प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर
नई दिल्ली: देश के राजनीतिक परिदृश्य में एक दल को छोड़ कर दूसरे में शामिल होने को लोकतांत्रिक अधिकार के तौर पर देखा जाता है। मगर सच यह भी है कि जब जनप्रतिनिधियों ने सिद्धांतों के बजाय सुविधा के मुताबिक पार्टी बदलने को एक आम चलन बनाना शुरू कर दिया, तब इस पर लगाम लगाने की जरूरत पड़ी और इसी क्रम में दल-बदल विरोधी कानून अस्तित्व में आया। विडंबना यह है कि इस कानून के लागू होने के बावजूद अलग-अलग कारणों का हवाला देकर विधायकों या सांसदों के पाला बदलने या दूसरी पार्टियों में शामिल होने के मामले आए दिन सामने आते रहे हैं।
सात सांसदों ने पार्टी छोड़ दी!
मगर इस बार आम आदमी पार्टी से जुड़े राज्यसभा के सात सांसदों ने जिस तरह अपने दल को छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी से जुड़ने की घोषणा की है, उसने एक बार फिर राजनीति में नैतिकता और दल-बदल कानून की प्रासंगिकता पर बहस छेड़ दी है। गौरतलब है कि राज्यसभा में आप के दस सांसद थे। उनमें से राघव चड्डा सहित सात सांसदों ने पार्टी छोड़ दी। उनका मानना है कि चूंकि अलग होने वाले सांसदों की संख्या दो-तिहाई की कसौटी पर पूरी है, इसलिए दल-बदल विरोधी कानून के तहत यह गलत नहीं है।
नैतिकता की कसौटी पर भी उचित मान
संभव है कि आप छोड़ कर भाजपा में शामिल होने वाले इन नेताओं के लिए सिर्फ कानून के प्रावधानों पर खरा उतरना ही किसी कार्रवाई से बचने के लिए काफी है, लेकिन सवाल है कि क्या केवल तकनीकी तौर पर सही होकर ही खुद को नैतिकता की कसौटी पर भी उचित मान लिया जा सकता है। यों, आम आदमी पार्टी की ओर से संबंधित सातों सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग करने की बात कही गई है।
हवाला यह दिया गया है कि दल-बदल कानून में राज्यसभा और लोकसभा में किसी भी प्रकार का विभाजन या गुटबंदी करने पर स्पष्ट तौर पर मनाही की गई है, भले ही वहां दो-तिहाई बहुमत हो। जाहिर है, आप के नेता अब दल-बदल से संबंधित कानूनी बारीकियों के मुताबिक कार्रवाई की उम्मीदं कर रहे हैं। मगर यह देखने की बात होगी कि इस मसले पर मान्यता का मुद्दा उठने पर अंतिम फैसला क्या आता है। एक सवाल अपना दल छोड़ कर सांसदों के भाजपा में शामिल होने और पार्टी के रूप में विलय से जुड़े संदर्भ का भी उठेगा।
राघव चड्डा की राजनीतिक सक्रियता
हालांकि पिछले कुछ समय से राघव चड्डा की राजनीतिक सक्रियता जिस तरह उलझी हुई दिख रही थी, उसके मद्देनजर पहले से ही उनके पार्टी से बाहर होने की संभावना जताई जा रही थी। मगर उनके साथ जिस तरह छह अन्य नेताओं ने ++ पार्टी छोड़ी है, उसे लेकर राजनीतिक हलके में थोड़ी हैरानी जताई जा रही है। देश की राजनीति में बिना किसी सैद्धांतिक आधार के सुविधा के मुताबिक पार्टी बदलने की प्रवृत्ति और इसके सहारे सरकारों की स्थिरता के प्रभावित होने के हालात को रोकने के लिए दल-बदल कानून बनाया गया था।
दल-बदल कानून की प्रासंगिकता
मगर पिछले कुछ वर्षों से इस कानून के तहत मिली छूट का लाभ उठा कर कई राज्यों में जिस तरह सरकारें बदली गईं, उसमें कहीं भी सैद्धांतिक कसौटी का खयाल रखना जरूरी नहीं समझा गया। ऐसे अनेक मामले सामने आए, जिनमें सिर्फ परिस्थितियों का लाभ उठाने के लिए विचारधारात्मक प्रतिबद्धता के सवाल को दरकिनार कर दिया गया और ऐसे नेताओं के लिए दल-बदल कानून कोई बाधा नहीं बना। इसी क्रम में आप के सात सांसदों के भाजपा में शामिल होने पर फिर यह सवाल उठा है कि आखिर दल-बदल कानून की प्रासंगिकता क्या रह गई है।







