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Home राष्ट्रीय

RBI ने सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपए सौंपे, आपकी जेब में कितना आएगा?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 26, 2026
in राष्ट्रीय, व्यापार
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नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने केंद्र सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपए देने का फैसला किया है. यह रकम देश के कई बड़े राज्यों के सालाना बजट से भी ज्यादा है. यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि 22 मई 2026 की असली हकीकत है, जब RBI ने अपनी स्थापना के 90 सालों में सरकार को सबसे बड़ा डिविडेंड देने का ऐलान किया, लेकिन इसने RBI की भूमिका को लेकर एक नई बहस भी छेड़ दी है. आखिर ये पूरा मामला क्या है, RBI ने इतना पैसा कैसे कमाया, इसका आपकी जेब और देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा…

2.87 लाख करोड़ रुपये का डिविडेंड है क्या?

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RBI देश का केंद्रीय बैंक है, लेकिन यह कोई आम सरकारी दफ्तर नहीं है. RBI अपने कामकाज से मुनाफा कमाता है. कानूनी तौर पर, RBI अधिनियम की धारा 47 के तहत, उसे अपने मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा हर साल अपने इकलौते शेयरहोल्डर यानी भारत सरकार को देना होता है. इसे ही ‘सरप्लस ट्रांसफर’ या ‘डिविडेंड’ कहते हैं.

22 मई 2026 को RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में केंद्रीय निदेशक मंडल की 623वीं बैठक हुई. इसमें वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 2,86,588.46 करोड़ रुपए का रिकॉर्ड प्रॉफिट सरकार को ट्रांसफर करने की मंजूरी दी गई. यह RBI के 90 सालों के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा भुगतान है. पिछले साल (FY25) में यह राशि 2.69 लाख करोड़ रुपए थी, जो खुद एक रिकॉर्ड थी. यानी इस बार 6.7% की बढ़ोतरी के साथ पुराना रिकॉर्ड टूट गया है.

RBI को इतना फायदा कैसे हुआ?

RBI की इस रिकॉर्ड कमाई के कई रास्ते हैं, लेकिन एक चीज है जिसने इस बार सबसे ज्यादा योगदान दिया- गिरता हुआ रुपया:

रुपये की गिरावट: PTI के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया 9.88% तक गिर गया. जब रुपया कमजोर होता है, तो RBI के पास जो विदेशी मुद्रा भंडार (करीब 600 अरब डॉलर) जमा है, उसकी रुपये में कीमत अपने आप बहुत बढ़ जाती है. यह एक तरह का अकाउंटिंग गेन है जो सीधे RBI के मुनाफे में जुड़ जाता है. इस बंपर पेआउट में सबसे बड़ा योगदान रुपये के लगभग 10% डेप्रिसिएशन का रहा, जिसने विदेशी मुद्रा एसेट्स पर इवेल्यूएशन प्रॉफिट को बढ़ाया.

विदेशी निवेश पर ब्याज: RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार को अमेरिकी सरकार के बॉन्ड और दूसरे सुरक्षित विदेशी निवेशों में लगाता है. इससे उसे लगातार ब्याज से होने वाली इनकम मिलती है.

घरेलू निवेश और करेंसी प्रिंटिंग: RBI सरकारी बॉन्ड खरीदता है, जिस पर उसे ब्याज मिलता है और करेंसी नोट छापने की फीस भी वसूलता है. पिछले एक दशक में RBI के बैलेंस शीट के आकार में भी भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे कमाई बढ़ी है.

पश्चिम एशिया संकट का असर: पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात के कारण तेल की कीमतों में उछाल आया, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ा और रुपये पर दबाव पड़ा. सरकार के लिए यह एक चिंता का विषय है, लेकिन RBI के लिए रुपये की कमजोरी मुनाफे का एक बड़ा जरिया बन गई.

