बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी ने लोकसभा में बीएसपी सांसद दानिश अली के लिए आपत्तिजनक शब्द बोलकर खुद को और बीजेपी को बुरी तरह फंसा दिया है. संसद में उनकी तरफ से दिए गए अमर्यादित बयान ने बवाल मचा दिया. उनके इस भाषण की वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर इतनी वायरल हो गई कि विपक्षी पार्टी सहित सोशल मीडिया यूजर्स ने भी बीजेपी को निशाने पर लेना शुरू कर दिया.
बीजेपी पर दबाव इतना ज्यादा बढ़ गया पार्टी को बिधूड़ी को कारण बताओ नोटिस तक जारी करना पड़ा. हालांकि कांग्रेस इस मुद्दे को इतनी आसानी से कहां जाने देने वाली थी. मामले पर कांग्रेस, बीएसपी से भी ज्यादा सक्रिय नजर आई. कांग्रेस ने न सिर्फ बीजेपी पर ध्यान भटकाने की राजनीति का आरोप लगाया, बल्कि पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी बीएसपी नेता दानिश अली से मिलने के लिए उनके आवास तक पहुंच गए.
22 सितंबर को दानिश अली से मिलने के बाद राहुल गांधी ने अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर इस मुलाकात की तस्वीर साझा की जिसमें वह दानिश को गले लगाते नजर आ रहे हैं. राहुल ने कैप्शन में लिखा ‘नफरत की बाजार में मुहब्बत की दुकान’.
इस मुलाकात की तस्वीर ने एक तीर से दो निशाना कर डाला. दरअसल कांग्रेस ने बीजेपी को तो घेरा ही, साथ ही दानिश से मुलाकात ने अखिलेश और मायावती को भी टेंशन दे दी है.
कौन हैं ये दानिश अली
दानिश उत्तर प्रदेश के अमरोहा से बीएसपी सांसद हैं. साल 2019 के चुनाव में दानिश ने भारतीय जनता पार्टी के कंवर सिंह तंवर और कांग्रेस के सचिन चौधरी को हरा कर जीत हासिल की थी. दानिश का राजनीति से नाता उनकी पीढ़ी तक सीमित नहीं है. साल 1957 में उनके दादा कुंवर महमूद अली डासना विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे और साल 1977 में हापुड़ लोकसभा सीट से सांसद भी चुने गए थे. हापुड़ दानिश अली का गृह जिला है. उनके पिता जफर अली भी राजनीति में सक्रिय रहे हालांकि वह विधायक या सांसद नहीं बने.
राहुल ने दानिश से मुलाकात कर क्यों बढ़ा दी मायावती की टेंशन
सामाजिक विज्ञान के प्रोफेसर विकास गुप्ता ने एबीपी से बात करते हुए इस सवाल के जवाब में बताया कि दानिश अली की गिनती यूपी की राजनीति में काफी तेज तर्रार और सफल नेताओं में होती है. वह मायावती के काफी करीबी नेता भी माने जाते हैं. इसके अलावा दानिश की मुस्लिम मतदाताओं पर अच्छी पकड़ है.
दानिश ने पिछले लोकसभा चुनाव में अमरोहा सीट से कांग्रेस और बीजेपी को हराया था. ये वो साल था जब पूरे देशभर में खासकर यूपी में भारतीय जनता पार्टी की लहर थी. अमरोहा संसदीय क्षेत्र में मुसलमानों का प्रभुत्व है, और यहां बड़ी संख्या में दलित भी रहते हैं. दानिश अली ने लगभग 51% वोट हासिल कर तत्कालीन मौजूदा बीजेपी सांसद कुंवर सिंह तंवर को 63,000 से अधिक वोटों के अंतर से हराया था.
अब जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी उनसे मिलने उनके आवास पर पहुंचे को राजनीतिक गलियारे में चर्चा होने लगी क्या वह कांग्रेस में शामिल होंगे?
