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Home राजनीति

क्या फिर चलेगा ममता का जादू या पहली बार खिलेगा कमल?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 3, 2026
in राजनीति, राज्य
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BJP and TMC
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नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में दो चरणों में मतदान के बाद अब इंतजार खत्म हो रहा है. रात बीतते ही सुबह राज्य की 293 सीटों पर मतगणना शुरू होगी और दोपहर 12 बजे तक लगभग यह साफ हो जाएगा कि पश्चिम बंगाल में फिर से ममता बनर्जी की सरकार बनेगी या भाजपा पहली बार राज्य में कमल खिलाने में सफल रहेगी. इस बार का बंगाल चुनाव कई मायनों में पूरी तरह से अलग रहा है और चुनाव के दौरान कई नए रिकॉर्ड बने हैं. चुनावी इतिहास में पहली बार दो चरणों में मतदान हुए थे. इससे पहले हिंसा की वजह से राज्य में आठ चरणों तक मतदान हो चुके हैं.

इस चुनाव के दोनों चरणों में एक भी मौत की खबर नहीं आई. इस बार बंगाल में सबसे ज्यादा सेंट्रल फोर्स तैनात की गई थी और रिकॉर्ड मतदान हुआ है. ऐसा मतदान देश के चुनावी इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था. सीधे शब्दों में कहें तो, 2026 के विधानसभा चुनाव ने राज्य के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसा चैप्टर पहले ही लिख दिया है जो पहले कभी नहीं हुआ.

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क्या रिकॉर्ड वोटिंग से बाजी पलट जाएगी?

इस बार पूरे बंगाल में भारी वोटिंग हुई है. आज़ादी के बाद पूरे देश के हिसाब से एक नया रिकॉर्ड बना है. 2011 में 84 परसेंट, 2016 में 82.66 परसेंट और 2021 में 81.56 परसेंट वोटिंग हुई थी, लेकिन 2026 में वे सारे आंकड़े फीके पड़ गए हैं. इस बार वोटिंग रेट 92 परसेंट को पार कर गया है, जिन जगहों पर री-पोलिंग हुई, वहां वोटिंग का ग्राफ हाई है.

पहले फेज में 152 सीटों पर 2021 के मुकाबले करीब 21 लाख 11 हजार ज्यादा वोट पड़े (हर विधानसभा में एवरेज 13,800 ज्यादा वोट). दूसरे फेज में 142 सीटों पर 9 लाख 8 हजार वोट बढ़े. हर सीट पर एवरेज 6,400 ज्यादा. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वोटों में इतनी बड़ी बढ़ोतरी के पीछे माइग्रेंट वर्कर्स का अपने घर लौटना एक बहुत ही अहम ‘X फैक्टर’ का काम किया है.

क्या डेमोग्राफिक्स में अंतर का पड़ेगा कोई प्रभाव?

पहले फेज में 152 सीटों में से 81 परसेंट पर गांव के वोटर थे, जबकि 29 परसेंट मुस्लिम, 24 परसेंट शेड्यूल्ड कास्ट और 9 परसेंट ट्राइबल थे. वहीं, दूसरे फेज में सिर्फ 53 परसेंट गांव के वोटर थे, यानी शहरी असर ज्यादा था. यहां मुस्लिम 25 परसेंट, शेड्यूल्ड कास्ट 23 परसेंट और ट्राइबल 2.5 परसेंट थे. देखना यह है कि डेमोग्राफिक्स में यह अंतर दोनों मुख्य पार्टियों के वोट शेयर पर कितना असर डालता है? साथ ही, यह भी देखना है कि लेफ्ट-कांग्रेस-ISF-हुमायूं पार्टी भी कितना असर डालती है

बीजेपी के पक्ष में कौन-कौन से फैक्टर

विपक्षी पार्टी होने के नाते बीजेपी मुख्य रूप से सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ लोगों के गुस्से के साथ-साथ कई खास मुद्दों को भुनाने के लिए मैदान में उतरी थी. यह कहने की जरूरत नहीं है कि 15 साल से तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ चल रही एंटी इनकंबेंसी को बीजेपी ने हवा दे रही है. आरजी कर रेप केस और कस्बा लॉ कॉलेज जैसी सेंसिटिव घटनाओं ने महिला सुरक्षा के मुद्दे पर तृणमूल पर भारी दबाव बनाया है.

तृणमूल के खिलाफ उठाए गए करप्शन के मुद्दे और 26,000 नौकरियों को रद्द करने के मामले को भी भाजपा ने भुनाया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना ​​है कि इससे शहरी और पढ़े-लिखे मिडिल क्लास का गुस्सा काफी हद तक भाजपा की तरफ जा सकता है.

