नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2017 के बाद अब दूसरी बार 25 से 26 फरवरी तक इजराइल में रहेंगे। इस ट्रिप के दौरान, उनके इजराइल की पार्लियामेंट नेसेट को एड्रेस करने और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बातचीत करने की उम्मीद है। मोदी के इस हाई-प्रोफाइल विजिट पर जाने के साथ ही, ऐसी खबरें सामने आई हैं कि इजराइल ने भारत को अपनी गोल्डन होराइजन बैलिस्टिक मिसाइल सप्लाई करने का ऑफर दिया है। इस प्रपोजल को अभी तक दोनों में से किसी ने भी कन्फर्म नहीं किया है।
गोल्डन होराइजन मिसाइलें क्या हैं?
गोल्डन होराइजन एक एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (ALBM) है। इस मिसाइल के बारे में ऑफिशियली ज्यादा जानकारी नहीं है। अक्टूबर 2024 में इजराइल के ईरान पर हमला करने से ठीक पहले, लीक हुए यूनाइटेड स्टेट्स इंटेलिजेंस डॉक्यूमेंट्स से पता चला कि इजराइल दो सिस्टम के साथ काम कर रहा था , एक अब तक अनजान गोल्डन होराइजन और रॉक्स, जो राफेल द्वारा डेवलप की गई मिसाइल है और माना जाता है कि यह पिछले एंकर मॉडल से ली गई है।
दूसरे जाने-माने इजराइली ALBMs हैं- रैम्पेज और एयर LORA, खबर है कि इजराइल पहले ही भारत को ये दोनों मिसाइलें बेच रहा है।
लेकिन बात गोल्डन होराइजन मिसाइल की करें तो इसकी रेंज लगभग 1,500 km से 2,000 km के बीच है। दूसरी ओर, रॉक्स, रैम्पेज और एयर LORA की रेंज लगभग 175 मील (282 km) है।
फर्स्टपोस्ट की खबर के मुताबिक, मिलिट्री-एविएशन के जाने-माने पत्रकार सेबेस्टियन रॉबलिन ने बिजनेस इनसाइडर को बताया, ‘गोल्डन होराइजन में शायद इतनी रेंज है कि इजराइली एयरक्राफ्ट ईरानी एयरस्पेस में घुसे बिना तेहरान तक पहुंच सकते हैं, जिससे बहुत सारा रिस्क खत्म हो जाता है।’
कुछ डिफेंस एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि गोल्डन होराइजन की ऑपरेशनल रेंज एक फाइटर जेट से लगभग 800 किलोमीटर है।
इजराइल के ब्लू स्पैरो की रेंज लगभग 1,250-मील (2011.68 km) है। स्पैरो मिसाइलों को असल में इराकी स्कड और ईरानी शहाब ग्राउंड-लॉन्च मिसाइलों की नकल करने के लिए डिजाइन किया गया था, ताकि इजराइल की एरो इंटरसेप्टर मिसाइलों की टेस्टिंग की जा सके।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, गोल्डन होराइजन, स्पैरो सीरीज से लिया गया हो सकता है। ओरिजिनल सिल्वर स्पैरो 8.3 मीटर लंबा है और लॉन्च से पहले इसका वजन 3,100 किलोग्राम है।
गोल्डन होराइजन भारत की डिफेंस को कैसे मजबूत कर सकता है?
