प्रकाश मेहरा
एग्जीक्यूटिव एडिटर
नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष ने आधुनिक युद्ध की तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। अब युद्ध केवल सैनिकों और हथियारों के बल पर नहीं लड़ा जा रहा, बल्कि इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और एल्गोरिद्म की बड़ी भूमिका सामने आ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह “एल्गोरिद्मिक वॉर” का दौर है, जहां डेटा, मशीनें और ऑटोमेटेड सिस्टम यह तय करने लगे हैं कि किसे निशाना बनाया जाए।
मिडिल ईस्ट के मौजूदा संघर्ष में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर AI आधारित तकनीकों का इस्तेमाल देखने को मिल रहा है। सैन्य विश्लेषकों के अनुसार, युद्ध के दौरान विशाल मात्रा में जुटाए गए डेटा—जैसे सैटेलाइट इमेज, ड्रोन फुटेज, मोबाइल लोकेशन और डिजिटल कम्युनिकेशन—को AI सिस्टम तेजी से प्रोसेस कर रहे हैं। इसके आधार पर संभावित टारगेट की पहचान की जा रही है और हमले की रणनीति तैयार की जा रही है।
गंभीर नैतिक और कानूनी सवाल
AI की मदद से युद्ध में फैसले लेने की गति कई गुना बढ़ गई है। पहले किसी लक्ष्य की पहचान करने और उस पर कार्रवाई करने में लंबा समय लगता था, लेकिन अब एल्गोरिद्म कुछ ही सेकंड में संभावित टारगेट की सूची तैयार कर देते हैं। इसके बाद ड्रोन, मिसाइल या अन्य हथियारों के जरिए हमले किए जा सकते हैं।
हालांकि, इस तकनीक को लेकर गंभीर नैतिक और कानूनी सवाल भी उठ रहे हैं। कई मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि जब मशीनें और एल्गोरिद्म यह तय करने लगें कि किसे मारना है, तो इससे आम नागरिकों की सुरक्षा पर बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। अगर डेटा में गलती हो या एल्गोरिद्म गलत निष्कर्ष निकाल ले, तो निर्दोष लोगों की जान जा सकती है।
दुनिया की कई बड़ी शक्तियां
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि AI आधारित युद्ध भविष्य में और भी तेज़ी से विकसित होगा। दुनिया की कई बड़ी शक्तियां पहले ही अपने सैन्य सिस्टम में AI तकनीक को शामिल कर रही हैं। इससे युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है, जहां इंसानी निर्णय की जगह मशीनों और डेटा आधारित सिस्टम की भूमिका बढ़ती जाएगी।
मिडिल ईस्ट में चल रहे इस संघर्ष ने एक नई बहस को जन्म दिया है—क्या भविष्य की जंगें इंसानों के बजाय एल्गोरिद्म और मशीनें तय करेंगी? फिलहाल इतना साफ है कि युद्ध के मैदान में तकनीक की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी है, और आने वाले समय में यह ट्रेंड और भी तेज़ हो सकता है।







