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Home राजनीति

बिहार में तीन काम, जिसके लिए हमेशा लिया जाएगा नीतीश कुमार का नाम

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
April 12, 2026
in राजनीति, राज्य
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nitish kumar
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नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में नीतीश कुमार का नाम एक ऐसे नेता के रूप में लिया जाता है,जिन्होंने लंबे समय तक सत्ता में रहते हुए बिहार की छवि और व्यवस्था दोनों को बदलने का उदाहरण पेश किया. 2005 में जब उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री पद संभाला,तब बिहार को ‘बीमारू राज्य’कहा जाता था.कानून-व्यवस्था कमजोर थी,बुनियादी ढांचा जर्जर था और विकास की रफ्तार बेहद धीमी. ऐसे में उनके शासनकाल की पड़ताल यह समझने के लिए जरूरी है कि उन्होंने वास्तव में क्या बदला और क्या चुनौतियां अब भी बाकी हैं.

नरसंहार की घटना और सीएम नीतीश कुमार की शपथ 

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बात दो दशक पहले की है. 11 अगस्त 2005 को पकरीबरावां के डोला गांव में सामूहिक नरसंहार की घटना हुई थी. जातीय नरसंहार की घटना में पांच लोगों की जान चली गई थी. नवादा,नालंदा और शेखपुरा जिले में 1999 के बाद से जातीय नरसंहार की 9वीं बड़ी घटना थी.  जातीय नरसंहार के हिंसा प्रतिहिंसा की घटना में इस अंतराल में 200 से अधिक लोगों की जानें चली गईं थीं.लोगों का जीना मुश्किल था. लोगों को अपनी जान बचाना मुश्किल था, लेकिन नवंबर 2005 में नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

इसके बाद जातीय नरसंहार की घटनाएं अतीत की कहानी बन गईं. दोनों गिरोह के प्रमुख सरगना अखिलेश सिंह और अशोक महतो समेत कई लोगों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया.स्पीडी ट्रायल के तहत कारवाई शुरू की गई.अशोक महतो समेत कई को सजाएं हुई.इसके बाद क्षेत्र में शांति और खुशहाली आई, जो अबतक कायम है. अब क्षेत्र में जातीय नरसंहार की नहीं बल्कि विकास की बात होती है. रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की बात होती है.अब यूपीएससी और बीपीएससी जैसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में इस इलाके की चर्चा होती है.

कानून व्यवस्था और स्पीडी ट्रायल से बदली बिहार की छवि

दरअसल, ऐसी तस्वीर सिर्फ नवादा, नालंदा और शेखपुरा में नहीं बदली. कानून व्यवस्था में सुधार और स्पीडी ट्रायल से पूरे बिहार की स्थिति बदल गई. लोग यह महसूस करने लगे कि अब कानून का राज स्थापित है.लोगों को भरोसा हो गया कि सुशासन की सरकार है. अब कोई गलत करेगा तो अपनी बात सरकार तक पहुंचा सकेंगे और सरकार भी उनकी बातों पर अमल करेगी. अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई से बिहार में अमन और शांति आई. इसके चलते जो बिहार अपराध और अपहरण के चलते बदनाम थी, बिहार को उस छवि से मुक्ति मिली.

दरअसल, बड़े बड़े अपराधियों, गैंगस्टर और राजनेताओं पर कार्रवाई हुई. बंदूक और राइफल की नाली गाड़ी से निकाल कर चलने वाले, काला शीशा की बंद गाड़ी में चलने वालों पर कार्रवाई हुई. इसके चलते लोगों को भरोसा हुआ कि जब बड़े अपराधियों और दिग्गज और बाहुबली राजनेताओं पर कार्रवाई हो सकती है. वे सलाखों के पीछे जा सकते हैं. तब छोटे छोटे अपराधियों पर भी कार्रवाई होगी और ऐसा देखने को भी मिला. बड़ी तादाद में अपराधी जेल भेजे गए,सजाएं हुईं.लिहाजा, दिनों दिन अपराध में कमी आई. अपराध के डर से पलायन करने वाले लोग बिहार में रोजी रोजगार और उद्योग धंधे की बात करने लगे. देर रात तक बाजार खुलने लगे. देर रात तक लोग सफर करने लगे. इसका असर आम जन मानस पर पड़ने लगा. बाहरी सैलानी भी आने लगे.इसका सीधा असर हुआ कि बाहर में जो बिहार की बदनाम छवि थी, उससे मुक्ति मिली.नक्सल गतिविधियों पर भी लगाम लगा.

