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Home राष्ट्रीय

190 करोड़ के धोखाधड़ी मामले में ED का बड़ा एक्शन!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
November 15, 2025
in राष्ट्रीय
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ED
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मुंबई: देश में एक बड़ी ऑडिट-जांच के बाद एक बड़ा निर्यात घोटाला सामने आया है. जिसमें एक आयात-निर्यात नेटवर्क ने वर्ष 2015-17 के दौरान अवैध रूप से सीमा शुल्क वसूल किए जाने से बचने की साजिश रची थी. इसके तहत फ्री ट्रेड वेयरहाउसिंग ज़ोन (FTWZ) के दायरे का दुरुपयोग किया गया और माल को ‘निर्यात’ दिखा कर घरेलू बिक्री की गई. इस पूरे मामले में सरकार को अनुमानित रूप से 190 करोड़ रुपये की चपत लगाई गई. ऐसे समय में जब कई व्यवसायों पर निगरानी बढ़ी हुई है, इस तरह का मामला सीधे कॉर्पोरेट गवर्नेंस, सीमा शुल्क नीति तथा लॉजिस्टिक चेन के भरोसे को चुनौती देता नजर आ रहा है.

कौन हैं प्रमुख आरोपी?

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इस मामले के मुख्य पात्रों में सबसे प्रमुख नाम हैं विकास गर्ग का, जो दिल्ली के जाने माने उद्योगपति हैं. उनके कई सूचीबद्ध एवं निजी उपक्रम हैं. वे Vikas Ecotec, Vikas Lifecare, Eraaya Lifespaces, Advika Capital आदि के प्रमोटर बताए गए हैं. इसके साथ-साथ, वे अमेरिका-सूचीबद्ध कंपनी Ebix Inc के अध्यक्ष के पद पर हैं, जिसका अधिग्रहण हाल ही में उन्होंने किया था.

इसके अलावा, वे आयात-मॉड्यूल में शामिल हैं. विकास के अलावा Titan Sea & Air Service Pvt Ltd (मुंबई) और इसके निदेशक, सहयोगी जैसे जगन्नाथ राय, चंद्रशेखर राय भी आरोपियों की सूची में शामिल हैं. इसके अलावा, लॉजिस्टिक ट्रांसपोर्ट कंपनियों और यूएई-आधारित फर्मों के सहयोगियों के नाम भी FIR में सामने आए हैं.

धोखाधड़ी और साज़िश का रोडमैप

FIR के मुताबिक, Titan Sea ने मुंबई स्थित FTWZ (अर्शिया फ्री ट्रेड वेयरहाउसिंग ज़ोन) में 1,077.99 मीट्रिक टन पीवीसी रेजिन का शुल्क-मुक्त आयात किया, जिसे निर्यात दिखाया जाना था. लेकिन वास्तविकता में यह माल भारत के घरेलू टैरिफ क्षेत्र (DTA) में बेचा गया. इस दौरान निर्यात के प्रमाण और शिपिंग बिलों में जालसाजी की गई.

गंतव्य नेपाल या बांग्लादेश दिखाया गया क्योंकि FTWZ  निर्यात का कैलिब्रेशन था. उदाहरण के तौर पर, दस्तावेजों में नेपाल या बांग्लादेश निर्यात दर्शाया गया, मगर माल साक्षी मार्केटिंग प्रा. लि. जैसे दिल्ली-निवासी खरीदारों को बेच दिया गया. इसके परिणामस्वरूप सरकार को सीमा शुल्क वसूल करने का अवसर ही नहीं मिला. कुल मिलाकर, फ्री-ट्रेड ज़ोन नियमों (SEZ/FTWZ) का दुरुपयोग, लॉजिस्टिक नेटवर्क की मिलीभगत, जाली दस्तावेज़ और ट्रांसफर चैनल की संलिप्तता इस साज़िश की पोल खोलती है.

