नई दिल्ली। टीएमसी में बड़े पैमाने पर हुई बगावत के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या विपक्षी क्षेत्रीय दलों का कांग्रेस में विलय कर दिया जाना चाहिए या फिर उन्हें 2029 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार कर लेना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तमिलनाडु में डीएमके, बिहार में आरजेडी, पश्चिम बंगाल में टीएमसी, महाराष्ट्र में शिवसेना, ओडिशा में बीजेडी के कमजोर होने से इस चर्चा को बढ़ावा मिल रहा है कि सभी क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करके बीजेपी से मुकाबले के लिए कमर कस लेनी चाहिए।
कांग्रेस समर्थकों का तर्क है कि विपक्ष में केवल यही पार्टी है जिसका देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में संगठन है और चूंकि देश में लंबे वक्त तक कांग्रेस की सरकार रही है इसलिए 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले तमाम विपक्षी दलों को कांग्रेस के झंडे के नीचे इकट्ठा होना चाहिए।
राहुल गांधी भी दे चुके हैं बयान
खुद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी कई बार कह चुके हैं कि कांग्रेस ही देश में विपक्ष का नेतृत्व कर सकती है और वैचारिक स्तर पर बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का मुकाबला कर सकती है।
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शुमार अशोक गहलोत ने टीएमसी में चल रही भगदड़ के बीच कुछ ऐसा ही बयान दिया। उन्होंने कहा कि जो भी क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस से अलग होकर निकली हैं, उन सब को वापस कांग्रेस में शामिल होना चाहिए। शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने कहा कि विपक्षी दलों को कांग्रेस के झंडे के नीचे आकर अपनी नई शुरुआत करनी चाहिए। टीएमसी की ओर से कांग्रेस में विलय की चर्चाओं को खारिज कर दिया गया लेकिन ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से मुलाकात की और इंडिया गठबंधन में शामिल दलों को बीजेपी से मुकाबला करने के लिए एकजुट होने को कहा।
2014 से 2024 तक तमाम राज्यों में जिस तरह का कांग्रेस का प्रदर्शन रहा है और 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे शिकस्त मिली है, ऐसे में यह सवाल उठना जायज है कि क्या कांग्रेस समूचे विपक्ष का नेतृत्व कर पाएगी?
कांग्रेस नेताओं की ओर से भले ही यह दावा किया जा रहा है कि उनकी पार्टी ही बीजेपी और एनडीए से मुकाबला कर सकती है लेकिन यह सच भी किसी से छिपा नहीं है कि कांग्रेस पिछले 10-12 सालों में कई राज्यों में बुरी तरह टूट का शिकार हो चुकी है। इसमें मणिपुर, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड सहित तमाम राज्य शामिल हैं।
कई बड़े नेताओं ने छोड़ी पार्टी
इसके अलावा कई बड़े नेता पिछले कुछ सालों में पार्टी छोड़कर जा चुके हैं। इनमें पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, सांसद जगदंबिका पाल, जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री जितिन प्रसाद, पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़, पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा जैसे तमाम बड़े नेता शामिल हैं।
पिछले कुछ सालों में जब कांग्रेस लगातार राज्यों और केंद्र में चुनावी हार का सामना कर रही थी तब टीएमसी की प्रमुख ममता बनर्जी को विपक्ष में सबसे बड़ी नेता बताया जाता था लेकिन उनकी हार के बाद और हार के एक महीने के अंदर बड़ी संख्या में विधायकों और सांसदों की बगावत ने तमाम विपक्षी नेताओं के सामने उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंता पैदा कर दी है।
क्षेत्रीय दल होंगे तैयार?
अभी तक अपने-अपने राज्यों में आरजेडी, डीएमके, शिवसेना (यूबीटी) जैसे दल कांग्रेस से कहीं ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ते हैं लेकिन अगर यह दल कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार कर लेते हैं तो इन राज्यों में कांग्रेस ज्यादा सीटें मांगेगी और इससे स्वाभाविक रूप से क्षेत्रीय दलों का हिस्सा कम होगा। कांग्रेस और इन क्षेत्रीय दलों के बीच यह लड़ाई लगातार चल रही है।
ऐसे में सवाल जरूर उठेगा कि ये क्षेत्रीय राजनीतिक दल क्या कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार होंगे। अगर ये दल तैयार नहीं हुए तो विपक्ष का 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी-एनडीए के खिलाफ एकजुट होने का ऐलान सिर्फ ऐलान ही बनकर रह जाएगा।