इजराइल के गोल्डन होराइजन एयर-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइलों के ऑफर से भारत की मिलिट्री क्षमताएं मजबूत हो सकती हैं। हालांकि मिसाइल के बारे में जानकारी कम है, लेकिन ओपन-सोर्स डिफेंस रिपोर्ट्स का दावा है कि गोल्डन होराइजन को भारत के सुखोई Su-30MKI फाइटर जेट्स के साथ आसानी से इंटीग्रेट करने के लिए कस्टमाइज किया जा रहा है। ऐसे में इंडियन एयर फोर्स को ये मिसाइलें बेहद खतरनाक शक्ति प्रदान कर सकती हैं।
बैलिस्टिक मिसाइलें आमतौर पर फिक्स्ड रास्ते पर लॉन्च की जाती हैं और घने एयर डिफेंस नेटवर्क से उन्हें रोकना मुश्किल होता है। हवा से लॉन्च की जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें फाइटर जेट या बॉम्बर से ले जाई जाती हैं, ताकि वे जानी-पहचानी जमीनी लॉन्च जगहों की कमजोरी से बच सकें। Ynet News के मुताबिक, हवा से फायर किए जाने की वजह से इन बैलिस्टिक मिसाइलों को बहुत तेजी से हमला करने का फायदा मिलता है।
इजराइल का डिफेंस प्राइज दो बार जीतने वाले उजी रुबिन ने पहले कहा था, ‘वे किसी भी दिशा से आ सकते हैं और डिफेंस को बहुत मुश्किल बना सकते हैं।’
ALBMs को जमीन पर चलने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों पर बढ़त हासिल है, जिन्हें दुनिया भर की सेनाएं तैनात करती हैं।
सेंटर फॉर यूरोपियन पॉलिसी एनालिसिस के डिफेंस एक्सपर्ट फेडेरिको बोरसारी ने Forbes को बताया, ‘इजराइली ALBMs ईरान की SRBMs [शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों] की तुलना में ज्यादा ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी देती हैं, क्योंकि उन्हें हवा से तैनात किया जा सकता है, जिससे कुल मिलाकर ज्यादा दूरी तक पहुंचा जा सकता है। बता दें कि लॉन्च करने वाला एयरक्राफ्ट टारगेट के ज्यादा करीब पहुंचने से अच्छा ऐसा मानते हैं कि दूर से ही मिसाइल या बम द्वारा निशाना लगाया जा सके, जिसके लिए यह मिसाइल बेहतरीन मानी जा रही है।
कुछ देशों के पास ही हैं बैलिस्टिक मिसाइलें
क्रूज मिसाइलें भी आम हैं, लेकिन हवाई जहाज से लॉन्च की जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें अभी भी बहुत कम हैं। ऐसी मिसाइलें रूस, चीन और इजराइल जैसे कुछ ही देशों के पास हैं।
कैलिफोर्निया में मिडिलबरी इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज के जेम्स मार्टिन सेंटर फॉर नॉनप्रोलिफरेशन स्टडीज में ईस्ट एशिया नॉनप्रोलिफरेशन प्रोग्राम के डायरेक्टर जेफरी लुईस ने नवंबर 2024 में रॉयटर्स को बताया, ‘[एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइलों] का [एयर-लॉन्च्ड क्रूज मिसाइलों] के मुकाबले मुख्य फायदा यह है कि वे तेजी से सुरक्षा को भेद सकती हैं। इसका नुकसान — सटीकता — काफी हद तक हल हो गया लगता है।’
गोल्डन होराइजन का काम क्या और कैसे ब्रह्मोस से तेज?
कहा जाता है कि गोल्डन होराइजन को जमीन के नीचे दबे और बहुत मजबूत ढांचों, जैसे जमीन के नीचे कमांड बंकर या शील्डेड न्यूक्लियर सुविधाओं को नष्ट करने के लिए बनाया गया है। डिफेंस न्यूज इंडिया के अनुसार, इन तक स्टैंडर्ड एयर-टू-सरफेस मिसाइलें नहीं पहुंच सकतीं।
एयरक्राफ्ट से लॉन्च होने के बाद, मिसाइल एक हाई-आर्किंग बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी फॉलो करती है, और अपने टारगेट पर हमला करने से पहले स्पेस के पास की ऊंचाई तक उड़ती है। इस आखिरी फेज के दौरान, मिसाइल हाइपरसोनिक स्पीड तक पहुंच जाती है, जो Mach 5 से ज्यादा बताई जाती है।
इसे समझने के लिए, भारत की ब्रह्मोस मिसाइल की स्पीड Mach 2.8 है, जो आवाज की स्पीड से लगभग तीन गुना ज्यादा है। अगर भारत इज़राइल से गोल्डन होराइजन खरीदने के लिए डील करता है, तो इससे इंडियन एयर फोर्स के हथियारों का जखीरा बढ़ेगा और उसके डीप-स्ट्राइक ऑपरेशन बेहतर होंगे।