कार्रवाई की शुरुआत

यह मामला वर्ष 2023 में दर्ज सीबीआई की एफआईआर पर आधारित था, जिसे आयात-घोटाले मॉड्यूल के रूप में स्थापित किया गया था. इसके पहले Directorate of Revenue Intelligence (DRI) ने शुरुआती कार्रवाई की थी. इस बार Enforcement Directorate (ईडी) ने 2025 के हालिया चरण में बुधवार को छापामारी की. दिल्ली और दूसरे स्थानों पर विकास गर्ग तथा सहयोगियों के ठिकानों पर छापेमारी की गई. इन छापों में आयात-रजिस्ट्रेशन, बैंक रिकॉर्ड, फ्री ट्रेड ज़ोन के अंदर ट्रांसफर, लॉजिस्टिक ट्रकिंग, खरीदारों-ट्रांसपोर्टरों की जानकारी एवं दस्तावेजीय सबूत जुटाए गए.

कंपनियों-उपक्रमों की भूमिका

विकास गर्ग केवल एक नाम नहीं हैं; वे कई LISTED/UNLISTED कंपनियों के प्रमोटर हैं. जिनमें Vikas Ecotec, Vikas Lifecare, Eraaya Lifespaces और Advika Capital शामिल हैं. उनका हालिया NASDAQ-सूचीबद्ध Ebix Inc अधिग्रहण भी एक प्रमुख कॉर्पोरेट कदम था, जिसने उनकी प्रोफाइल को और सार्वजनिक बना दिया. इन कंपनियों का संबंध लॉजिस्टिक, रियल-एस्टेट व आयात-निर्यात से था, जो इस तरह की सीमा शुल्क-साज़िश में उपयुक्त प्लेटफॉर्म भी देता है. मीडिया ने इस बात को भी उजागर किया है कि Ebix-Eraaya डील में शेयर-हेराफेरी व धोखाधड़ी के दोष-संकेत मिल चुके हैं.

लॉजिस्टिक नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय कड़ी

इस बड़े घोटाले में ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक कंपनियों की भूमिका अहम रही है. उदाहरण स्वरूप, GRC India Logistics, नवी मुंबई के साझेदार जितेंद्र बंसल व बृज मोहन बिश्नोई का नाम FIR में आया है. यूएई-आधारित कंपनियों जैसे Al Dukook General Trading LLC व Land Star Limited को भी आयात स्रोत बताया गया है. आयातित पीवीसी रेजिन इन फर्मों से आकर फ्री-ट्रेड ज़ोन में दाखिल हुआ. यह नेटवर्क दिखाता है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय व घरेलू लॉजिस्टिक प्लेटफॉर्म मिलकर सीमा शुल्क धोखाधड़ी को व्यवस्थित कर सकते हैं.

दस्तावेज में हेराफेरी और जालसाजी

एफआईआर में उल्लेख है कि आयातक व ट्रांसपोर्टर मिलकर शिपिंग बिल, पैकिंग सूचियां, चालान आदि में छेड़छाड़ कर रहे थे. कोरीक्लेयर क्लियरिंग एजेंट व FTWZ में तैनात लोक सेवकों के जाली हस्ताक्षर व मोहरें इस साजिश का हिस्सा थे. माल को निर्यात गंतव्य नेपाल या बांग्लादेश दिखाया गया, जहां से हकीकत में भारत-वित्र DTA क्षेत्र में पहुंच गया. परिणामस्वरूप सीमा शुल्क विभाग को पता ही नहीं चला कि ये माल घरेलू बिक्री के लिए थे. इस तरह जालसाजी-चैनल इतनी बारीकी से चलाया गया कि आयात के दौरान शुल्क-मुक्त दर्जा लिया गया और बाद में बेचे गए माल पर शुल्क नहीं लिया गया. जिसकी वजह से सरकार को लगभग 190 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

करो़ड़ों का अनुमानित नुकसान

एफआईआर के विवरण के अनुसार, डीटीए क्षेत्र में हस्तांतरित माल के मूल्य लगभग 197.28 करोड़ रुपये थे, जिन पर 190 करोड़ रुपये करीब सीमा शुल्क लगना था लेकिन वसूली नहीं हो सकी. ऐसे घोटाले सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं बल्कि विश्वासघात, नीति-भ्रष्टाचार व सिस्टमिक कमजोरी का संकेत भी हैं.

