नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई ने काम को आसान और तेज जरूर बना दिया है, लेकिन इसकी बढ़ती लोकप्रियता पर्यावरण के लिए नई चुनौती बनती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक AI डेटा सेंटर पूरे जापान के बराबर बिजली और 130 करोड़ लोगों की सालाना जरूरत के बराबर पानी की खपत कर सकते हैं। पढ़ें ये विस्तृत रिपोर्ट।
आज हर कोई एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) टूल्स का दीवाना है। मिनटों का काम सेकंडों में हो रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपका एक आसान सा सवाल पूछना पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा रहा है?
लेकिन संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के वैज्ञानिकों की एक नई रिपोर्ट ने डराने वाला सच सामने रखा है। उनके मुताबिक, एआई हमारे प्राकृतिक संसाधनों जैसे- बिजली, पानी और जमीन को इतनी तेजी से निगल रहा है कि आने वाले कुछ वर्षों में यह अरबों लोगों के लिए संकट पैदा कर सकता है।
यूएन यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फॉर वॉटर, एनवायरनमेंट एंड हेल्थ (UNU-INWEH) की नई रिपोर्ट ‘पर्यावरण पर AI की ऊर्जा का खर्च’ में कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। आइए जानते हैं रिपोर्ट में क्या सामने आया।
2030 तक AI का खौफनाक ‘फुटप्रिंट’
हम अक्सर सोचते हैं कि डिजिटल दुनिया हवा में (क्लाउड पर) काम करती है, लेकिन असल में इसे चलाने के लिए जमीन पर मौजूद बड़े डेटा सेंटर्स की जरूरत होती है। रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक इन डेटा सेंटर्स का खर्च कुछ इस तरह होगा:
पूरे जापान देश के बराबर बिजली की खपत
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, 2030 तक दुनिया भर के एआई डेटा सेंटर लगभग 945 टेरावॉट-आवर बिजली सोख लेंगे। यह पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया की कुल सालाना बिजली खपत का लगभग तीन गुना है। आपको बता दें कि इन देशों की आबादी 65 करोड़ के आसपास है।
यह इतनी बिजली है जितनी पूरे जापान देश में एक साल में खर्च होती है। एक आम भारतीय घर साल भर में जितनी बिजली इस्तेमाल करता है, उतनी ऊर्जा एआई सर्वर कुछ ही सेकंड्स में खत्म कर देते हैं। पहले बिजली घरों या फैक्ट्रियों में लगती थी, अब यह डिजिटल दुनिया में खप रही है।
130 करोड़ लोगों के हिस्से का पानी पी जाएगा एआई
बिजली से भी बड़ा संकट पानी का है। Earth.Org की रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक एआई डेटा सेंटर करीब 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी खर्च कर सकते हैं। यह अफ्रीका के 1.3 अरब लोगों की साल भर की घरेलू पानी की जरूरत के बराबर है। डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए करोड़ों लीटर साफ पानी चाहिए होता है।
एआई मॉडल्स को चलाने वाले चिप और सर्वर काम करते वक्त भयंकर गर्म हो जाते हैं। इन्हें ठंडा रखने के लिए लाखों लीटर साफ पानी की जरूरत होती है। 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी से भारत जैसे बड़े देश की पूरी आबादी की जरूरत पूरी हो सकती है। एक तरफ इंसान पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा है। तो वहीं दूसरी तरफ मशीनें पानी की तरह पानी बहा रही हैं।
जमीन की जरूरत
एआई डेटा सेंटर्स लगाने के लिए जमीन की भी जरूरत होती है। 2030 तक यह 14,500 वर्ग किलोमीटर की जगह घेरेगी। आपको बता दें कि यह इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता से दोगुना बड़ा इलाका है।
सिर्फ ‘कार्बन’ नहीं, असली समस्या पानी और जमीन भी है