दरअसल देश में साल 2024 में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. इस चुनाव से पहले कांग्रेस लगातार अपने खोए हुए इस वोट बैंक को वापस लाने की कोशिश कर रही है और इन खोए हुए वोटर्स में मुस्लिमों का भी नाम सबसे ऊपर है. दरअसल मुस्लिम समुदाय हमेशा से ही कांग्रेस को अपना समर्थन देता आया है, लेकिन पिछले कुछ सालों में पार्टी के कमजोर होने के बाद उनके मुस्लिम छिटकते गए और क्षेत्रीय पार्टियों को अपना समर्थन देना शुरू कर दिया.
अब कांग्रेस दानिश अली का साथ देकर या भविष्य में उन्हें अपने पार्टी में शामिल कर कांग्रेस मुस्लिमों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर सकती है. ऐसे में अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी मायावती को उत्तर प्रदेश में जनाधार की चिंता हो सकती है, क्योंकि मुस्लिम समुदाय कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक रहा है. अगर दानिश भी कांग्रेस की पार्टी में शामिल होते हैं तो साल 2024 के चुनाव में एक बड़ा वोट बैंक शिफ्ट कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हो सकता है. वहीं अखिलेश यादव भले ही इंडिया गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन सपा के साथ कांग्रेस का गठबंधन साल 2017 विधानसभा चुनाव में विफल साबित हुआ था. चुनाव बाद खुद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा था कि कांग्रेस का वोट सपा को ट्रांसफर ही नहीं हुआ था.
बसपा के साथ गठबंधन करने की कोशिश में राहुल
प्रोफेसर विकास बताते हैं कि इस पूरे मामले में राहुल का सक्रिय रहने के पीछे एक कारण ये भी हो सकता है कि आने वाले लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस बसपा को इंडिया में शामिल करने की कोशिश कर रही हो. बसपा और कांग्रेस के साथ आने से जीतने की संभावना सपा और कांग्रेस की तुलना में ज्यादा बढ़ जाती है. अगर लोकसभा चुनाव से पहले बसपा कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए राजी हो जाती है तो एक ऐसे दलित-मुस्लिम गठजोड़ की नींव रखी जाएगी जिस पर अगर सही दिशा में प्रयास किया गया तो दूसरी जातियां व अपर कास्ट का झुकाव भी हो सकता है.”
दानिश अली को अपशब्द कहने कहने के मामले में रमेश बिधूड़ी
लोकसभा में बहस के दौरान बीएसपी सांसद दानिश को अपशब्द कहने के बाद पहली बार यानी रविवार को भारतीय जनता पार्टी के सांसद रमेश बिधूड़ी ने बयान दिया है. संसद से उनकी टिप्पणी के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि इस मामले पर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला गौर कर रहे हैं. इसके अलावा, मैं इस मसले पर अभी कुछ नहीं कहना चाहता.
दरअसल, बीजेपी एमपी रमेश बिधूड़ी ने बसपा सांसद के खिलाफ लोकसभा में विवादित और आपत्तिजनक बयान दिया था. उनके बयान की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह चर्चा के दौरान तत्काल इस पर अपना अफसोस जाहिर किया. उन्होंने कहा था कि उनका ये बयान स्वीकार नहीं है.
बीजेपी सांसद के इस तरह के बयान के सामने आने पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि यह देश के मूल मसले से लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश है. उन्होंने कहा कि वन नेशन, वन इलेक्शन से ध्यान हटाने की टैक्टिस हो सकता है. उन्होंने कहा कि बीजेपी जनता से जुड़े मुद्दे पर चुनाव नहीं लड़ सकती.
संसद के अंदर अपशब्द को लेकर क्या है नियम
संसद के अंदर असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किए जाने पर संविधान के आर्टिकल 105 (2) के तहत संसद में कही गई किसी बात के लिए कोई सांसद किसी कोर्ट के प्रति उत्तरदायी नहीं होता है.
आसान भाषा में समझे तो सदन में कही गई किसी भी बात को कोर्ट में चैलेंज नहीं किया जा सकता है. एक सांसद सदन में कुछ भी कहता है वो लोकसभा में प्रोसिजर एंड कंडक्ट ऑफ बिजनेस के रूल 380 के तहत स्पीकर के कंट्रोल में होता है. इसका मतलब यह है कि अगर कोई भी सांसद संसद भवन के अंदर असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करता है तो उस पर स्पीकर को ही एक्शन लेने का अधिकार है.







