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Home राष्ट्रीय

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: विपक्ष और सोशल मीडिया पर क्यों मचा है घमासान?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 4, 2026
in राष्ट्रीय
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great nicobar project
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नई दिल्ली। ग्रेट निकोबार द्वीप इन दिनों अचानक सुर्खियों में आ गया है. वजह है यहां प्रस्तावित वह मेगा प्रोजेक्ट, जिसे भारत सरकार देश की सबसे अहम रणनीतिक योजनाओं में गिन रही है. करीब ₹92,000 करोड़ की लागत वाला यह प्रोजेक्ट सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर योजना नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की ताकत बढ़ाने की बड़ी कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. इस योजना के तहत ग्रेट निकोबार में एक विशाल अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, नया इंटरनेशनल एयरपोर्ट, आधुनिक टाउनशिप और पावर प्लांट बनाया जाना है. सोच यह है कि इस छोटे से द्वीप को आने वाले समय में व्यापार, पर्यटन और सुरक्षा का बड़ा केंद्र बनाया जाए.

तीन चरणों में पूरा होगा काम

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सरकार की योजना तीन चरणों में इसे पूरा करने की है. शुरुआत में गलाथिया बे में बनने वाला पोर्ट इसकी सबसे बड़ी कड़ी होगा. यह इतना गहरा और आधुनिक होगा कि दुनिया के सबसे बड़े जहाज भी यहां आसानी से आ-जा सकेंगे. साथ ही एयरपोर्ट को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि वह आम यात्रियों के साथ-साथ रक्षा जरूरतों को भी पूरा कर सके. बिजली के लिए गैस और सोलर आधारित पावर प्लांट और रहने के लिए पूरी टाउनशिप भी तैयार की जाएगी.

रणनीतिक रूप से अहम है ये जगह

सरकार का मानना है कि यह प्रोजेक्ट भारत को उस जगह खड़ा कर सकता है, जहां से दुनिया के एक बड़े हिस्से का समुद्री व्यापार गुजरता है. मलक्का स्ट्रेट के करीब होने की वजह से यह इलाका पहले से ही रणनीतिक रूप से बेहद अहम है. अगर यहां पोर्ट तैयार हो जाता है, तो भारत को कोलंबो या सिंगापुर जैसे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. लेकिन जितनी तेजी से यह प्रोजेक्ट आगे बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से इस पर सवाल भी उठ रहे हैं. सबसे बड़ा मुद्दा पर्यावरण का है. आलोचकों का कहना है कि इस परियोजना के चलते बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई होगी और समुद्री जीवन पर भी असर पड़ेगा.

तैयार की गई है अलग से नीतियां

कुछ लोगों को यह भी डर है कि इससे वहां रहने वाली शोम्पेन और निकोबरी जनजातियों की पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हो सकती है. हालांकि सरकार इन आशंकाओं को खारिज करती है. सरकार का कहना है कि कुल जंगल क्षेत्र का बहुत छोटा हिस्सा ही प्रभावित होगा और पेड़ों की कटाई भी चरणबद्ध तरीके से की जाएगी. इसके साथ ही पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए कई योजनाएं तैयार की गई हैं, जैसे कोरल ट्रांसलोकेशन, वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट और लगातार निगरानी. आदिवासी समुदायों को लेकर भी सरकार का दावा है कि किसी को विस्थापित नहीं किया जाएगा और उनके अधिकारों की पूरी सुरक्षा होगी. इसके लिए अलग से नीतियां और निगरानी तंत्र भी बनाए गए हैं.

ट्रेड हब के रूप में विकसित करने का विचार

दिलचस्प बात यह है कि द्वीपों को बड़े ट्रेड हब के रूप में विकसित करने का विचार नया नहीं है. दशकों पहले भी इस तरह की सोच सामने आई थी, लेकिन अब इसे बड़े पैमाने पर अमल में लाने की कोशिश हो रही है. कुल मिलाकर, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की असली परीक्षा हो रही है. एक तरफ यह भारत की आर्थिक और सैन्य ताकत को नई ऊंचाई दे सकता है, तो दूसरी तरफ यह भी तय करना होगा कि प्रकृति और स्थानीय समुदायों की कीमत पर यह विकास न हो. आने वाले सालों में यह प्रोजेक्ट सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर की कहानी नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि भारत बड़े विकास कार्यों में संतुलन कैसे बनाता है.

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