अब तक माना जाता था कि डेटा सेंटर सिर्फ कार्बन एमिशन (प्रदूषण) बढ़ाते हैं। कंपनियों को लगता है कि अगर वे कोयले की जगह ग्रीन एनर्जी अपना लेंगी तो सब ठीक हो जाएगा। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि सिर्फ कार्बन पर ध्यान देना गलत है। अगर आप कार्बन कम करने के लिए बायो-एनर्जी का इस्तेमाल करते हैं, तो पानी की खपत 30 गुना और जमीन की जरूरत 100 गुना तक बढ़ सकती है। यानी एक समस्या सुलझाने के चक्कर में दूसरी खड़ी हो रही है।
‘ट्रेनिंग’ नहीं, रोजमर्रा के इस्तेमाल में है असली खतरा
शुरुआत में लगा था कि एआई मॉडल को तैयार करने या ट्रेन करने में ही सबसे ज्यादा बिजली लगती है। लेकिन सच तो यह है कि मॉडल बनने के बाद, जब हम और आप रोजाना इससे सवाल पूछते हैं, तब कुल ऊर्जा का 80 से 90% हिस्सा खर्च होता है।
अगर आकड़ों की बात करें तो अकेले ChatGPT रोजाना करीब 2.5 अरब सवालों के जवाब देता है। इसे चलाने में इतनी बिजली लगती है कि इसके कार्बन प्रदूषण की भरपाई के लिए 26 लाख पेड़ लगाने पड़ेंगे।
अमीर देशों का फायदा, गरीब देशों का नुकसान
- जैसे-जैसे एआई बेहतर हो रहा है, यह सस्ता भी हो रहा है। इससे लोग इसका और भी ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे ऊर्जा की बचत का फायदा खत्म हो रहा है। इसके साथ ही एक बड़ी डिजिटल असमानता पैदा हो रही है। आइए आकड़ों पर नजर डालते हैं:
- दुनिया के 90% एआई डेटा सेंटर सिर्फ 2 देशों में मौजूद हैं।
- 150 से ज्यादा देशों के पास अपना कोई एआई इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है।
- एआई के हार्डवेयर से 2030 तक हर साल 25 लाख टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा (ई-कचरा) पैदा होगा।
- जिन खनिजों से एआई हार्डवेयर बनता है, वे अक्सर गरीब देशों से निकाले जाते हैं और ई-कचरा भी वहीं डंप किया जाता है, जबकि इसका असली फायदा अमीर देश उठा रहे हैं।
अमेरिका में हो रहे विरोध पर एक नजर
पानी और बिजली की इसी बेतहाशा बर्बादी को देखकर अमेरिका के कई शहरों में आम लोग डेटा सेंटर बनाने का कड़ा विरोध कर रहे हैं। स्थानीय लोगों को डर है कि इन सेंटर्स की वजह से उनके इलाकों में पीने का पानी और बिजली कम पड़ जाएगी। विरोध इतना तेज है कि पिछले साल अमेरिका में करीब 200 अरब डॉलर के डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स या तो रोक दिए गए या उन पर अस्थायी रोक लगा दी गई।
आपका एक ‘एआई प्रॉम्प्ट’ भी है जिम्मेदार
शायद आपको लगे कि ये सब बड़ी कंपनियों का काम है, लेकिन ऐसा नहीं है। IEA की रिपोर्ट बताती है कि एआई की 80% से 90% ऊर्जा ट्रेनिंग में नहीं, बल्कि इंफेरेंस (Inference) में खर्च होती है। यानी जब भी आप और हम चैटजीपीटी से सवाल पूछते हैं, कोई एआई फोटो बनाते हैं या वीडियो जनरेट करते हैं तब सर्वर चालू होते हैं, बिजली फुंकती है और उन्हें ठंडा करने के लिए पानी खर्च होता है। हम जितना ज्यादा एआई का इस्तेमाल करेंगे, संसाधनों पर उतना ही बोझ बढ़ेगा।
तो समाधान क्या है?
यूएन के वैज्ञानिकों का कहना है कि एआई एक शानदार तकनीक है जिसे रोकना समाधान नहीं है, बल्कि इसे जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना जरूरी है। इसके लिए कुछ अहम कदम उठाने होंगे:
पारदर्शिता: टेक कंपनियों को यह साफ-साफ बताना चाहिए कि उनका कौन-सा एआई मॉडल कितना पानी और जमीन इस्तेमाल कर रहा है।
सही मॉडल का चुनाव: यूजर्स और कंपनियों को छोटे कामों के लिए हल्के (कम ऊर्जा लेने वाले) एआई मॉडल का इस्तेमाल करना चाहिए।
सरकारी नीतियां: सरकारों को डेटा सेंटर वहां बनाने की मंजूरी नहीं देनी चाहिए जहां पहले से ही पानी या बिजली का संकट हो। उदाहरण के लिए आयरलैंड, मैक्सिको और उरुग्वे जैसे देशों में डेटा सेंटर्स के कारण आम जनता के लिए पानी-बिजली कम पड़ गई थी।
डिजाइन में बदलाव: मॉडल को डिफॉल्ट रूप से इस तरह सेट किया जाना चाहिए कि वह कम रिजॉल्यूशन या कम शब्दों में काम कर सके, ताकि फालतू ऊर्जा बर्बाद न हो।







