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Home राष्ट्रीय

‘जलकुंभी से भरी नदी में’ संवेदनाओं और सरोकारों का बोध

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
January 30, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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डॉ. लोकेन्द्र सिंह


नई दिल्ली: हिन्दी साहित्य के विस्तृत आकाश में जब कोई युवा हस्ताक्षर अपनी पहली कृति के साथ उपस्थित होता है, तो उससे कई उम्मीदें जुड़ जाती हैं। अशोकनगर, मध्यप्रदेश के युवा कवि पुरु शर्मा का पहला काव्य संग्रह ‘जलकुंभी से भरी नदी में’ उन उम्मीदों पर न केवल खरा उतरता है, बल्कि भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करता है। यह संग्रह एक ऐसे युवा मन का दर्पण है जो अपने अध्ययन और समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता के धागों से बुना गया है। पुरु की कविताओं में कोमलता का अहसास है। अपने समय की पीढ़ी से जनसरोकारों पर सीधा संवाद है।

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पर्यावरण संरक्षण की चिंता उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। अपनी विरासत को लेकर गौरव की अनुभूति है। अपनी कविता के माध्यम से पुरु साहित्य के धुंरधरों से साहित्य के धर्म की बात करते हैं। कहना होगा कि पुरु शर्मा की कविताएँ केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों का बयान नहीं हैं, बल्कि वे अपने समय, समाज, संस्कृति और पर्यावरण के प्रति एक सजग नागरिक की चिंताएँ हैं। संग्रह के शीर्षक से ही पर्यावरण के प्रति कवि का गहरा सरोकार स्पष्ट होता है। एक युवा कवि का अपने देश और संस्कृति के प्रति ऐसा अनुराग देखकर सुखद आश्चर्य होता है।

युवा कवि पुरु शर्मा की कविताओं का फलक विस्तृत है। इनमें गाँव की सोंधी महक है, तो शहर की दहलीज पर छूटती संवेदनाओं की कसक भी। इनमें विरासत का गौरव है, तो ‘नदियों का कत्ल करने वाली पीढ़ी’ के प्रति तीखा आक्रोश भी। सुप्रसिद्ध कवि डॉ. हरिओम पवार ने सही रेखांकित किया है कि पुरु प्रतिदिन के जिन विषयों को उठाते हैं, अपनी लेखनी से उन्हें ऐसा विस्तार देते हैं कि पाठक विस्मित होकर सोचने पर विवश हो जाता है।

इस संग्रह की एक मुख्य अंतर्धारा ‘लौटने’ की है- गाँव की ओर, प्रकृति की ओर और अपने पुरखों के मूल्यों की ओर। जैसा कि राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष इंदुशेखर तत्पुरुष ने टिप्पणी की है- “यह लौटना केवल व्यक्तिगत नॉस्टेल्जिया नहीं है, बल्कि यह एक गहरी ‘आध्यात्मिक-सांस्कृतिक तृषा’ है, जो व्यक्ति, प्रकृति, समाज और परमात्मा के पारस्परिक सहज संबंधों के विच्छिन्न होने से उत्पन्न होती है”।

कवि पुरु शर्मा स्वयं अपने आत्मकथ्य में मानते हैं कि कविता मात्र आत्माभिव्यक्ति नहीं, बल्कि शताब्दियों के संचित ज्ञान और सांस्कृतिक मनीषा का निचोड़ है। उन्होंने लिखा है- “जब कोई कवि लिखता है तो मात्र आत्माभिव्यक्ति नहीं करता, कवि अपनी सांस्कृतिक मनीषा को, शताब्दियों के संचित ज्ञान और अनुभवों के निचोड़ को व्यक्त करता है। कविता मनुष्यता के पक्ष में ऐसी सशक्त आवाज है, जो निरंतर विद्रूप को तोड़कर उसे ज्यादा मानवीय और सुंदर बनाने का काम करती है”।

‘जलकुंभी से भरी नदी में’ में कुल 47 कविताएँ विविध रंगों से सजी हैं। पर्यावरण संरक्षण पर उनकी चिंता ‘नदियों का कत्ल करने वाली पीढ़ी’ कविता में बहुत मारक ढंग से उभरती है- “पास कोई शहर है जो आहिस्ता-आहिस्ता निगल रहा है नदी को… दर्द में रेंग रही है नदी”। वहीं दूसरी ओर, यह संग्रह साहित्य और पुस्तकों के महत्व को बहुत खूबसूरती से स्थापित करता है। डिजिटल युग में ‘अदृश्य पुरखे’ और ‘किताबें’ जैसी कविताएँ पुस्तकों को हमारी सबसे विश्वसनीय शरणस्थली और रेगिस्तान में छांव के रूप में चित्रित करती हैं।

