नई दिल्ली : जी-20 सम्मेलन ने विश्व भर से आए बड़े और नामी नेता शिरकत करने वाले हैं। शिखर सम्मेलन से पहले राष्ट्रीय राजधानी को सजाया जा रहा है। सम्मेलन से पहले आयोजित होने वाली ‘सांस्कृतिक गलियारा’ प्रदर्शनी में भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बीओआरआई), पुणे से ऋग्वेद की एक पांडुलिपि दिखाई जाएगी। ऐसा बताया जा रहा है कि पांच शताब्दियों पहले शारदा लिपि में लिखी गई ऋग्वेद की ऋचाएं कश्मीरी बर्च-छाल पर उकेरी गई हैं। इन्हें 1875 में जॉर्ज ब्यूहलर द्वारा कश्मीर से प्राप्त की गई थी। इन्हें ऋग्वेद की पुरानी पांडुलिपियों में सबसे सटीक माना जाता है, इसका अध्ययन करने के लिए सावधानी बरतनी पड़ती है।
पूणे स्थित बीओआरआई कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष भूपाल पटवर्धन ने कहा, “यह ऋग्वेद सबसे पुराना जीवित पांडुलिपियां है। यह मनुष्य और समग्र विश्व के कल्याण पर आधारित दस्तावेज है। यह विचार जी-20 शिखर सम्मेलन के आदर्श वाक्य ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (दुनिया एक परिवार है) के अनुरूप है। ऋग्वेद में राजा को नियंत्रित करने वाली दो संस्थाओं के रूप में ‘सभा’, विशेषज्ञों की एक समिति और ‘समिति’, लोगों की एक सभा का उल्लेख है। इस प्रकार, यह लोकतंत्र के पहले प्रतीक के रूप में लोगों के सामने आता है।”
बता दें ऋग्वेदिक काल में दो संस्थाएं काफी लोकप्रिय थीं। एक – ‘सभा’ जिसमें वर्षिठ लोगों और महिलाओं की समिति थी, दूसरी ‘समिति’ जिन्हें आम लोगों की एक सभा कहा जाता था।
शिखर सम्मेलन के सांस्कृतिक गलियारे में दूसरी कलाकृति में प्राचीन विद्वान पाणिनि की अष्टाध्यायी की एक प्रति होगी, जो एलबीएस संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली के रखी गई है। ‘सांस्कृतिक गलियारा’ प्रदर्शनी में यूके से मैग्ना कार्टा, अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा, अफ्रीका से प्रागैतिहासिक मनुष्य के अवशेष और मानव विरासत के अन्य प्रतीक प्रदर्शित किए जाएंगे।
इस बीच, सहायक क्यूरेटर अमृता नातू और अनुसंधान सहायक बालकृष्ण जोशी को नई दिल्ली में प्रदर्शनी आयोजकों को मूल्यवान पांडुलिपि सौंपने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के निदेशक अनिर्बान दास ने हाल ही में प्रदर्शनी आयोजकों की ओर से बीओआरआई, पुणे में रखी ऋग्वेद की प्राचीन पांडुलिपि को स्वीकार किया। प्रदर्शनी के बाद पांडुलिपि विधिवत बीओआरआई को वापस कर दी जाएगी।







