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Home राष्ट्रीय

जलवायु, हवा और उत्तर भारत के मैदानी इलाकों के लिए क्यों जरूरी है अरावली पर्वतमाला?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 31, 2025
in राष्ट्रीय
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aravalli mountain
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नई दिल्ली। केंद्र सरकार की ओर से 13 अक्टूबर को प्रस्तावित अरावली की नई परिभाषा में खनन और अन्य विकास गतिविधियों से सुरक्षा के दायरे से करीब 90 फीसदी हिस्से बाहर हो जाते हैं। बता दें कि इस परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को स्वीकार कर किया था।

लोगों को डर है कि इस परिभाषा से अरावली पर्वतमाला में उत्तरी और उत्तर पश्चिमी भारत को विविध पारिस्थितिक और पर्यावरणीय लाभ पहुंचाने वाली पहले से ही खराब हो चुकी पहाड़ी के लिए एक बड़ा झटका साबित होगी।

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अरावली के लिए नई परिभाषा सामने आने के बाद लोगों ने प्रदर्शन शुरू किया। इसके बाद सरकार ने बुधवार को राज्यों को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि खनन के लिए एक मैनेजमेंट प्लान बनाए जाने तक अरावली में कोई भी नया खनन पट्टा जारी न किया जाए। ऐसे में आइए समझते हैं कि आखिर ये अरावली पर्वतमाला क्यों जरूरी है?

मैदानी इलाकों में रेत आने से रोकती है

करीबन एक अरब वर्ष पुरानी अरावली दुनिया में सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक हैं। ये पहाड़ियां पृथ्वी की पपड़ी की टेक्टोनिक प्लेट्स के टकराव के कारण पूर्व कैम्ब्रियन युग में बनी थीं। 700 किलोमीटर लंबी यह पर्वतमाला चार राज्यों- गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली और 37 जिलों में फैली हुई है, जिसमें 560 किलोमीटर राजस्थान में स्थित है।

हालांकि, इस समय अरावली पर्वतमाला अपने उद्गम के समय की तुलना में काफी हद तक छोटी हो चुकी है। यह प्राकृतिक कारकों और मानवीय गतिविधियों दोनों के कारण हुआ है। अभी भी अरावली कीमती इकोलॉजिकल सेवाएं दे रहा है। अगर पश्चिमी घाट को वाटर टावर और भारत का क्लाइमेट रेगुलेटर माना जाए तो अरावली श्रृंखला पूर्वी भारत और पूर्वीपश्चिमी मैदानी इलाकों के लिए इकोलॉजिकल शील्ड हैं।

ये पर्वतमाला पूर्वी मैदानी इलाकों को थार रेगिस्तान की रेत से बचाती हैं। यह उत्तर की हवा की गुणवत्ता को भी सुधारती हैं। अगर पर्वतमाला से कोई छेड़छाड़ हुई तो ये रेत दिल्ली-एनसीआर तक पहुंच सकती है।

साथ ही ये पहाड़ियां बड़ी मात्रा में बारिश भी लेकर आती हैं, जिससे खेती और पीने के लिए शुद्ध पानी प्रदान करता है। स्टडी के मुताबिक, जगलों की कटाई, पत्थर खनन और भूस्खलन के कारण अरावली पर्वतमाला में पहले की 12 प्रमुख दर्रे बन चुके हैं। ये दर्रे अजमेर जिले के मगरा पहाड़ियों से लेकर झुंझुनू जिले की खेतरी-मधोगढ़ पहाड़ियों और हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले की उत्तरी पहाड़ियों तक फैले हुए हैं।

अरावली में जल पुनर्भरण और जैव विविधता

हालांकि अरावली पर्वतमाला से प्रभावित जल निकासी और पुनर्भरण (वाटर रिचार्ज) के बारे में पर्याप्त बात नहीं की जाती, लेकिन इन पर्वतों की चट्टानी संरचनाएं जलभंडारों और भूजल स्तर को बढ़ाने और राजस्थान और गुजरात की मौसमी नदियों को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं। केंद्र सरकार की अरावली भूदृश्य पुनर्स्थापन कार्य योजना इस क्षेत्र में अरावली पर्वतमाला की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाती है।

गुरुग्राम स्थित अरावली जैव विविधता पार्क के इकोलॉजिस्ट और क्यूरेटर विजय धस्माना ने कहा कि अरावली पर्वतमाला की चट्टानें अत्यधिक विखंडित, अपक्षरित और छिद्रयुक्त हैं, जिससे वर्षा का जल सतह से बहने के बजाय जमीन में गहराई तक चला जाता है।

