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संसद में महाभियोग… एक दिन, दो नोटिस, जांच से हटाने तक… क्या होता है प्रोसेस!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 22, 2025
in राष्ट्रीय
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स्पेशल डेस्क/नई दिल्ली: भारत में सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया, जिसे महाभियोग (Impeachment) कहा जाता है, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(4), 217(1)(b), 218 और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत संचालित होती है। यह प्रक्रिया अत्यंत कठिन और जटिल है ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनी रहे और अनावश्यक राजनीतिक हस्तक्षेप को रोका जा सके। जब संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में एक ही दिन किसी न्यायाधीश को हटाने का नोटिस दिया जाता है, तो प्रक्रिया में कुछ विशिष्ट कदम उठाए जाते हैं। आइए इस प्रक्रिया और इसके विभिन्न पहलुओं को विस्तार में एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से जानते हैं।

महाभियोग की प्रक्रिया व नोटिस प्रस्तुत करना

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  • कम से कम 100 सांसदों को नोटिस पर हस्ताक्षर करके लोकसभा अध्यक्ष को प्रस्तुत करना होता है।
  • राज्यसभा: कम से कम 50 सांसदों को नोटिस पर हस्ताक्षर करके राज्यसभा सभापति को सौंपना होता है।
  • जब दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दिया जाता है, तो यह प्रस्ताव सदन की संपत्ति (Property of the House) माना जाता है। इसका मतलब है कि इसे स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय केवल प्रीसाइडिंग ऑफिसर (लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति) पर निर्भर नहीं रहता; प्रक्रिया स्वचालित रूप से आगे बढ़ती है।

जांच समिति का गठन

यदि दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस प्रस्तुत किया जाता है, तो संविधान के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति आपस में परामर्श करके एक तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करते हैं। इस समिति में शामिल होते हैं सर्वोच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश (आमतौर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित न्यायाधीश)। उच्च न्यायालय का एक मुख्य न्यायाधीश। एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता (Distinguished Jurist)। यह समिति न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत गठित की जाती है और इसका कार्य नोटिस में लगाए गए आरोपों की गहन जांच करना होता है।

समिति आरोपों की जांच करती है, जिसमें साक्ष्य एकत्र करना, गवाहों से पूछताछ करना और संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा शामिल होती है। आरोपी न्यायाधीश को सफाई का मौका दिया जाता है, ताकि वह अपने पक्ष में तथ्य और सबूत प्रस्तुत कर सके। यह प्रक्रिया निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करती है। जांच पूरी होने के बाद, समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करती है, जिसमें यह निष्कर्ष होता है कि आरोप सही हैं या नहीं।

संसद में बहस और मतदान

जांच समिति की रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किया जाता है। यदि समिति ने न्यायाधीश को कदाचार (Misbehaviour) या अक्षमता (Incapacity) का दोषी पाया है, तो दोनों सदनों में प्रस्ताव पर बहस होती है। प्रस्ताव को पारित करने के लिए विशेष बहुमत (Special Majority) की आवश्यकता होती है, यानी सदन की कुल सदस्यता का साधारण बहुमत (50% से अधिक)। उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत। यह प्रक्रिया दोनों सदनों में उसी संसद सत्र में पूरी होनी चाहिए जिसमें प्रस्ताव पेश किया गया है।

राष्ट्रपति को प्रस्ताव भेजना

यदि दोनों सदन प्रस्ताव को विशेष बहुमत से पारित कर देते हैं, तो इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति इस प्रस्ताव के आधार पर न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं। जांच समिति की रिपोर्ट इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि यह तय करती है कि आरोप सिद्ध होते हैं या नहीं।

कदाचार या अक्षमता के आरोपों की सत्यता का मूल्यांकन। जांच के दौरान एकत्र किए गए तथ्य और सबूत। क्या न्यायाधीश को दोषी पाया गया है या नहीं। यदि दोषी पाया गया, तो हटाने की सिफारिश। यह रिपोर्ट संसद में बहस का आधार बनती है और इसे सार्वजनिक रूप से भी उपलब्ध कराया जा सकता है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