‘अदृश्य पुरखे’ में उनके भावों से जुड़कर किताबों के महत्व को समझने की कोशिश कीजिए- “हम जब भी कभी/ थककर, हताश या टूटकर गिरते हैं / हमेशा किताबों की हथेलियों में ही गिरते हैं। / किताबें हमारे लिए अदृश्य पुरखे हैं / उनकी ममत्व की गोदी / हमारे लिए सबसे विश्वसनीय शरणस्थली है।” इसी प्रकार ‘किताबें’ बाँचकर देखिए, वे हमसे क्या कहना चाहती हैं- “रेगिस्तान में छांव-सी हैं किताबें / दिल में गाँव सी हैं किताबें / यादों के समंदर में / नाव सी हैं किताबें।”

घोर निराशा के दौर में पुरु शर्मा की कविताएँ उम्मीद का दामन नहीं छोड़तीं। ‘उम्मीद का उजाला’ जैसी रचनाएँ उनके सकारात्मक दृष्टिकोण का प्रमाण हैं- “माना रात घनी है, घोर तमस से भरी है / उजियारी भोर के सामने कई चुनौतियां धरी हैं। / तुम सूरज पर ऐतबार बनाए रखना / उम्मीदों के दीपक जलाए रखना।” एक ओर कविता को देखिए, कवि किस प्रकार विपरीत परिस्थितियों का सामना मुस्कुराकर करने का साहस अपने पाठकों के हृदय में उतार रहा है- “उजालों की निशानी संभाले रखना/ उम्मीदों की लौ जलाए रखना।/ गुजरेंगी मुश्किलों की हवाएं भी/ बस होठों पे मुस्कुराहट बनाए रखना”।

आज के समय में व्यक्ति को सबसे अधिक आवश्यकता इसी भरोसे की है। चारों ओर से नकारात्मकता में घिरे मनुष्य के मन में आशा के कुछ बीज बोने का काम हम साहित्यकारों का धर्म है। अन्यथा मनुष्य टूटकर बिखर जाएगा और हम देखते रह जाएंगे। अगर हमारे कुछ शब्द और भाव, किसी को संभालने में सहयोगी होते हैं, तो यह हमारी कलम की सार्थकता है।

एक युवा मन प्रेम के अहसास से अछूता कैसे रह सकता है? पुरु शर्मा के इस काव्य संग्रह में प्रेम रस में पगी कविताएं भी पाठकों मन को सुकून देती हैं। ‘अधूरा प्रेमपत्र’ में प्रेम में इंतजार की मिठास को उन्होंने बहुत सहजता से व्यक्त किया है। ‘लास्ट बेंच’ पर बैठकर उन्होंने कभी ‘प्रेम की इबारत’ लिखी थी, उसे ‘मोहब्बत’ तक पहुँचाने का काम बहुत चातुर्य के साथ कवि ने किया है। ‘दिल की बातें’ कहने का सलीका ही तो कवि की ताकत है। ‘ख्वाहिशें’ हजार हों लेकिन उन्हें कहना न आया, तो क्या बात हुई। ‘अधूरे प्रेमपत्र’ में कवि प्रेम पर बहुत बड़ी बात कह गया है- “ताउम्र किसी के इंतजार में होना/ प्रेम में होने की पहली सीढ़ी है।”

पुरु शर्मा की भाषा बेहद सहज और सरल है, जो सीधे पाठक के दिल में उतरती है। उनमें युवा मन का अल्हड़पन और एक गंभीर अध्ययेता की परिपक्वता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे अपनी बात कहने के लिए आडंबर का सहारा नहीं लेते, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर अलंकृत भाषा-शैली का कौशल दिखाने से भी नहीं चूकते। कुल मिलाकर, ‘जलकुंभी से भरी नदी में’ एक समर्थ युवा कवि का दमदार आगाज है।

यह काव्य संग्रह बताता है कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कटी नहीं है, बल्कि वह आधुनिकता के शोर में अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का नया सूर्योदय तलाश रही है। साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश के सहयोग से प्रकाशित यह 74 पृष्ठीय पुस्तक हिन्दी काव्य प्रेमियों के लिए पठनीय और संग्रहणीय कृति है। यदि यह पुस्तक आपके संग्रह में रहेगी तो जब-तब आप इन कविताओं को गुनगुना सकते हैं। इन्हें पढ़कर आनंदित हो सकते हैं।


  • पुस्तक : जलकुंभी से भरी नदी में (काव्य संग्रह)
  • कवि : पुरु शर्मा
  • प्रकाशक : संदर्भ प्रकाशन, भोपाल (साहित्य अकादमी म.प्र. के सहयोग से)
  • पृष्ठ : 74
  • मूल्य : ₹250

समीक्षक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।

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