सड़क से बदली बिहार की सूरत

खराब और जर्जर सड़कों के कारण देश में बिहार की भयावह तस्वीर थी. चूंकि कोई भी यात्रा जोखिम से भरा होता था. कई जगहों पर 10 किलोमीटर की दूरी तय करने में घंटा भर का समय लग जाता था,लेकिन कानून व्यवस्था के बाद दूसरी बड़ी उपलब्धि सड़क पुल पुलिया का निर्माण  रहा है.बिहार के किसी भी क्षेत्र से राजधानी पटना की दूरी तय करना अब आसान हो गया है.राजधानी से अधिकतम दूरी का क्षेत्र पांच छह घंटे रह गया है. सरकार इसे चार से पांच घंटे करने की दावा कर रही है.

यही नहीं, व्यापक पैमाने पर ग्रामीण सड़कों का निर्माण किया गया है. 250 आबादी वाले अधिकांश गांवों को पक्की सड़क से जोड़ दिया गया है. बड़े पैमाने पर पुल पुलिया का निर्माण किया गया है. सड़कों के निर्माण से ना सिर्फ आवाजाही सुगम हुआ है बल्कि रोजी रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं.

महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक फैसले

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में कई निर्णयों से देश में नजीर प्रस्तुत किया. नीतीश कुमार कई ऐसे फैसले लिए जो आधी आबादी के वरदान साबित हुआ. त्रिस्तरीय पंचायती राज और नगर निकाय में महिलाओं को 50 फीसदी का आरक्षण प्रदान किया गया. लिहाजा,घर की देहरी में कैद रहने वाली महिलाएं चहारदीवारी से बाहर आईं. मुखिया, उप मुखिया, सरपंच, उप सरपंच, प्रमुख, उप प्रमुख, जिला परिषद अध्यक्ष उपाध्यक्ष जैसे पदों पर गरीब और कमजोर तबके की महिलाएं बैठने लगीं.

अधिकारियों के साथ बैठक करने लगीं. अहम फैसले करने लगीं.इसका सीधा असर समाज में दिखने लगा.नगर इकाई के चुनावों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी. अपराधियों पर अंकुश के कारण पुरुष अपने परिजनों को चुनाव में उतारने लगे. लिहाजा, कई जगहों पर पुरुषों से अधिक महिलाओं की भागीदारी दिखने लगी।.

यहीं नहीं, लड़कियों की शिक्षा और रोजगार की दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाए गए. लड़कियों को शिक्षित करने और स्कूल से जोड़ने के लिए साइकिल योजना की शुरुआत की गई. यही नहीं, पोशाक और छात्रवृत्ति की राशि दी जाने लगी. इसके चलते स्कूलों में लड़कियों की तादाद बढ़ी. मैट्रिक और इंटर की परीक्षा में बेहतर करने वालों को प्रोत्साहन राशि दी जाने लगी. ऐसे कई कदम उठाए गए जिससे लड़कियों की भागीदारी बढ़ी. यही नहीं, रोजगार में भी लड़कियों के लिए एक तिहाई आरक्षण की व्यवस्था की गई.लड़कियां रोजगार करने लगी. इसका असर समाज में दिखने लगा.लिहाजा,अभिभावक भी बेटियों को पढ़ाने के लिए प्रेरित करने लगे.आज यही वजह है कि हर क्षेत्र में लड़कियों की भागीदारी दिखने लगी है.बड़े बड़े पदों पर लड़कियां विराजमान हैं.

