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Home राष्ट्रीय

गाय के मांसाहार का राजनीतिक अर्थशास्त्र

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
April 22, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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गौशाला
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कौशल किशोर


नई दिल्ली। पिछले साल आई बॉलीवुड की क्राइम थ्रिलर उदयपुर फाइल्स की सुनवाई के दौरान सुर्खियों में आने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेन्द्र कुमार उपाध्याय एक बार फिर चर्चा में हैं। अप्रैल के पहले सप्ताह में उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने दूध देने वाले पशुओं के चारा में मांसाहार को शामिल करने से जुड़े मामले में एक अहम फैसला सुनाया है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा गाय, भैंस और बकरी जैसे शाकाहारी पशुओं के फीड में मांसाहार रोकने के उद्देश्य से दिशा निर्देश जारी किया गया। इसे भारतीय पशु आहार बाजार को नियंत्रित करने में लगी गोदरेज एग्रोवेट लिमिटेड ने पिछले साल हाई कोर्ट में चुनौती दिया था। इस कंपनी के शेयर में तभी से उतार चढ़ाव दर्ज किया जा रहा है। हालांकि इस फैसले के बाद अब तक कुल ₹25 का उछाल दर्ज किया गया है। पशुओं के प्रवक्ता गाय को मांसाहारी बनाने के खेल का यह अहम हिस्सा है। इस मामले में केंद्रीय नियामक संस्थान के सामने कई शक्तियां प्रतिस्पर्धा करती प्रतीत होती है।

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पैंतालीस पन्नों के इस फैसले से यह पता चलता है कि ट्रिपल तलाक केस से चर्चा में आई सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान के तर्कों के सामने डिवीजन बैंच लकीर पीटने को विवश है। इसमें मुर्गी, सूअर और मछली को छोड़ कर मांस और दूध देने वाले गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और ऊंट जैसे शाकाहारी पशुओं के आहार का नियम परिभाषित किया गया है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के अनुसार दुधारू जानवरों को ऐसा चारा नहीं खिलाया जा सकता है, जिनमें मांस या हड्डी का चूरा, आंतरिक अंग, रक्त और ऊतक आदि शामिल किया गया हो।

इस फैसले में कहा गया है कि इस नियामक संस्थान को केवल मानव द्वारा ग्रहण किए जाने वाले खाद्य पदार्थों के विषय में दिशा निर्देश जारी करने का अधिकार है। पशुओं के आहार का नियमन उनके कार्य क्षेत्र से बाहर माना गया है। गाय और बकरी घास खाती है या मांस इससे खाद्य नियामक संस्थान को कोई मतलब नहीं होना चाहिए। इसके बाद भारतीय पशु आहार बाजार में मांसाहारी फीड बेचने की प्रक्रिया सुगम हो सकती है।

बाजार की स्थिति: प्रतिबंधित किस्म की कीटनाशक दवाएं जिस तरह भारतीय बाजार में धड़ल्ले से बिक रही है, ठीक उसी तरह मांसाहारी पशुआहार भी कई देशों में उपलब्ध है। मांस के उन्नत उत्पादन के नाम पर अब भारतीय बाजार में भी इसे स्वीकार कर लिया गया है। परंतु दूध के उन्नत उत्पादन के नाम पर बाजार में इसे स्वीकृति नहीं मिली है। देशी बाजार में ऐसा मुमकिन नहीं होने के बावजूद भी यह धड़ल्ले से बिकने के लिए मचल रहा है।

अमरीकी सरकार इस तरह के खाद्य से प्राप्त दुग्ध उत्पाद की भारत में सप्लाई करने के लिए कोशिश कर रही है। इस मुकदमे से इतनी बात साफ है, गोदरेज एग्रोवेट लिमिटेड जैसी कंपनी आज भारतीय बाजार में खपत के लिए ऐसे उत्पाद बनाने और बेचने के लिए किस कदर मचल रही है। डेढ़ मिलियन टन पशुआहार का उत्पादन करने वाले इस कंपनी का शेयर उछल कर एक दिन 876.35 पर पहुंच गया था। आज इस केस के माध्यम से हाई कोर्ट इनकी मान्यता को ही प्रोत्साहन देती प्रतीत होती है।

शाकाहारी जीव के आहार में मिलावटखोरी का यह मुद्दा आधुनिक युग की पराकाष्ठा की ओर इंगित करता है। पश्चिम और पूरब के देशों में इस तरह के खाद्य पदार्थ अभ्यक्ष होने के बावजूद स्वीकृत हैं। इस विकृति ने कई रोगों को जन्म दिया। पांच दशक बीत गए जब इंग्लैंड में इसके लिए कोशिशें शुरू हुई। प्रोटीन सप्लिमेंट के नाम पर गायों को दिये जाने वाले आहार में बीफ बाजार का अवशेष शामिल किया जाने लगा। नतीजतन अस्सी के दशक में मेड-काऊ नामक बीमारी उभरने लगी थी।