एक नजर पिछले कुछ सालों पर

वित्त वर्ष                  सरप्लस ट्रांसफर

FY26 (2025-26)   2.87 लाख करोड़ रुपए

FY25 (2024-25)   2.69 लाख करोड़ रुपए

FY24 (2023-24)   2.11 लाख करोड़ रुपए

FY23 (2022-23)   87,416 करोड़ रुपए

FY22 (2021-22)   30,307 करोड़ रुपए

सरकार इस पैसे का क्या करेगी और इसका आप पर क्या असर?

यह 2.87 लाख करोड़ रुपए सरकार के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है, खासकर इस समय जब वैश्विक हालात काफी चुनौतीपूर्ण हैं. सरकार के लिए पश्चिम एशिया में तनाव के चलते तेल और उर्वरकों पर सब्सिडी का बोझ अचानक बहुत बढ़ गया है. मीडिया रिपोर्ट में बताया गया कि यह रिकॉर्ड डिविडेंड सरकार को बढ़ती सब्सिडी की चुनौतियों से निपटने में मदद कर सकता है.

इसके ठोस फायदे और नुकसान:

राजकोषीय घाटे पर लगाम: इस इनकम से सरकार को अपना राजकोषीय घाटा यानी उसकी आय और खर्च के अंतर को बजट में तय लक्ष्य तक सीमित रखने में मदद मिलेगी.

कर्ज कम लेना पड़ेगा: जब सरकार के पास पैसा होगा, तो उसे बाजार से उतना कर्ज नहीं लेना पड़ेगा. इससे बॉन्ड यील्ड (ब्याज दरें) स्थिर रह सकती हैं और आपके होम लोन या कार लोन की EMI पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ेगा.

महंगाई पर असर: इस डिविडेंड से बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी (लिक्विडिटी) आ जाएगी. बहुत ज्यादा नकदी महंगाई बढ़ा सकती है, लेकिन इस बार RBI ने साथ ही अपने जोखिम कोष (कंटिंजेंसी फंड) में भी पर्याप्त रकम रखी है, जिससे बाजार में पैसे के बहाव को संतुलित किया जा सकेगा.

क्या RBI सरकार का ‘खामोश फाइनेंसर’ बनता जा रहा है?

यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि RBI का डिविडेंड हर साल बढ़ता जा रहा है. ऐसे में सवाल उठाता है कि क्या केंद्रीय बैंक की भूमिका सिर्फ मौद्रिक नीति बनाने तक सीमित रह गई है या वह सरकार के लिए एक स्थायी आय का जरिया बनता जा रहा है. कुछ अर्थशास्त्री इसे सही नहीं मानते.

कैपिटलमाइंड के CEO दीपक शेनॉय ने इस रिकॉर्ड डिविडेंड को ‘निराशाजनक’ बताया. उनका तर्क है कि RBI को इतना बड़ा लाभांश देने के बजाय अपने जोखिम कोष (रिजर्व) को और मजबूत करना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी बड़े आर्थिक संकट से निपटा जा सके.

HDFC बैंक के कमोडिटी हेड अनुज गुप्ता ने कहा, ‘RBI का यह ऐतिहासिक डिविडेंड कमजोर रुपये और ऊंची ब्याज आय का नतीजा है. यह मुश्किल वैश्विक हालात में सरकार के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि इससे सरकार का बजट संतुलित रहेगा और जनता पर टैक्स का अतिरिक्त बोझ नहीं डालना पड़ेगा. हालांकि, इससे RBI की स्वायत्तता और उसकी भविष्य की तैयारियों को लेकर एक नई बहस जरूर छिड़ गई है. सरकार के लिए भी यह एक सुनहरा मौका है कि वह इस अप्रत्याशित लाभ का इस्तेमाल सोच-समझकर और लंबे विकास के लिए करे.’

RBI के पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास का कहना है, ‘RBI को एक सक्षम डॉक्टर की तरह काम करना है, जो जरूरत के हिसाब से दवाई देता है, न कि एक हैसियत वाले डॉक्टर की तरह, जो एक ही दवा बेचता रहता है.’

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