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भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही, फिर भी क्यों टूट रहा है रुपया?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 28, 2026
in विशेष, व्यापार
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नई दिल्ली (स्पेशल डेस्क): भारत की मुद्रा रुपया लगातार दबाव में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में लगभग 62.33 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। जब नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को पहली बार प्रधानमंत्री पद संभाला था, तब 1 डॉलर की कीमत 58.94 रुपये थी। मई 2019 तक रुपया गिरकर 69.37 प्रति डॉलर पहुंच गया। जून 2024 में तीसरे कार्यकाल की शुरुआत तक डॉलर 83.38 रुपये पर पहुंच चुका था और अब 2026 में यह करीब 96 रुपये के स्तर तक पहुंच गया है। आइए इस पूरे विश्लेषण को समझते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि “केवल वैश्विक संकट ही नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक नीतियों, विदेशी निवेश में गिरावट और बढ़ते व्यापार घाटे ने भी रुपये को कमजोर किया है।

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पूर्व सरकारों में भी गिरा था रुपया

रुपये में गिरावट केवल वर्तमान सरकार तक सीमित नहीं रही है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल (2004-2014) में भी रुपया लगभग 31.65 प्रतिशत कमजोर हुआ था। 2004 में डॉलर के मुकाबले रुपया 45.31 था, जो 2014 तक करीब 60 रुपये तक पहुंच गया। हालांकि मौजूदा समय में गिरावट की रफ्तार अधिक तेज़ मानी जा रही है।

अर्थव्यवस्था तेज़, फिर भी रुपया कमजोर क्यों?

आर्थिक विशेषज्ञ के तौर पर प्रकाश मेहरा का कहना है कि “सामान्यतः जिस देश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ती है, उसकी मुद्रा भी मजबूत होती है। भारत की जीडीपी वृद्धि दर हाल के वर्षों में चीन से भी अधिक रही, लेकिन इसके बावजूद रुपया लगातार कमजोर हुआ।”

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम और अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला जैसे विशेषज्ञ भी सवाल उठा रहे हैं कि “यदि भारत की अर्थव्यवस्था इतनी तेज़ी से बढ़ रही है, तो रुपया मजबूत क्यों नहीं हो रहा।

ट्रंप टैरिफ और ईरान संकट का असर

विश्लेषकों के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर भारी आयात शुल्क लगाए जाने से भारतीय निर्यात पर दबाव बढ़ा। इसके बाद ईरान युद्ध से पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट ने भारत के आयात बिल को और बढ़ा दिया। भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है, इसलिए तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया कमजोर हुआ। भारतीय रिज़र्व बैंक ने मार्च और अप्रैल 2026 में रुपये को संभालने के लिए कई कदम उठाए, लेकिन उसका असर सीमित रहा।

एशिया की कई मुद्राएँ क्यों हो रही हैं मजबूत?

मलेशिया की रिंगिट बनी सबसे मजबूत मुद्रा। मलेशिया की मुद्रा रिंगिट पिछले एक वर्ष में 9.25 प्रतिशत मजबूत हुई। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी बड़ी वजहें हैं :- मजबूत करंट अकाउंट सरप्लस। विदेशी निवेश में बढ़ोतरी। बेहतर कारोबारी माहौल। चीन, यूरोप और मध्य-पूर्व के साथ व्यापार समझौते।मलेशिया की जीडीपी वृद्धि दर 2025 में लगभग 4.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

थाईलैंड की बाट को निर्यात का सहारा

थाईलैंड की मुद्रा बाट जनवरी 2026 में जून 2021 के बाद सबसे मजबूत स्तर पर पहुंच गई। थाईलैंड का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष तेजी से बढ़ा है। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में भारी उछाल से डॉलर की आमद बढ़ी और बाट मजबूत हुई।

चीन का युआन भी मजबूत

चीन की मुद्रा रेनमिन्बी (युआन) भी तीन वर्षों के सबसे मजबूत स्तर पर पहुंच गई। विशेषज्ञों का मानना है कि “चीन का विशाल निर्यात और व्यापार अधिशेष उसकी मुद्रा को मजबूती दे रहा है। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार युआन अभी भी वास्तविक मूल्य से लगभग 20 प्रतिशत कम आंका गया है।

सिंगापुर को AI सेक्टर का फायदा

सिंगापुर डॉलर भी मजबूत हुआ है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में भारी वृद्धि ने सिंगापुर की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी। सिंगापुर की पहली तिमाही की जीडीपी वृद्धि दर 6 प्रतिशत रही, जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में 66.7 प्रतिशत की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई।

रुपये में गिरावट का आम लोगों पर असर

क्या महंगा होगा? रुपया कमजोर होने से विदेशों से आयात होने वाली वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, जैसे:पेट्रोल-डीजल। रसोई गैस। इलेक्ट्रॉनिक्स सामान। खाद और उर्वरक। इससे आम लोगों पर महंगाई का दबाव बढ़ता है।

विदेशी निवेश पर असर

कमजोर रुपया विदेशी निवेशकों के रिटर्न को प्रभावित करता है। मई 2026 तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर की निकासी की। इससे भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ा।

लेकिन कुछ फायदे भी

कमजोर रुपया भारतीय निर्यातकों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है क्योंकि भारतीय सामान विदेशों में सस्ते हो जाते हैं। विदेशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली रकम (रेमिटेंस) का मूल्य भी बढ़ जाता है। मार्च 2025 तक भारत को एक वर्ष में 135 अरब डॉलर से अधिक रेमिटेंस प्राप्त हुए थे।

भारतीय रुपया लगातार दबाव में !

भारतीय रुपया लगातार दबाव में है, जबकि एशिया के कई देशों की मुद्राएँ मजबूत हो रही हैं। प्रकाश मेहरा का मानना है कि “केवल वैश्विक संकट ही नहीं, बल्कि घरेलू आर्थिक नीतियाँ, विदेशी निवेश की स्थिति, व्यापार घाटा और आयात पर निर्भरता भी रुपये की कमजोरी के बड़े कारण हैं। आने वाले समय में सरकार और रिज़र्व बैंक के लिए सबसे बड़ी चुनौती रुपये को स्थिर बनाए रखना और विदेशी निवेशकों का भरोसा लौटाना होगी।

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