संचार मंत्री भी रहे थे। कुरुख समुदाय से आने वाले कार्तिक उराँव का सबसे क्रन्तिकारी कृत्य था डीलिस्टिंग आन्दोलन की बुनियाद डालना। उन्होंने 1960 के दौर में डीलिस्टिंग आन्दोलन की नींव रखी।

झारखण्ड के जनजातीय समाज में पूज्य माने जाने वाले बिरसा मुंडा के आन्दोलन को ही उन्होंने एक तरह से आगे बढ़ाया था। जैसा कि सर्वविदित है, बचपन में इसाई बना दिए गए बिरसा मुंडा ने “घरवापसी” कर ली थी और उसके बाद से जनजातीय क्षेत्रों में उन्होंने मिशनरी और ब्रिटिश घुसपैठ तथा हस्तक्षेप के विरुद्ध संघर्ष किया। सांसद कार्तिक उराँव ने भी अनुसूचित जनजाति आदेश संशोधन विधेयक 1967 में ऐसी ही बात की थी। इस विधेयक का मुख्य बिंदु ये था कि जिस व्यक्ति ने जनजातीय आदिमत तथा विश्वासों को परित्याग कर दिया हो और ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया हो, वह अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं समझा जायेगा। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने 322 लोकसभा सांसदों और 26 राज्यसभा के सांसदों का समर्थन भी जुटा लिया था। कार्तिक उराँव का विधेयक कभी कानून नहीं बन पाया। राजनीति का शिकार हुआ ये विधेयक अब इतिहास और अदालती बहसों का विषय है।

सीधे संविधान की बात करें तो इस तरह अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने के लिए अधिकतम या न्यूनतम जनजाति आबादी का प्रावधान, संविधान में नहीं है। ढेबर कमीशन की रिपोर्ट हो या बाद में आये इसी तरह के अन्य कमीशनों की रिपोर्ट, ये सभी मात्र मार्गदर्शक सिद्धांत की तरह है। अदालती मामलों में सिर्फ इनके आधार पर कोई फैसला आये ये संभव नहीं। इसलिए यहाँ सोच-विचारकर बनाये गए एक कानून की आवश्यकता है। अगर सिर्फ 50 प्रतिशत जनजाति आबादी की बात करें तो ये मापदण्ड व्यावहारिक नहीं हो सकता है। झारखण्ड, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड सहित कई राज्यों में इस तरह के किसी नियम का क्या परिणाम हो सकता है, उसका नमूना हम लोग रेलवे की भूमि पर से उत्तराखंड में एक अतिक्रमण हटाने के मामले में हाल ही में देख चुके हैं।

डेमोग्राफी यानी आबादी का अनुपात बदलकर चुनावों तक को प्रभावित कर देने में कुछ लोग समर्थ हो चुके हैं। यही हाल बिहार के कम से कम तीन जिलों – पूर्णियां, अररिया, और किशनगंज का हो चुका है। अनगिनत विधानसभा क्षेत्रों में भी बांग्लादेशी घुसपैठ और कश्मीर तक रोहिंगिया घुसपैठियों की वजह से उत्तर-पूर्वी राज्यों और बंगाल में भी ऐसी ही स्थिति है। सिर्फ अनुसूचित क्षेत्रों की बात करें तो उनके सम्बंध में 1950, 1975, 1977, 2003 और 2007 में अधिसूचनाएं जारी हुई जिनमें आबादी में अधिकतम या न्यूनतम होने का कोई प्रावधान नहीं है। भूरिया कमिटी 1994 में इस तथ्य को उजागर कर चुकी है कि अनुसूचित क्षेत्र में जिन क्षेत्रों की बात होती है वहाँ केवल 30 प्रतिशत जनजाति जनसंख्या है। जनजातीय क्षेत्रों से खनन के लिए आबादी को हटाया भी गया है और रोजगार आदि कारणों से जनजातियों का बड़ी संख्या में पलायन भी होता है। इसलिए जब भी जनजातीय आबादी की बात होती है तो जनसंख्या के अनुपात को नकार दिया जाता है। ऐसा कई बार 1977, 2003 , 2007 और 2013 में भी हो चुका है।

जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन और कानून की भी अलग व्यवस्था होती है। ऐसा पेसा आधिनियम 1996 के जरिये होता है। पेसा कानून धारा 4 (अ) के मुताबिक ऐसी पंचायतों के बारे में कानून बनाते समय राज्य सरकारें, रूढ़िगत विधि, सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं और समुदाय के संसाधनों की परम्परागत पद्धतियों को मान्यता देगा, या उसके अनुरूप कानून बनायेगा।

अब सवाल ये है कि धर्मान्तरण और मिशनरी स्कूलों में सिखाये हुए नए रीति-रिवाजों की वजह से कई नियम-कायदे तो बदल चुके हैं! धर्मांतरण के कारण जनजाति समूह अपनी मूल धार्मिक, सांस्कृतिक व परम्परागत मान्यताओं को छोड़ रहे हैं। इसी समय धर्मान्तरण को वो सरकारी कागजों पर घोषित नहीं करते ताकि आरक्षण सहित सभी सरकारी लाभ को प्राप्त कर सकें। इन सबके बीच अगर सरकार द्वारा कानून लाने की कोशिश की जाये तो पूरी संभावना है कि नतीजे वही होंगे जो हाल में नये कृषि सम्बन्धी कानूनों का हुआ था।

फ़िलहाल मणिपुर में जनजातियों की स्थिति धार्मिक परम्पराओं के मामले में क्या होगी, इसका अनुमान कैथोलिक आर्चबिशप की प्रेस कांफ्रेंस की बातों से लगाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि 13 अलग-अलग ईसाई सम्प्रदायों के चर्चों पर हमले हुए हैं। जाहिर है उन्होंने ये नहीं बताया कि नागा-कुकी आतंकियों ने हिन्दुओं पर कितने हमले किये। इन तेरह ईसाई सम्प्रदायों में कैथोलिक हैं, मणिपुर प्रेसबिटेरियन सिंग्लप, इवैंजेलिकल चर्चेस एसोसिएशन, तुइथाफाई प्रेसबिटेरियन चर्च, द इवैंजेलिकल फ्री चर्च ऑफ इंडिया, इंडिपेंडेंट चर्च ऑफ इंडिया, इवैंजेलिकल बैप्टिस्ट कन्वेंशन चर्च, मणिपुर इवैंजेलिकल लुथेरन चर्च, और इवैंजेलिकल आर्गेनाइजेशन चर्च शामिल हैं। इनके अलावा इवैंजेलिकल असेंबली चर्च, न्यू टेस्टामेंट बैप्टिस्ट चर्चेस एसोसिएशन और असेंबली ऑफ गॉड के चर्च भी इस इलाके में हैं।

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अब अनुमान लगाइए कि जिनके इतने चर्च हैं, उनके स्कूल कितने होंगे। अगर इतने स्कूल और चर्च किसी क्षेत्र में हों, तो वहाँ की परम्पराएं स्थानीय जनजाति की परम्पराएं बची होंगी, या ईसाई हो गयी होगी? बड़े शहरों के ईसाई मिशनरी स्कूलों तक में जहाँ लड़कियों की चोटी काट दी जाती है, लड़कों के हाथ से कलावा काटकर हटाया जाता है, वहाँ इतने दूर के क्षेत्र में वो जनजातीय परम्पराओं को कितना पनपने देते होंगे? इसके बावजूद अगर वो अपने आप को जनजातीय समूह मानकर हिंसक संघर्ष पर उतारू हैं तो क्या इसे सिर्फ जनजातीय संघर्ष समझा जाए या फिर ईसाई मिशनरियों और चर्च का दुष्चक्र? कहीं ऐसा तो नहीं है कि आदिवासी कानूनों की आड़ में चर्च अपना संरक्षण कर रहा है और वह नहीं चाहता कि हिन्दू मैतेई समुदाय के लोग कभी भी उसके प्रभाव वाले इलाकों में आकर बसें।


इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।

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