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Home जुर्म

पश्चिम बंगाल: संदेशखाली का घटनाक्रम सियासी भंवर में फंसा!

तृणमूल सरकार की एक संजीदा पहल संदेशखाली को राजनीतिक मुद्दा बनने से रोक सकती थी, पर ऐसा न करके उसने विपक्ष को मौका मुहैया करा दिया है।

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
February 22, 2024
in जुर्म, राज्य, विशेष
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संदेशखाली का घटनाक्रम
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प्रकाश मेहरा


संदेशखाली : पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के संदेशखाली गांव में महिलाओं के कथित यौन उत्पीड़न मामले में राज्य सरकार का अब तक का रवैया न सिर्फ असंवेदनशील, बल्कि राजनीतिक रूप से अदूरदर्शितापूर्ण भी कहा जाएगा। कोलकाता हाईकोर्ट की टिप्पणियों से भी यही प्रतीत होता है कि सूबे की सरकार इस मामले में अपने तईं इंसाफ सुनिश्चित करने के बजाय उसकी राह में अवरोध ही खड़ी कर रही है। राज्य में विरोधी दल के नेता सुवेंदु अधिकारी को घटनास्थल पर जाने की सशर्त इजाजत देते हुए 20 फरवरी को हाईकोर्ट ने साफ कहा कि प्रथम दृष्टया यही लगता है कि आरोपी ने जनता को नुकसान पहुंचाया है और वह अब तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर है? इसका साफ मतलब है कि राज्य की पुलिस उसे पकड़ने में अक्षम है या फिर वह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है!

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संदेशखाली की बाड़ेबंदी और मीडिया पर रोक!

निस्संदेह, जिस तरह से संदेशखाली गांव की बाड़ेबंदी की गई या वहां विपक्षी नेताओं और मीडिया को जाने से रोका गया है, उससे यही संदेह गहराया है कि कुछ तो है, जिस पर परदा डालने की कोशिश की जा रही है। वैसे, संदेशखाली इकलौता मामला नहीं है, और न ही पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार देश की अकेली सूबाई हुकूमत है, जिसके गलत फैसलों ने एक मामले को स्थानीय से अंतरराष्ट्रीय बना दिया। लेकिन जिस सूबे की मुखिया एक महिला हो, वहां तो ऐसे किसी मामले में अतिरिक्त सक्रियता दिखनी चाहिए थी, बल्कि ममता बनर्जी ऐसा करके देश-प्रदेश में सुर्खरू ही होतीं, मगर त्वरित कार्रवाई करने के बजाय सियासी आरोपों- प्रत्यारोपों के जरिये इसे दबाने की कोशिश की गई। जनवरी के पहले हफ्ते में यह मामला प्रकाश में आया था कि पार्टी का स्थानीय नेता शाहजहां शेख व उसके गुर्गे कथित तौर पर लोगों की जमीन हड़पने, महिलाओं के शोषण और फिरौती वसूलने जैसे आपराधिक कृत्यों में शामिल हैं। आम चुनाव के मुहाने पर खड़ी तृणमूल कांग्रेस सरकार की एक संजीदा पहल संदेशखाली को राजनीतिक मुद्दा बनने और ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए किसी अवसर को खत्म कर श्री थी, मगर ऐसा न करके उसने विपक्ष को मौका मुहैया करा दिया है।

संदेशखाली मामले में हाईकोर्ट ने क्या कहा

दरअसल, जिस राजनीतिक दौर में आज हम जी रहे हैं, उसमें राजनेताओं के लिए सिर्फ चुनावी जीत मायने रखती है, चाहे वह किसी अधिकारी की धोखाधड़ी से आ रही हो या किसी अपराधी के दबदबे से। शाहजहां शेखों का कवच यही वोट का लोभ बनता है। निस्संदेह, ऐसे में न्यायपालिका की जिम्मेदारी बढ़ गई है कि वह संविधान और उसके मूल्यों के पक्ष में दृढ़ता से खड़ी हो। संदेशखाली के मामले में कोलकाता हाईकोर्ट ने उचित ही कहा है, ‘सिर्फ इसलिए कि लोग कुछ कह रहे हैं, उससे आरोपी दोषी नहीं बन जाएगा।’ मगर यह सरकार का दायित्व है कि वह आरोपी को अदालत के सम्मुख पेश करे। सिर्फ इसलिए कि शाहजहां शेख तृणमूल से जुड़ा है और इलाके में उसकी धमक से राजनीतिक लाभ बटोरा जा सकता है, उसे किसी संदेह की छूट क्यों मिलनी चाहिए? हर राजनेता की यही महत्वाकांक्षा होती है कि यह सत्ता के शिखर तक पहुंचे, जाहिर है, ममता बनर्जी भी पूर्वोत्तर के राज्यों में ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटें जीतकर अपनी दावेदारी मजबूत करना चाहती हैं। मगर संदेशखाली के घटनाक्रम ने फिलहाल उन्हें एक ऐसे सियासी भंवर में फंसा दिया है, जिसमें वह अलग-थलग दिखाई पड़ती है।

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