इन धाराओं के तहत मामला दर्ज

सीबीआई ने इस मामले में आईपीसी धारा 120B (षड़यंत्र), 420 (धोखाधड़ी), 468, 471 (जालसाजी) और अन्य आरोप लगाए हैं. साथ ही, ईडी के तहत मनी-लॉन्ड्रिंग (PMLA) की जांच भी चल रही है. एजेंसियों ने सेबी को भी निवेशकों व शेयर-हेराफेरी के संदर्भ में हस्तक्षेप के लिए कहा है. इस तरह यह मामला सिर्फ सीमा शुल्क धोखाधड़ी नहीं रहा बल्कि कॉर्पोरेट गवर्नेंस, शेयर-बाजार और आतंकित लॉजिस्टिक चेन तक संदिग्ध रूप से फैला हुआ है.

संभावित परिणाम

इस तरह का मामला आर्थिक अपराध की जटिलता को सामने लाता है. फ्री-ट्रेड ज़ोन का दुरुपयोग, आयात-निर्यात चेन का प्रतिरूप, लॉजिस्टिक नेटवर्क की जटिलता और दस्तावेजी प्रमाणों की जालसाजी का खुलासा करता है. इसके चलते नियामक संस्थाओं जैसे सेबी, DRI, ईडी व सीबीआई को और अधिक सक्रिय होना होगा. ट्रांसपेरेंसी बढ़ाना, निगरानी कठोर करना और सिस्टम में छेद बंद करना होगा. इसके अलावा, सूचीबद्ध कंपनियों व उनके प्रमोटरों पर निवेशक व मीडिया का भरोसा गिर सकता है. इसलिए कॉर्पोरेट गवर्नेंस-मानदंड और जोखिम-प्रबंधन और भी महत्वपूर्ण हो गया है.

शेयरधारकों के सामने चुनौतियां

जब एक प्रमुख सूचीबद्ध कंपनी (Ebix Inc) और उसके प्रमोटर इस प्रकार के आरोपों की चपेट में आते हैं, तो न सिर्फ कंपनी की छवि प्रभावित होती है बल्कि शेयरधारकों-निवेशकों की चिंता बढ़ जाती है. मीडिया की रिपोर्ट्स में कहा गया है कि Ebix-Eraaya डील में भी हेराफेरी और धोखाधड़ी के संकेत मिल चुके हैं. इससे पता चलता है कि निवेशक-सावधानी का महत्व बढ़ गया है, विशेषकर ऐसे मामलों में जहां प्रमोटर-प्लेटफॉर्म काफी विस्तृत हों.

सिस्टम की कमज़ोरी

190 करोड़ रुपये का यह अनुमानित नुकसान सिर्फ एक संख्या नहीं है, यह उस सिस्टम की कमज़ोरी का संकेत है जिसमें एक व्यवस्थित नेटवर्क ने सीमा शुल्क वसूलने की प्रक्रिया को चकमा दिया. इसमें शामिल हैं बड़े प्रमोटर, सूचीबद्ध कंपनियां, लॉजिस्टिक नेटवर्क, फ्री-ट्रेड ज़ोन का दुरुपयोग और जाली दस्तावेज़. जब कारोबारी गठबन्धन इतना जटिल हो जाए, तो नियामक संस्थाओं की सतर्कता और जवाबदेही बढ़ जाना चाहिए. अगर जांच पूरी होती है और दोषियों को सजा मिलती है, तो यह सिर्फ एक मामला नहीं रहेगा, बल्कि एक उदाहरण बनेगा.

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