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Home धर्म

धर्म गाथा: श्रीकृष्ण के श्राप के बाद अश्वत्थामा की दिव्य मणि का क्या हुआ?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 16, 2026
in धर्म
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अश्वत्थामा
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नई दिल्ली। महाभारत की कई कथाएं प्रचलित है जिसमें हर व्यक्ति को कोई न कोई संदेश अवश्य मिलता है। महाभारत ग्रंथ में अनके कथाएं है। उन्हीं में से एक कथा द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा की है, जिसके मस्तक में बचपन से ही मणि मौजूद थी। शिव के आशीर्वाद से मिली इस मणि के कारण उन्हें कभी भी भूख-प्यास और थकान नहीं लगती थी। इतना ही नहीं इस मणि के प्रभाव के कारण वह किसी युद्ध में पराजित नहीं हो सकते थे। लेकिन महाभारत युद्ध के दौरान अश्वत्थामा द्वारा किए गए जघन्य अपराध के कारण उन्हें इस दिव्य मणि को तो त्यागना ही पड़ा। इसके साथ ही श्री कृष्ण के श्राप के कारण  तीन हजार वर्षों तक पृथ्वी पर भटकना पड़ेगा। आइए आज ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानते हैं कि अश्वत्थामा से श्री कृष्ण के कहने पर पांडवों को मणि देने के बाद क्या हुआ…

महाभारत के सौप्तिक पर्व के अनुसार, कौरवों के सभी पुत्र, कुटुम्बी और भाई बंधु मारे जाने के बाद दुर्योधन को भी पांडवों ने मार गिराया। जिसे देखकर अश्वत्थामा करुणा से विलाप करता है। इसके साथ ही वह अपने पिता गुरु द्रोणाचार्य के द्वारा हुए अन्याय और उनकी मृत्यि का बदला पांडवों से लेने के लिए बिल्कुल तत्पर हो गया।

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इसके बाद अपने अस्त्र-शस्त्र लेते हुए उन्होंने प्रतिशोध की कसम खाई और कहां कि कौरवों और उनके पक्ष में लड़ रहे योद्धाओं को मारकर पांडव चैन की नींद ले रहे हैं। ऐसे में आज क्षत्रिय धर्म का पालन करने के साथ राजा दुर्योधन के पथ मार्ग पर चलकर पांडवों के साथ-साथ संपूर्ण पांचालों का विनाश कर दूंगा। इसके बाद ही मुझे शांति मिलेगी और मैं पिता के कर्ज से निजात पा लूंगा।

अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में चलाया ब्रह्मास्त्र

इस प्रण के बाद अश्वत्थामा रात के समय सो रहे पांडवों के पुत्रों का वध कर दिया और कई योद्धाओं को भी मौंत के घाट उतार दिया। जब श्री कृष्ण , अर्जुन, भीम को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने अश्वत्थामा का पीछा किया।  वह उनका  पीछा करते हुए व्यास जी के आश्रम पहुंचे। जहां पर अर्जुन ने अश्वत्थामा  को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र  का संधान किया। लेकिन श्री कृष्ण के साथ व्यास जी ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया। लेकिन अश्वत्थामा ने भी अर्जुन की ओर ब्रह्मास्त्र साध दिया। उसे भी श्री कृष्ण ने समझाया कि इस शस्त्र को किसी दूसरी दिशा की ओर मोड़ लें। लेकिन  अश्वत्थामा ऐसा नहीं करना चाहता था और गांडीव धारी अर्जुन की पुत्रवधू उत्तरा के गर्भ की ओर ब्रह्मास्त्र चला दिया, जिससे उसके गर्भ में ही शिशु की मृत्यु हो गई।

श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को दिया श्राप

अश्वत्थामा द्वारा किए गए इस जघन्य कार्य से श्री कृष्ण ने उसे श्राप दे दिया। उन्होंने  कहा कि हे द्रोणकुमार। तुम्हारे द्वारा चलाए गए  दिव्य अस्त्र का प्रहार तो अमोध ही होगा। उत्तरा का गर्भ मरा हुआ ही पैदा होगा. लेकिन फिर भी लंबी आयु प्राप्ति करेगा। लेकिन तुमने जो पाप किए है और एक बार नहीं बार-बार करने वाले और बाल हत्यारा को भी कर्म का फल मिलेगा। मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि आज से तीन हजार वर्षों तक तू इस पृथ्वी पर भटकता रहेगा। तू कभी भी किसी से बात नहीं कर पाएगा और कभी सुख की प्राप्ति नहीं कर पाएगा। इसके साथ ही तू जन समुदाय में नहीं ठहर सकेगा। ओ नीच.. तेरे शरीर से पीव और लोहू की दुर्गंध निकलती रहेगी। जिसके कारण तुम्हें दुर्गम स्थानों का ही आश्रय लेना पड़ेगा। इन रोगों के साथ तू इधर-उधर भटकता रहेगा। मैं अपने तप और सत्य से गर्भ में मरे हुए शिशु को जीवित कर दूंगा।

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