जीविका समूह का गठन भी नीतीश सरकार का एक अहम निर्णय रहा है. कम पढ़ी लिखी महिलाएं भी जीविका समूह से जुड़कर आपस में लेन देन कर छोटे मोटे रोजगार करने लगी.इसका भी समाज में व्यापक असर देखने को मिला.रोजगार सृजन के लिए जीविका से जुड़े महिलाओं को 10-10 हजार रुपए की सहायता राशि प्रदान की गई. रोजगार को आगे बढ़ाने वाली महिलाओं को दो लाख रुपए तक लोन दिए जाने की व्यवस्था की गई है.

अंधेरे से मिली आजादी

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासनकाल में बिहार को अंधेरे से आजादी मिली है. यह नीतीश कुमार के शासनकाल की तीसरी बड़ी उपलब्धि रही है.चूंकि जब नीतीश कुमार सता में आए थे तब बिहार में बिजली का उत्पादन सीमित था.बिजली की पहुंच भी सीमित इलाका तक थी. अधिकतर गांव अंधेरे में था, लेकिन केंद्र और राज्य के समन्वय से बिजली के क्षेत्र में बड़ी पहल हुई. लिहाजा, अब शायद ही कोई ऐसा टोला और गांव है जहां बिजली की पहुंच नहीं है. यही नहीं, बिजली की उपलब्धता भी 16 घंटे से कम नहीं है. इसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों में भी काफी बदलाव हुआ. लोगों के रहन सहन का स्तर बदला. अब बिहार के सभी घरेलू उपभोक्ताओं को 125 यूनिट बिजली फ्री कर दी गई है.

शराबबंदी साहसिक कदम

बिहार में शराबबंदी नीतीश कुमार के लिए साहसिक कदम रहा है. शराब बिहार में सरकारी राजस्व का बड़ा स्रोत रहा है, लेकिन इसकी परवाह किए बगैर नीतीश कुमार ने शराबबंदी कानून लागू किया. हालांकि इसके चलते आलोचना भी होती रही है, फिर भी इस कानून को सख्ती से लागू करने का पहल किया.इसके चलते लोगों को काफी राहत मिली है. सड़कों पर शराब पीकर हंगामा करने वालों पर लगाम लगी. महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस कर रही हैं. शराबी पति से परेशान पत्नियों की शराबबंदी कानून से राहत मिली है. कई पत्नियों ने पुलिस को फोन कर अपने पतियों को शराब पीने के जुर्म में जेल भिजवाकर उसे सबक सिखा चुकी हैं. आम जनों को भी बहुत राहत मिली है.

शिक्षा और स्वास्थ्य की बदली सूरत

नीतीश कुमार के शासन काल में शिक्षा और स्वास्थ्य की दिशा में बड़ा बदलाव देखने को मिला है.आधारभूत संरचनाओं का काफी विकास हुआ.बड़े पैमाने पर भवनों का निर्माण किया गया.अब गिने चुने ऐसे जगह हैं जहां भवन नहीं है.चूंकि जहां जहां जमीन की उपलब्धता थी, उन स्थानों पर भवनों की पर्याप्त व्यवस्था कर दी गई है.स्कूलों में टीचर की पर्याप्त उपलब्धता है. बड़े पैमाने पर शिक्षकों की नियुक्तियां की गई हैं. और भी  नियुक्तियां की जा रही हैं. पाठयपुस्तक, पोशाक और छात्रवृत्ति की राशि मिलने से विद्यार्थियों की तादाद में कई गुणा बढ़ोतरी हुई है. सभी हाई स्कूलों को इंटर स्तर में अपग्रेड कर दिया गया है. ताकि पंचायत स्तर पर इंटर की पढ़ाई कर सकें. यही नहीं, अधिकांश जिला में पॉलिटेक्निक कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज और जीएनएम और एएनएम कॉलेज खोले गए हैं.आईटीआई सेंटर खोले गए हैं.