इस मांसाहार की वजह से संक्रमित गायों का मांस खाने वाले लोग नब्बे के दशक में संक्रमित होने लगे। इसके कारण हुई 178 लोगों की मौत के बाद कैटल फीड में इस तरह की मिलावट पर रोक लगा दिया गया। साथ ही चालीस लाख गायों को मौत के घाट भी उतार दिया गया था। दुनिया भर में ब्रिटिश बीफ का निर्यात रोक दिया गया। दो दशकों बाद तक भी जापान में रोक लगा रहा था। फीड में इस मिलावट का संज्ञान लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा नियामक संस्थान ने यह नियम बनाया था। हैरत की बात है कि उच्च न्यायालय द्वारा इस तथ्य का संज्ञान तक नहीं लिया गया है। पशु आहार बाजार के नियंता इसका फायदा उठाने में तत्पर हैं।

अमरीका और यूरोप के बाजार में उपलब्ध कैटल फीड में केवल गाय के मांस पर रोक लगा है। अन्य कई स्रोतों से उपलब्ध होने वाले मांसाहार को शामिल किया गया है। अपने देश की सभ्यता संस्कृति में भोजन की शुद्धता का विशेष महत्व है। क्या दूध देने वाले इन शाकाहारी पशुओं के आहार में खून, अस्थि और मांस को बाजार स्वीकार करने को तैयार है? यह राम मंदिर में आस्था रखने वाले बहुसंख्य समाज के सामने प्रश्न खड़ा होता है। बहुसंख्य समाज इसे स्वीकार करने को कतई राजी नहीं होगा। लेकिन दीवान जैसी प्रतिष्ठित अधिवक्ता और गोदरेज एग्रोवेट जैसी कंपनी को इसकी वकालत करने रोकने वाला कोई नहीं है। आजादी के बाद श्वेत क्रांति के साथ गायों की नस्ल बदलने का काम किया गया। इसी राजनीतिक अर्थशास्त्र का विकास आज इस अवस्था में पहुंच गया है।

इसके प्रवर्तकों में एक अरसे से अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप जैसे महत्वाकांक्षी राजनेता शामिल हैं। हाल में हुई ट्रेड डील कई कारणों से सुर्खियों में थी। कृषि उत्पाद पर न्यूनतम टैरिफ और जेनेटिकली मोडिफाइड सीड के आयात से भविष्य में पैदा होने वाले संकट को ध्यान में रख कर कई किसान संगठन विरोध पर उतारू हो गए। यूनाईटेड स्टेट डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर की रिपोर्ट से वहां के किसानों की खराब हालत का पता चलता है।

इस मुद्दे पर कनाडा की सरकार अपने पशुपालकों के हितों की अनदेखी कर उनकी मदद के लिए राजी नहीं है। ऐसी दशा में उनका रुख भारतीय बाजार की ओर होना स्वाभाविक ही है। इससे भारतीय पशुपालकों की मुश्किलें जरुर बढ़ेंगी। सेकुलर राजनीतिक दलों के नेताओं ने इसमें खेती किसानी और पशुपालन से जुड़े लोगों के हितों को अमरीका के हाथों गिरवी रखने का आरोप लगाया है। कृषि, पशुपालन और खाद्य सुरक्षा से जुड़े कई प्रश्नों के कारण खड़ा हुआ ये विवाद निश्चय ही भविष्य में भी उभरने वाला है। गोभक्त हिन्दू समाज की सक्रियता की वजह से ही इस राजनीतिक अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने में अमरीका जैसे देश की सफलता पर अब तक प्रश्नचिह्न लगा हुआ है। किंतु भविष्य में ऐसा कब तक रहेगा? यह एक मुश्किल प्रश्न है।

आधुनिकता के इस दौर में गायों ने प्लास्टिक भी खाना सीख लिया है। आज दिल्ली हाई कोर्ट गाय, भैंस और बकरी जैसे शाकाहारी पशुओं के लिए मांसाहार की व्यवस्था में लगी कंपनी को हरी झंडी दिखा कर क्या साबित करने में लगी है? गौरक्षा आंदोलन से जुड़े लोग इस मामले में पहले से सरकार के खिलाफ मोर्चा चला रहे हैं। सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अब तक कोई अपील दायर नहीं किया है। ऐसी दशा में न्याय पालिका ही हावी होगी। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ यहां लकीर का फकीर प्रतीत साबित होती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और नियामक प्राधिकरण के खिलाफ दिए इस फैसले से देश की जनता के बीच न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई है।

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