नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा नया लेबर कोड लागू करने के बाद आने वाले दिनों में कर्मचारियों को ओवरटाइम पेमेंट के तरीके और इसे पाने वालों में बदलाव देखने को मिल सकता है। नए लेबर कोड को आधिकारिक तौर पर 21 नवंबर, 2025 को नोटिफ़ाई किया गया था और केंद्र सरकार के नियम मई 2026 में आए थे। नए कोड के तहत, कानूनी ढांचा मोटे तौर पर काम के घंटों के स्टैंडर्ड स्ट्रक्चर को बनाए रखता है, साथ ही संबंधित सरकारों (केंद्र या राज्य) को रोजाना काम के घंटे, ओवरटाइम की सीमा और आराम के समय के बारे में विस्तृत नियम तय करने का अधिकार देता है। केंद्र के बाद अब राज्य सरकारों को नया नियम नोटिफाई करना होगा।
नए लेबर कोड के अनुसार काम के घंटे और ओवरटाइम
काम के सामान्य घंटे: एक दिन में आमतौर पर ज्यादा से ज्यादा 8 घंटे ही काम कराया जा सकता है।
हफ्ते के घंटे: पूरे हफ्ते में कुल मिलाकर 48 घंटे से अधिक काम नहीं लिया जा सकता।
ओवरटाइम और उसकी गणना
दोगुना पैसा: तय समय (8 घंटे) से ज्यादा काम करने पर हर घंटे के लिए दोगुना वेतन मिलेगा।
कर्मचारी की मर्जी: कोई भी कंपनी जबरदस्ती ओवरटाइम नहीं करवा सकती, इसके लिए कर्मचारी की सहमति जरूरी है। सरकार इसकी एक सीमा भी तय कर सकती है।
समय की गिनती का नियम
- अगर आपने 15 से 30 मिनट तक अतिरिक्त काम किया है, तो उसे पूरा 30 मिनट गिना जाएगा।
- अगर आपने 30 मिनट से ज्यादा काम किया है, तो उसे पूरा 1 घंटा माना जाएगा।
मेडिकल चेकअप का समय:
इस नए नियम के तहत अगर कर्मचारी का मेडिकल टेस्ट या जानकारी देने में समय जाता है, तो उसे भी काम के घंटों में ही गिना जाएगा (यानी उसका पैसा नहीं कटेगा)।
एक दिन की सैलरी की गिनती
महीने का वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए एक दिन की सैलरी निकालने के लिए कुल महीने की सैलरी को 26 से भाग किया जाएगा। इसी के आधार पर ओवरटाइम का पैसा तय होगा।
अधिकतम सीमा: कोई भी कर्मचारी लगातार ओवरटाइम नहीं कर सकता। कुछ खास हालातों को छोड़कर, 3 महीने (एक तिमाही) में ज्यादा से ज्यादा 144 घंटे ही ओवरटाइम करने की अनुमति है।
ओवरटाइम पेमेंट के लिए कौन योग्य है?
मोटे तौर पर “वर्कर्स” (कामगारों) के लिए ओवरटाइम की व्यवस्था है। नया लेबर कोड उन कर्मचारियों को ओवरटाइम का हकदार बनाता है जिनकी न्यूनतम मजदूरी दरें वेजेज कोड के तहत तय की गई हैं। हालांकि, व्हाइट-कॉलर और सैलरी पाने वाले कर्मचारियों के मामले में स्थिति जटिल है। जानकारों का कहना है कि पुराने समय से ही, मैनेजर और सुपरवाइजर लेवल के कर्मचारियों को अक्सर लेबर कानूनों के तहत ओवरटाइम के फायदों से बाहर रखा जाता था। लेबर कोड्स के ढांचे के तहत भी यही तरीका जारी रहने की संभावना है।