दूसरी ओर, आलू किसानों में अपनी फसल का सही दाम न मिलने से बहुत ज्यादा नाराज़गी है. राज्य की 26 सीटों पर आलू किसानों का प्रभाव माना जाता है. 2021 के चुनाव में इनमें से तृणमूल 18 सीटों पर और भाजपा 8 सीटों पर आगे थी, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल घटकर 16 और भाजपा बढ़कर 10 हो गई है. यह बीजेपी के लिए एक पॉजिटिव संकेत है.

प्रॉफिट मार्जिन पोलराइजेशन में भी है. जानकार लोगों के मुताबिक, मुर्शिदाबाद में हिंसा, वक्फ मुद्दा और बेलडांगा की घटना कुछ इलाकों में पॉलिटिकल पोलराइजेशन कर सकती है, जिससे BJP का वोट बैंक मजबूत होगा.

सत्तारूढ़ तृणमूल को कहां फायदा है?

हालांकि लगातार पंद्रह साल सत्ता में रहने की वजह से तृणमूल के खिलाफ माहौल मजबूत हुआ है, लेकिन यह कहने की जरूरत नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस की अभी भी कुछ मजबूत नींव है. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस चुनाव में यही उनका बड़ा फायदा है. बूथ लेवल पर तृणमूल की ऑर्गेनाइजेशनल ताकत उनका सबसे बड़ा टूल है, जो वोटर्स को आखिरी समय तक अपने बूथ पर वोट बनाए रखने में मदद करती है.

दूसरी तरफ, ग्रामीण इलाकों में लक्ष्मी भंडार की आसमान छूती लोकप्रियता तृणमूल के पक्ष में महिलाओं का वोट बैंक बनाए रखने के पीछे एक मुख्य कारण है. इसके साथ ही, कन्याश्री और रूपश्री जैसे एक के बाद एक लोगों से जुड़े प्रोजेक्ट भी हैं.

कई लोगों का कहना है कि इस बार SIR के असर से राज्य में मुस्लिम वोट तृणमूल के पक्ष में ज्यादा हुआ है. इसके अलावा, इस SIR की लिस्ट से बाहर रखे गए मतुआ समुदाय की नाराजगी भी अप्रत्यक्ष रूप से सत्ताधारी पार्टी को फायदा पहुंचा सकती है. दूसरी तरफ, 2024 के लोकसभा चुनावों का हिसाब कहता है कि तृणमूल ने जंगलमहल में अपनी खोई हुई जमीन काफी हद तक वापस पा ली है, जिससे उन्हें इस चुनाव में और फायदा हो सकता है.

इस बार चुनाव में क्या अहम फैक्टर?

यह कहने की जरूरत नहीं है कि तृणमूल और BJP के बीच सीधी लड़ाई के बाहर कई मुद्दे X-फ़ैक्टर बनने वाले हैं. SIR से 27 लाखनामों का बाहर होना इस चुनाव का सबसे बड़ा ‘X फैक्टर’ सभी मान रहे हैं. इतनी बड़ी संख्या में लोगों का गुस्सा बैलेट बॉक्स पर भी बड़ा असर डाल सकता है.

दूसरी तरफ, लक्ष्मी भंडार के महिलाओं का दिल जीतने के कैंपेन के जवाब में बीजेपी के ‘3,000 रुपये हर महीने’ के वादे का कितना असर होगा, यह देखना बाकी है. इसके अलावा, बेरोजगारी भत्ता, जल्दी भर्ती का वादा, DA जैसी चीजें राज्य की युवा पीढ़ी और नौकरी ढूंढने वालों, सरकारी कर्मचारियों को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है.

इसके अलावा, इस चुनाव में तीसरी ताकत की भूमिका को भी लगभग नकारा नहीं जा सकता. कई सीटों पर जीत या हार इस बात पर निर्भर करती है कि लेफ्ट, ISF और कांग्रेस गठबंधन में या अलग-अलग कितने वोट खींच पाते हैं. कई सीटों पर अगर एंटी-एस्टैब्लिशमेंट वोट बंटा तो BJP हारेगी, और अगर माइनॉरिटी या तृणमूल को खींचा तो नुकसान BJP को होगा.

सीधे शब्दों में कहें तो यह चुनाव एकतरफा लहर वाला चुनाव नहीं है. एक तरफ, ग्रामीण बंगाल में पब्लिक वेलफेयर प्रोजेक्ट्स और जमीनी स्तर पर आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए मजबूत बूथ-लेवल संगठन हैं, तो दूसरी तरफ, संस्थाओं के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा है, महिलाओं की सुरक्षा के सवाल हैं और अब यह देखना होगा कि कल की सुबह किसकी होगी. बंगाल में फिर से ममता राज होगा या पहली बार कमल फूल खिलेगा?

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