प्रकाश मेहरा
उत्तराखंड डेस्क
देहरादून: उत्तराखंड को बने 25 साल हो चुके हैं…लेकिन सवाल अब भी वही है, क्या राज्य के विकास को सच में गति मिली ? हाँ, विकास हुआ है. सड़कें बनीं, शहर चमके, पर्यटन बढ़ा। लेकिन क्या मूल मुद्दों पर भी उतना ही ध्यान दिया गया? इस सवाल का जवाब आज भी अधूरा है।
राज्य के लोग सालों से भू-कानून, रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं और पाँचवीं अनुसूची की मांग करते आ रहे हैं। लेकिन सरकारें इन मुद्दों पर गंभीर नज़र नहीं डाल रहीं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बीते वर्ष भू-कानून लागू करने की बात तो कही थी, लेकिन वह कोशिश नाकाम रही। आज भी उत्तराखंड के कई ऐसे इलाके हैं जहाँ न शिक्षा की व्यवस्था है, न स्वास्थ्य की। लोग मजबूर होकर पलायन कर रहे हैं… और जो नहीं जा पा रहे, वो बिना सुविधाओं के जीने को विवश हैं।
सरकारें आती हैं, जाती हैं… वादे किए जाते हैं, लेकिन पूरे नहीं होते। कई स्कूल आज भी शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं, अस्पतालों में डॉक्टर और दवाइयाँ नहीं। लोगों को 25 से 30 किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है, फिर भी बेहतर सुविधा नहीं मिल पाती।
तो सवाल उठता है- आख़िर जनता भरोसा करे तो करे किस पर? जनता लगातार प्रदर्शनों के ज़रिए अपनी आवाज़ सरकार तक पहुंचाने की कोशिश करती रही है, लेकिन शायद सरकार के कानों तक वो आवाज़ पहुँच ही नहीं पा रही।
क्या सरकारें सिर्फ वोट तक ही सीमित हैं? या फिर जनता के मुद्दे, सिर्फ चुनावी भाषणों की एक पंक्ति बनकर रह गए हैं…?







