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Home राष्ट्रीय

UGC का इक्विटी नियम क्या है और इस पर क्यों मचा हंगामा?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 28, 2026
in राष्ट्रीय
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ugc
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नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता लाने के लिए यूजीसी (UGC) ने नए नियम बनाए हैं। ये नियम 2026 तक लागू होंगे। ये नियम 2019 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की आत्महत्याओं के बाद आए हैं। इन छात्रों की मौत जातिगत भेदभाव के कारण हुई थी। पुराने नियम सिर्फ सलाह देते थे, लेकिन नए नियम कड़े हैं और इन्हें मानना जरूरी है।

नए नियमों के तहत, संस्थानों के मुखियाओं पर भेदभाव रोकने की जिम्मेदारी होगी। अगर कोई नियम तोड़ता है, तो उसे सजा मिलेगी। इन नियमों में ‘सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों’ (OBC) को भी शामिल किया गया है। लेकिन, सामान्य वर्ग के छात्र कह रहे हैं कि ये नियम उनके खिलाफ हैं।

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क्या हैं नए नियम?

यह नया नियम ढांचा 2012 के नियमों से बिल्कुल अलग है। पहले के नियम केवल सलाह देते थे और मुख्य रूप से SC/ST छात्रों पर केंद्रित थे। उनमें अपराधियों के लिए सजा का प्रावधान था, लेकिन संस्थानों की व्यवस्थागत जवाबदेही तय नहीं की गई थी। अब, 2026 के नियमों के तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान (HEI) में तीन-स्तरीय व्यवस्था होगी-

एक समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centre), जांच और सिफारिशों के लिए एक इक्विटी समिति (Equity Committee), और अपील के लिए एक बाहरी लोकपाल (External Ombudsperson)।

इसके अलावा, इक्विटी स्क्वाड (Equity Squads), इक्विटी एंबेसडर (Equity Ambassadors) और 24×7 इक्विटी हेल्पलाइन (Equity Helpline) जैसी सुविधाएं भी होंगी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब यूजीसी के पास इन नियमों को लागू करने की शक्ति है। नियम 11 के तहत, जो संस्थान पालन नहीं करेंगे, उन्हें यूजीसी की योजनाओं से बाहर किया जा सकता है, डिग्री या ऑनलाइन कार्यक्रम चलाने की अनुमति रद्द की जा सकती है, या मान्यता प्राप्त सूचियों से पूरी तरह हटाया जा सकता है।

यूजीसी अधिकारियों ने इन दिशानिर्देशों का बचाव करते हुए कहा है कि ये सभी प्रकार के भेदभाव को कवर करते हैं, जिनमें ‘उच्च जाति’ के छात्रों द्वारा सामना किए जाने वाले भेदभाव भी शामिल हैं। हालांकि, यह दावा पूरी तरह संतोषजनक नहीं माना गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ‘आरक्षित’ श्रेणियों के विपरीत, उच्च जातियों का विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया गया है, जिससे अस्पष्टता बनी हुई है। हालांकि, ‘आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों’ (Economically Weaker Sections) की श्रेणी में उनमें से एक बड़ा हिस्सा शामिल माना जा रहा है।

क्यों हो रहा है विवाद?

उच्च जातियों के छात्र इस बात से भी नाखुश हैं कि झूठी शिकायतों के खिलाफ कोई निवारक उपाय नहीं दिया गया है। यह ध्यान देने योग्य है कि 2025 के दिशानिर्देशों में झूठी शिकायतों के खिलाफ एक सुरक्षा उपाय प्रदान किया गया था। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के ‘कोई उत्पीड़न नहीं/कोई दुरुपयोग नहीं का वादा’ को इस बात का संकेत माना जा रहा है कि सरकार शिकायतों के प्रति सहानुभूति रख सकती है। हालांकि, इस पर स्पष्टता तब तक नहीं मिलेगी जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई नहीं कर लेता।

एक और चिंता यह है कि भेदभाव की परिभाषा थोड़ी अस्पष्ट है, जिसे उत्पीड़न के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। भेदभाव में छिपी हुई, अप्रत्यक्ष और संरचनात्मक अनुचितता शामिल है, और ऐसा आचरण जो स्पष्ट इरादे के बिना भी समानता या गरिमा को प्रभावित करता है।

छिपे हुए भेदभाव या गरिमा को प्रभावित करने जैसी अवधारणाओं को स्पष्ट नहीं किया गया है। इससे विवादित मामलों में असंगत या व्यक्तिपरक व्याख्या की संभावना बढ़ जाती है।

प्रावधानों की व्यापक प्रकृति समितियों को काफी विवेक भी देती है। विरोधियों की ओर से बताई गई चिंता इस बात से और बढ़ जाती है कि पैनलों की संरचना ‘आरक्षित श्रेणियों’ के पक्ष में झुकी होगी।

अभी भी कुछ चीजें अनसुलझी हैं। नियमों में प्रतिवादियों (जिन पर आरोप लगे हैं) के लिए सुरक्षा उपायों का उल्लेख नहीं है। जैसे कि गोपनीयता, परामर्श सहायता, या यदि आरोप झूठे साबित होते हैं तो प्रतिष्ठा की मरम्मत।

समय-सीमा कम होने और पैनलों को व्यापक विवेक मिलने के कारण, संस्थानों को अपनी गति और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाना होगा।

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