धस्माना ने कहा, “यह विशाल अदृश्य जल भंडार फरीदाबाद, गुरुग्राम और सोहना जैसे तेजी से बढ़ते शहरों और कस्बों की जल सुरक्षा के लिए अत्यंत जरूरी है। खनन, निर्माण या वनों की कटाई के कारण इस जल पुनर्भरण प्रणाली में किसी भी प्रकार की बाधा क्षेत्रीय जल उपलब्धता के लिए प्रत्यक्ष और गंभीर खतरा पैदा करती है।”

यहां 22 वन्यजीव अभयारण्य

जैव विविधता और वन्यजीवों के लिहाज से यह पर्वतमाला विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के फलने-फूलने के लिए शुष्क, पर्णपाती और अर्ध-शुष्क भूदृश्य मुहैया कराती है। इस श्रृंखला में 22 वन्यजीव अभयारण्य हैं, जिनमें से 16 राजस्थान में स्थित हैं जिनमें से तीन (रणथंबोर, सरिस्का और मुकुंदरा) बाघ अभ्यारण्य हैं।

इस भूभाग पर बाघ, तेंदुआ, स्लोथ बीयर, सांभर, चीतल, रेगिस्तानी लोमड़ी, काला हिरण, लकड़बग्घा, भेड़िया, सियार, घड़ियाल, मगरमच्छ जैसे अहम प्रजातियाँ पाई जाती हैं। ये प्रजातियां अर्ध-शुष्क झाड़ीदार जंगलों और अर्ध-शुष्क और शुष्क सवाना जंगलों को संरक्षित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

अगर अरावली की छोटी पहाड़ियों में खनन होना शुरू हुआ, तो वन्यजीवों के लिए बने रास्ते खत्म होने लगेंगे। धस्माना ने कहा,”मानवीय दबाव और वनों की कटाई के कारण अरावली की पारिस्थितिक समृद्धि तेजी से घट रही है और अब यह छोटे हो रहे वन क्षेत्रों और संरक्षित क्षेत्रों तक ही सीमित है। अरावली स्थानीय लोगों की आजीविका का भी आधार है और समुदाय जलाऊ लकड़ी, चारा, फल, सब्जियां और औषधीय पौधों पर निर्भर हैं।”

क्या हैं चुनौतियां?

अरावली पहले से ही अत्यधिक दबाव है और शहरीकरण, इंडस्ट्रियल क्लस्टर और अवैध खनन के कारण वर्षों से इसका क्षरण हो रहा है। केंद्र सरकार ने स्वयं ‘अरावली ग्रीन वॉल’ परियोजना के तहत अपनी कार्य योजना में इस व्यापक क्षरण को स्वीकार किया है।

अरावली पर्वतमाला में वनों की कटाई, खनन और मानव अतिक्रमण तेजी से बढ़ रहे हैं। केंद्र सरकार की कार्य योजना में कहा गया है,“1980 के दशक से पहले सरिस्का वन्यजीव अभ्यारण्य के आसपास की वन भूमि का उपयोग बदल दिया गया था, इससे वन क्षेत्र कम हो गया। रेगिस्तानी रेत के पूर्व की ओर बढ़ने से मरुस्थलीकरण और भी गंभीर हो रहा है, इससे गुरुग्राम और अलवर जैसे इलाके प्रभावित हो रहे हैं। खनन गतिविधियों ने जलभंडारों को भी नुकसान पहुंचाया है, इसने झीलों को सुखा दिया है और वन्यजीवों को सहारा देने की इस क्षेत्र की क्षमता को कम कर दिया है।”

धातुओं और खनिजों का भंडार

हालांकि ये चुनौतियां और भी बढ़ने वाली हैं, अरावली पर्वतमाला को धातुओं और खनिजों का भंडार माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत खनन योजना अध्ययन होने तक नए खनन पट्टों पर एक तरह से रोक लगा दी है, लेकिन उसने महत्वपूर्ण खनिजों के लिए अपवाद बनाने की केंद्र सरकार की सिफारिश को स्वीकार कर लिया है।

इस पर्वतमाला में सीसा, जस्ता, तांबा, सोना, टंगस्टन जैसे खनिज पाए जाते हैं और इसमें टिन, ग्रेफाइट, मोलिब्डेनम, नाइओबियम, निकेल, लिथियम और रेयर अर्थ एलीमेंट (आरईई) जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के भंडार मौजूद हैं। इन्हें एनर्जी ट्रांसिजन, हाई-टेक्नोलॉजी मैन्युफैक्चरिंग और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए रणनीतिक दृष्टि से अहम माना जाता है।

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