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विशेष विश्लेषण : CBSE का नया मूल्यांकन सिस्टम विवादों में, क्या लाखों छात्रों के भविष्य से हुआ बड़ा प्रयोग?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 30, 2026
in राज्य, विशेष
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CBSE
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नई दिल्ली। सीबीएसई की 12वीं बोर्ड परीक्षा के नतीजों के बाद नया ऑन स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम देशभर में बहस का विषय बन गया है। जिस डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को कॉपियों की जांच को तेज, पारदर्शी और सटीक बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया था, वही अब छात्रों, अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों के निशाने पर है।

मामले की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सीबीएसई के आंकड़ों के अनुसार 26 मई 2026 तक 17 लाख 68 हजार 968 विद्यार्थियों में से 4 लाख 4 हजार 319 छात्रों ने अपनी स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं की कॉपी मांगी है। यानी परीक्षा में शामिल लगभग हर चार में से एक छात्र अपने मूल्यांकन को लेकर आशंकित है।

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इस पूरे विवाद की तह तक जाने की कोशिश की एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा ने। विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षा विशेषज्ञों, वकीलों और सीबीएसई से जुड़े शिक्षकों से बातचीत के दौरान कई गंभीर सवाल सामने आए हैं।

क्या है पूरा विवाद?

13 मई को सीबीएसई ने 12वीं कक्षा का परीक्षा परिणाम जारी किया। परिणाम आते ही नए ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को लेकर सोशल मीडिया पर शिकायतों की बाढ़ आ गई। कई छात्रों ने आरोप लगाया कि उनकी उत्तर पुस्तिकाएं धुंधली स्कैन हुई हैं, कुछ ने उत्तर पुस्तिकाओं की अदला-बदली का दावा किया, जबकि कई विद्यार्थियों ने मूल्यांकन में गंभीर त्रुटियों की शिकायत की।

पहले उत्तर पुस्तिकाओं की जांच शिक्षक सीधे कागज़ी कॉपी पर लाल पेन से करते थे। लेकिन इस बार उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया गया और परीक्षकों ने कंप्यूटर स्क्रीन पर मूल्यांकन किया।

विवाद बढ़ने के बाद सीबीएसई ने 15 मई को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर OSM सिस्टम का बचाव किया और दावा किया कि व्यापक स्तर पर तैयारी, मॉक इवैल्यूएशन और गुणवत्ता जांच के बाद ही इसे लागू किया गया था।

एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा की पड़ताल में सामने आए पांच बड़े सवाल

1. क्या परीक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण मिला था?

एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से बातचीत में सीबीएसई से संबद्ध एक शिक्षिका ने बताया कि “ऑनलाइन मूल्यांकन के लिए शिक्षकों को गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता थी, लेकिन प्रशिक्षण अपेक्षाकृत सीमित रहा।”

उनका कहना है कि “ऑफलाइन जांच में होने वाली गलतियों को कम करने के उद्देश्य से यह प्रणाली लाई गई थी, लेकिन नई तकनीक को समझने और प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए पर्याप्त समय और अभ्यास की जरूरत थी।”

हालांकि सीबीएसई का दावा है कि सभी मूल्यांकनकर्ताओं को मॉक इवैल्यूएशन और प्रशिक्षण प्रक्रिया से गुजारा गया था।

2. क्या सिस्टम की स्वतंत्र तकनीकी जांच हुई थी?

OSM प्रणाली के संचालन का जिम्मा हैदराबाद स्थित कंपनी कोएम्प्ट एडुटेक को दिया गया था। एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा की रिपोर्ट में सामने आया कि कंपनी के चयन, तकनीकी ऑडिट और सिस्टम टेस्टिंग को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं।

लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने भी इस कंपनी को लेकर आरोप लगाए, जिनका जवाब देते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि कंपनी का चयन निर्धारित सरकारी प्रक्रिया के तहत किया गया था और किसी भी संभावित तकनीकी खामी की जांच के लिए समिति गठित कर दी गई है।

3. क्या छात्रों का भरोसा अब रिजल्ट से ज्यादा वेरिफिकेशन पर है?

एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा ने वेदांत श्रीवास्तव के परिवार से बातचीत की। वेदांत का मामला तब चर्चा में आया जब उन्हें कथित रूप से किसी अन्य छात्र की उत्तर पुस्तिका भेजे जाने का दावा किया गया।

वेदांत के भाई सिद्धांत श्रीवास्तव का कहना है कि “सोशल मीडिया पर मामला उठाने के बाद उनके पास बड़ी संख्या में छात्रों के संदेश आने लगे, जो अपने मूल्यांकन को लेकर संदेह जता रहे हैं।

दिल्ली की छात्रा धृति अग्रवाल ने भी प्रकाश मेहरा को बताया कि अच्छे शैक्षणिक रिकॉर्ड के बावजूद उन्हें अपेक्षा से कम अंक मिले। स्कैन कॉपी देखने पर उन्हें कई उत्तरों में आंशिक अंक कटे हुए दिखाई दिए, जिससे कुल परिणाम प्रभावित हुआ।

विशेषज्ञों का मानना है कि “चार लाख से अधिक छात्रों द्वारा स्कैन कॉपी की मांग इस बात का संकेत है कि मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर विश्वास का संकट पैदा हुआ है।”

4. क्या अधिक उत्तर पुस्तिकाओं की मैनुअल जांच होनी चाहिए थी?

सीबीएसई ने स्वीकार किया है कि लगभग 13 हजार उत्तर पुस्तिकाओं की मैनुअल जांच कराई गई थी क्योंकि उनकी स्कैनिंग स्पष्ट नहीं थी। लेकिन एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से बातचीत करने वाले कई छात्रों ने दावा किया कि उन्हें मिली स्कैन कॉपियों में भी कई पन्ने धुंधले दिखाई दे रहे हैं। छात्रों का कहना है कि यदि उत्तर स्पष्ट रूप से दिखाई ही नहीं दे रहे हैं तो वे पुनर्मूल्यांकन के लिए प्रभावी ढंग से आवेदन कैसे कर पाएंगे।

कई विद्यार्थियों ने यह आशंका भी जताई कि यदि दोबारा जांच भी उसी डिजिटल प्रणाली से होगी तो पहले जैसी समस्याएं दोहराई जा सकती हैं।

5. क्या शिक्षा मंत्रालय की प्रतिक्रिया देर से आई?

13 मई को परिणाम जारी होने के बाद कई दिनों तक शिक्षा मंत्रालय की ओर से कोई प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया नहीं आई।

प्रकाश मेहरा की रिपोर्ट के अनुसार, विवाद लगातार बढ़ने और विपक्ष द्वारा सवाल उठाए जाने के बाद 28 मई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पहली बार सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने स्वीकार किया कि OSM प्रणाली का यह पहला बड़ा उपयोग था और कुछ त्रुटियां सामने आई हैं। साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी भी छात्र की शिकायत को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे।

क्या हैं छात्रों की शिकायतें

दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विनीत जिंदल के अनुसार छात्रों की शिकायतें मुख्य रूप से पांच प्रकार की हैं—

  • उत्तर पुस्तिका किसी दूसरे छात्र की होना।
  • सप्लीमेंट्री शीट का गायब होना।
  • उत्तरों पर अंकन न किया जाना।
  • लिखे गए उत्तरों को खाली मान लेना।
  • स्टेप मार्किंग के बावजूद आंशिक अंक न मिलना।

इन शिकायतों को लेकर सीबीएसई को कानूनी नोटिस भी भेजा गया है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद?

एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा की पड़ताल बताती है कि यह केवल तकनीकी गड़बड़ी का मामला नहीं है, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। कॉलेजों में दाखिले की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। ऐसे में यदि मूल्यांकन में त्रुटियां साबित होती हैं और पुनर्मूल्यांकन में समय लगता है, तो कई छात्र मनचाहे कॉलेज और कोर्स से वंचित हो सकते हैं।

इस पूरे विवाद ने डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और तैयारी को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। अब सभी की निगाहें सीबीएसई, विशेषज्ञ समिति और पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया पर टिकी हैं कि आखिर छात्रों के मन में उठे सवालों का समाधान कैसे किया जाता है।

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