प्रकाश मेहरा
स्पेशल डेस्क
नई दिल्ली: राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा में ‘मुहब्बत की दुकान’ एक प्रमुख नारा रहा है, जो उन्होंने 2022 में शुरू हुई भारत जोड़ो यात्रा के दौरान पेश किया था। यह नारा नफरत की राजनीति के खिलाफ प्रेम, एकता और सामाजिक न्याय का प्रतीक था। राहुल ने कई रैलियों और सभाओं में कहा कि “नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोल रहे हैं”, जो भाजपा और पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए गरीबों, किसानों, युवाओं और अल्पसंख्यकों के बीच एकजुटता का संदेश देता था।
लेकिन हाल के दिनों में, खासकर बिहार की वोटर अधिकार यात्रा (अगस्त 2025) के दौरान, राहुल की भाषा में एक स्पष्ट बदलाव नजर आ रहा है। मोदी और मुद्दों (जैसे अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, किसान नीतियां) के विरोध में उनकी टिप्पणियां अधिक आक्रामक, व्यक्तिगत और कभी-कभी असभ्य हो गई हैं, जिससे उनकी ‘मुहब्बत की दुकान’ की छवि पर सवाल उठ रहे हैं। यह बदलाव राजनीतिक हताशा, चुनावी दबाव या भाजपा की आक्रामक शैली के जवाब में हो सकता है, लेकिन इससे राजनीतिक मर्यादा तार-तार हो रही है।
‘मुहब्बत की दुकान’ का उद्भव
यह नारा 2022 में भारत जोड़ो यात्रा से जुड़ा। राहुल ने अलवर (राजस्थान) रैली में कहा, “मैं नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोल रहा हूं।” यह यात्रा के दौरान एक आम नागरिक के सुझाव से प्रेरित था, जहां उन्होंने नफरत के खिलाफ प्रेम का बाजार खोलने की बात कही। इसका उद्देश्य था भाजपा को ‘नफरत की राजनीति’ का प्रतीक बताना और कांग्रेस को प्रेम व एकता का। 2023 में अमेरिका दौरे पर भी ‘मोहब्बत की दुकान’ इवेंट आयोजित हुआ, जहां राहुल ने पीएम मोदी को ‘नमूना’ कहा, लेकिन फिर भी प्रेम का संदेश दिया।
इस नारे ने युवाओं और अल्पसंख्यकों में राहुल की छवि को मजबूत किया। X पर कई पोस्ट्स में इसे सकारात्मक बताया गया, जैसे “राहुल नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोल रहे हैं” (सितंबर 2024)। जनवरी 2025 में भी राहुल ने कहा, “मोहब्बत की दुकान खोलना हमारा कर्तव्य है, वोट के लिए नहीं।” यह नारा कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा था, जो जातीय जनगणना, MSP गारंटी और सामाजिक न्याय पर केंद्रित था।
मोदी विरोध से व्यक्तिगत हमले तक
शुरू में राहुल की आलोचना मुद्दों पर आधारित थी, जैसे “मोदी जवानों के खून की दलाली कर रहे हैं” (2016, सर्जिकल स्ट्राइक के बाद)। यह विवादास्पद था, लेकिन ‘मुहब्बत की दुकान’ के बाद (2022-24) भाषा नरम हुई—प्रेम, एकता पर जोर। उदाहरण: बिहार की किसान न्याय पंचायत (फरवरी 2024) में “भाजपा नफरत फैला रही, हम मोहब्बत की दुकान खोलेंगे।”
बिहार की वोटर अधिकार यात्रा (अगस्त 2025) में भाषा आक्रामक हो गई। एक न्यूज़ रिपोर्ट के अनुसार, राहुल ने पीएम मोदी के लिए “तू-तड़ाक” वाली भाषा का इस्तेमाल किया, जैसे “नरेंद्र मोदी सुन…”—जो सड़कछाप लगती है।
“मुहब्बत की दुकान में नफरत का माल”
पटना में BJP कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस कार्यालय पर हमला किया, क्योंकि यात्रा के दौरान मोदी की मां को गाली दी गई। रिपोर्ट्स में कहा गया कि “मोदी विरोध इतना हावी हो गया है कि राहुल देशहित को नजरअंदाज कर रहे हैं, जैसे ट्रंप के ‘डेड इकॉनमी’ वाले बयान को सही ठहराना।” X पर BJP समर्थक इसे “मुहब्बत की दुकान में नफरत का माल” बता रहे हैं।
राहुल ने मर्यादा को किया तार-तार !
2025 में बिहार यात्रा के दौरान राहुल ने मोदी को “अरबपतियों की कठपुतली” कहा, लेकिन सभाओं में सहयोगी नेताओं की गालियां (मोदी मां को अपशब्द) ने मर्यादा तोड़ी। BJP ने इसे “घटिया राजनीति” कहा, और कहा कि “मुहब्बत की दुकान का माल नहीं बिका।”
यात्रा में BJP कार्यकर्ताओं पर हमले हुए, जैसे एक युवक को “मोहब्बत का पैगाम” देते हुए राहुल के बॉडीगार्ड ने पीटा। 2016 का “खून की दलाली” बयान पहले से विवादित था, जिस पर राहुल को क्लीन चिट मिली, लेकिन BJP ने इसे “बचकाना” कहा। अब यह पैटर्न दोहरा रहा है, जहां मुद्दों का विरोध व्यक्तिगत हो जाता है।
क्या ‘मुहब्बत की दुकान’ बंद हो रही है ?
राहुल की भाषा का यह बदलाव चुनावी दबाव (बिहार विधानसभा 2025) से प्रेरित लगता है, जहां मुद्दों का विरोध व्यक्तिगत हो गया। ‘मुहब्बत की दुकान’ अब “नफरत के सामान” से भर गई लगती है, जैसा कि रिपोर्ट्स कहती हैं। इससे राजनीतिक मर्यादा तार-तार हो रही है, और जनता का फैसला आने वाला है। राहुल को अपनी मूल पहचान (प्रेम की राजनीति) पर लौटना चाहिए, वरना यह नारा उल्टा पड़ सकता है। यह रिपोर्ट वर्तमान घटनाओं (अगस्त 2025) पर आधारित है, और आगे की यात्रा तय करेगी कि ‘दुकान’ खुलेगी या बंद।