नई दिल्ली। हर साल 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य केवल बढ़ती आबादी पर चर्चा करना नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, लैंगिक समानता और मानव विकास जैसे मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाना है। इस वर्ष भी दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि बढ़ती आबादी को चुनौती माना जाए या मानव पूंजी में बदलकर विकास की ताकत बनाया जाए।
विश्व जनसंख्या दिवस की शुरुआत 1989 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की पहल पर हुई। इसकी पृष्ठभूमि 11 जुलाई 1987 का ‘फाइव बिलियन डे’ था, जब दुनिया की आबादी प्रतीकात्मक रूप से 5 अरब तक पहुंची। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने इसे वैश्विक जागरूकता दिवस के रूप में अपनाया।
दुनिया की आबादी 1804 में पहली बार 1 अरब तक पहुंची थी। इसके बाद चिकित्सा, टीकाकरण, स्वच्छता और कृषि क्षेत्र में प्रगति से जनसंख्या वृद्धि तेज हुई। 2022 में वैश्विक आबादी 8 अरब का आंकड़ा पार कर गई।
2023 में चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बना भारत
भारत 2023 में चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया। दुनिया का लगभग हर छठा व्यक्ति भारतीय है। भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में भी शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और रोजगार मिले तो यही आबादी आर्थिक विकास की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
भारत में पहली व्यवस्थित जनगणना का प्रयास 1872 में हुआ, जबकि 1881 से नियमित जनगणना शुरू हुई। जनगणना केवल आबादी की गिनती नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, शहरीकरण और सामाजिक-आर्थिक योजनाओं का आधार भी है।
हाल के वैश्विक अनुमानों के अनुसार 2026 में भारत की आबादी करीब 147 करोड़ है और दुनिया की कुल आबादी का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा भारत में रहता है। वहीं देश की कुल प्रजनन दर घटकर करीब 1.9 रह गई है, जबकि आबादी के स्थिर रहने के लिए 2.1 का स्तर आवश्यक माना जाता है। इससे संकेत मिलता है कि भविष्य में भारत को वृद्ध होती आबादी और कार्यबल के संतुलन जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है।
भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल आबादी नहीं, रोजगार से जुड़े लोगों की संख्या है
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल आबादी की संख्या नहीं, बल्कि शिक्षित, कुशल और रोजगार से जुड़े लोगों की संख्या है। हर साल लाखों युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। यदि रोजगार सृजन और कौशल विकास की रफ्तार नहीं बढ़ी तो बेरोजगारी सामाजिक और आर्थिक दबाव बढ़ा सकती है।
जनसंख्या का प्रभाव रोजगार के अलावा शहरीकरण, जल संकट, प्रदूषण, आवास, ऊर्जा और कचरा प्रबंधन पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञ समय रहते शहरी नियोजन, सार्वजनिक परिवहन और जल प्रबंधन में निवेश की जरूरत पर जोर देते हैं।
दूसरी ओर, दुनिया के कई विकसित देश घटती जन्मदर और बुजुर्ग आबादी की चुनौती झेल रहे हैं। ऐसे में भारत के पास अपने युवाओं को कौशल आधारित शिक्षा देकर वैश्विक कार्यबल का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने का अवसर है। सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवाएं, इंजीनियरिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में भारतीय युवा बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
महिलाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य को भी जनसंख्या से जुड़ी नीतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। शोध बताते हैं कि लड़कियों की शिक्षा बढ़ने से मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार, बाल विवाह में कमी और परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता बढ़ती है। विश्व जनसंख्या दिवस 2026 का केंद्रीय संदेश भी युवाओं की आकांक्षाओं, शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और निर्णय लेने के अधिकार पर केंद्रित है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा है कि हर व्यक्ति की क्षमता को विकसित करने के लिए उसके अधिकारों और विकल्पों की रक्षा जरूरी है। वहीं पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का मानना था कि देश का सबसे बड़ा संसाधन उसके युवा हैं।
विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि किसी देश की वास्तविक ताकत उसकी आबादी की संख्या नहीं, बल्कि उसके लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और अवसरों में निहित होती है। भारत के लिए भी आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा अवसर यही है कि वह अपनी विशाल आबादी को मानव पूंजी में कितनी प्रभावी ढंग से बदल पाता है।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण देशभर में ईंधन की समस्या उतपन्न हो गई है। आम लोगों को पेट्रोल-डीजल के लिए लंबी लाइनों में लगना पड़ रहा है। ऐसे में इन परेशानियों के बीच रोजमर्रा के कामों को पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो रहा है। हालांकि, झारखंड के एक शिक्षक ने इन परेशानियों का ऐसा अनोखा तरीका निकाला है, जिस कारण वह सोशल मीडिया पर छा गए हैं।