विशेष परिस्थितियां और हाल के उदाहरण

जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला (2025) 21 जुलाई को संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन, जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लोकसभा में 145 सांसदों और राज्यसभा में 54 सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव के लिए नोटिस दिया। यह नोटिस उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास में मार्च 2025 में आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद होने के बाद लगे कदाचार के आरोपों के आधार पर था।

राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ ने पुष्टि की कि नोटिस पर आवश्यक संख्या से अधिक हस्ताक्षर हैं, और उन्होंने राज्यसभा महासचिव को प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भी इसी तरह का नोटिस मिला। इस मामले में, यदि दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस प्रस्तुत हुआ, तो यह स्वचालित रूप से जांच समिति के गठन की ओर बढ़ेगा। सुप्रीम कोर्ट की एक इन-हाउस कमिटी ने पहले ही जस्टिस वर्मा के खिलाफ धन छिपाने और न्यायिक मर्यादा के उल्लंघन की बात कही थी, जो महाभियोग के लिए आधार बन सकती है।

जगदीप धनखड़ का इस्तीफा

जुलाई 2025 में, राज्यसभा सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद यह सवाल उठा कि राज्यसभा में प्रस्ताव का क्या होगा। इस स्थिति में, उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह को यह तय करना होगा कि प्रस्ताव को स्वीकार करना है या नहीं, यदि यह केवल एक सदन में प्रस्तुत हुआ हो। हालांकि, दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस होने पर प्रक्रिया स्वचालित रूप से आगे बढ़ती है।

महाभियोग के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता और दोनों सदनों में एक ही सत्र में प्रस्ताव पारित करने की शर्त इसे अत्यंत जटिल बनाती है। यह सुनिश्चित करता है कि केवल गंभीर और सिद्ध मामलों में ही कोई न्यायाधीश हटाया जाए।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता

यह प्रक्रिया न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए डिज़ाइन की गई है, ताकि राजनीतिक दबाव से बचा जा सके। 1993 में, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ वित्तीय अनियमितता के आरोप में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। हालांकि, यह प्रस्ताव लोकसभा में विशेष बहुमत न मिलने के कारण विफल हो गया। अब तक भारत में किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग के माध्यम से हटाया नहीं गया है। कई बार जांच शुरू होने पर न्यायाधीश स्वयं इस्तीफा दे देते हैं, जिससे प्रक्रिया अधूरी रह जाती है।

महाभियोग की प्रक्रिया में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी या अत्यधिक बहुमत की आवश्यकता के कारण यह कई बार प्रतीकात्मक बनकर रह जाती है।

प्रक्रिया का केंद्रीय दस्तावेज !

जांच समिति की रिपोर्ट इस प्रक्रिया का केंद्रीय दस्तावेज है। यह निम्नलिखित बिंदुओं को कवर करती है जैसे कदाचार या अक्षमता के विशिष्ट आरोप। साक्ष्य, गवाहों के बयान, और अन्य तथ्यों का विश्लेषण। क्या आरोप सिद्ध हुए हैं, और क्या हटाने की सिफारिश की जाती है। यदि दोषी पाया गया, तो संसद को प्रस्ताव पर मतदान करने की सलाह दी जाती है। रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किया जाता है, और यह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो सकती है, जिससे प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही

जब संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन किसी न्यायाधीश को हटाने का नोटिस दिया जाता है, तो यह प्रस्ताव स्वचालित रूप से जांच समिति के गठन की ओर बढ़ता है। यह समिति आरोपों की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपती है। यदि समिति दोषी पाती है, तो दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति न्यायाधीश को हटा सकते हैं। यह प्रक्रिया जटिल और कठिन है, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों को संतुलित करती है।

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