स्वास्थ के क्षेत्र में भी कई कदम उठाए गए हैं.ज्यादातर स्वास्थ केंद्र भूतबंगला की श्रेणी में था, लेकिन नए नए भवनों के निर्माण से तस्वीर बदल गई है.पंचायत स्तर पर स्वास्थ व्यवस्था को सुधार करने के प्रयास किए गए हैं.यही नहीं,  पटना में पीएमसीएच में 5000 बेड का नया भवन बनाया गया है. प्रत्येक जिले के सदर अस्पताल को दुरुस्त किया गया है. जरूरी दवाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं. प्रत्येक जिले में मेडिकल कॉलेज की घोषणा की गई है. कई जिलों में निर्माण कार्य शुरू हो गया है. हालांकि चिकित्सकों की अपेक्षित संख्या की कमी महसूस की जाती रही है.

कृषि क्षेत्र की संरचना बदली

नीतीश कुमार के शासनकाल में कृषि के क्षेत्र में काफी बदलाव देखने को मिला. ब्लॉक स्तर पर कृषि विभाग की आधारभूत संरक्षणाओं को दुरुस्त किया गया.बड़े पैमाने पर अधिकारियों और कर्मियों की नियुक्ति की गई. यही नहीं, किसानों को नई तकनीक की खेती के लिए खाद और बीज उपलब्ध कराए जाने लगे. धान और गेहूं की सही मूल्य दिलाने के लिए मूल्य तय किए जाने लगे.यही नहीं, सिंचाई के लिए आहर पैन का बड़े पैमाने पर जीर्णोद्वार किया गया.तालाबों का निर्माण किया गया.

सामाजिक न्याय और समावेशी विकास

सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में भी कई कदम उठाए गए.अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और महादलितों के लिए विशेष योजनाएं शुरू की गईं. इन वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास किए गए.छात्रवृत्ति, आवास और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के जरिए सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश की गई. अल्पसंख्यक समुदाय के हितों का भी ख्याल रखा गया. कब्रिस्तान की घेराबंदी और मंदिरों के चहारदीवारी के निर्णय से सामाजिक सौहार्द की दिशा में बड़े कदम उठाए गए.

भ्रष्टाचार और अफसरशाही बनी चुनौती

नीतीश कुमार के दो दशक के शासन काल में कई बड़े बदलाव हुए.सुशासन (गुड गवर्नेंस) को लेकर  नीतीश कुमार ने अपनी पहचान बनाई. लोक शिकायत निवारण अधिनियम (Right to Public Services) लागू किया गया, जिससे सरकारी सेवाओं को समयबद्ध बनाने की कोशिश हुई, लेकिन कुछ खामियां भी उभरकर सामने आईं.भ्रष्टाचार और अफसरशाही चुनौती बनकर उभरी. हालांकि निगरानी विभाग के जरिए भ्रष्ट लोकसेवकों के खिलाफ कार्रवाई की जाती रही.बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और विभागीय कार्रवाई की गई.

उद्योग की दिशा में अपेक्षित विकास नहीं

आर्थिक विकास की बात करें तो बिहार की विकास दर में कई वर्षों तक तेजी देखी गई.सड़क, निर्माण और सेवा क्षेत्र में वृद्धि हुई. हालांकि उद्योग के क्षेत्र में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी. बड़े निवेश अब भी सीमित रहे, जिसके कारण रोजगार के अवसरों की कमी बनी रही और बड़ी संख्या में लोगों का पलायन जारी रहा. हालांकि 2025 में नई सरकार गठन बिहार में बंद चीनी मिलों को चालू करने की दिशा में कवायद तेज हुई है.

बहरहाल, निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि नीतीश कुमार का शासनकाल बिहार के लिए एक परिवर्तनकारी दौर  रहा है, जिसमें कानून-व्यवस्था, सड़क, बिजली, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय बदलाव हुए, लेकिन रोजगार, उद्योग और स्वास्थ्य जैसी चुनौतियां अब भी बरकरार हैं.ऐसे में उनकी विरासत एक मिश्रित तस्वीर पेश करती है जहां उपलब्धियां भी हैं और कुछ अधूरे काम भी.

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