नई दिल्ली। भारत और चीन के संबंध कैसे हैं, ये बताने की जरूरत नहीं है। बाहर से तो देखने में सब ठीक लगता है, लेकिन ड्रैगन अंदरखाने खेल करते रहता है। अब जो खबर आई है, वह भारत को टेंशन देने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन तिब्बत में दोहरी रणनीति ( Twin Strategy) अपना रहा है। एक तरफ वह इलाके की तिब्बती बौद्ध पहचान को व्यवस्थित तरीके से मिटाने में लगा है, दूसरी तरफ दोहरे उपयोग वाला बुनियादी ढांचा खड़ा कर रहा है। इससे वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की ऑपरेशनल क्षमता मजबूत हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह आकलन ऐसे समय में सामने आया है जब सैटेलाइट तस्वीरें, चश्मदीदों के बयान और तिब्बत वॉच की रिपोर्ट के साथ चीनी सरकारी मीडिया की खबरें पूर्वी तिब्बत की एक महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल को ध्वस्त कर उसके दोबारा इस्तेमाल की ओर इशारा कर रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, तिब्बत के खाम क्षेत्र के ड्रैगो काउंटी अधिकारियों ने सेंगडेंग गांव में 99 फुट ऊंची बुद्ध मूर्ति वाली जगह को ‘ड्रैगो काउंटी रेड आर्मी कैवेलरी डिवीजन रेसकोर्स’ नाम के रेसकोर्स में बदल दिया है।
दरअसल, यह स्थल कभी स्थानीय लोगों के लिए ‘पीपल्स बुद्धा’ के नाम से जाना जाता था और तिब्बती बौद्ध पूजा का केंद्र था। श्रद्धालु रोज यहां परिक्रमा के लिए जुटते थे। समुदाय के दान से बनी इस मूर्ति का मकसद 1973 में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान आए विनाशकारी भूकंप के बाद इलाके को भूकंप से बचाना था। लेकिन 2023 से काउंटी सरकार ने कम्युनिस्ट पार्टी के प्रचार के लिए यहां सरकारी खेल और सांस्कृतिक उत्सव आयोजित किए हैं। बीजिंग इसे ‘रेड टूरिज्म’ कहता है। तिब्बत वॉच के अनुसार, स्थानीय तिब्बतियों ने इस बदलाव की तुलना ‘दूसरी सांस्कृतिक क्रांति’ से की है। उन्होंने कहा कि एक पवित्र धार्मिक जगह को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की महिमा गाने वाले स्थल में बदल दिया गया है।
चीनी प्रोजेक्ट पर उठ रहे सवाल
वहीं, भारतीय खुफिया अधिकारियों का कहना है कि यह पुनर्विकास एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जो सांस्कृतिक समावेशन से कहीं आगे है। सीएनएन-न्यूज18 ने शीर्ष खुफिया सूत्रों के हवाले से बताया है कि तिब्बत में चीन के विकास प्रोजेक्ट पूरी तरह आम लोगों के लिए नहीं हैं। आकलन के अनुसार, पर्यटन, खेल सुविधाओं और ग्रामीण विकास के नाम पर बनाया जा रहा इंफ्रास्ट्रक्चर दोहरे उपयोग की क्षमता के साथ डिजाइन किया गया है। इससे भारत-चीन सीमा के पास पीएलए सैनिकों, भारी सैन्य वाहनों और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट को तेजी से तैनात किया जा सकेगा।
अधिकारियों का मानना है कि बीजिंग तिब्बती बस्तियों को धीरे-धीरे सैन्य-सहायता क्षेत्रों में बदल रहा है, जिन्हें एलएसी पर किसी भी संकट के दौरान सक्रिय किया जा सकता है। खुफिया आकलन में यह भी कहा गया है कि सीमावर्ती समुदायों का सैन्यीकरण बढ़ रहा है। ‘आई एम ए लिटिल बॉर्डर पेट्रोल गार्ड’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए छोटे बच्चों को कम उम्र से ही लोकल बॉर्डर मिलिशिया नेटवर्क ‘लिबा’ का हिस्सा बनने की ट्रेनिंग दी जा रही है। इससे सीमा क्षेत्रों में चीन की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो रही है।
जनसांख्यिकी में बदलाव
भारतीय खुफिया सूत्रों का दावा है कि बीजिंग तिब्बती पठार के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सों में हान चीनी आबादी के प्रवास को बढ़ावा दे रहा है। मकसद भारत से सटे संवेदनशील सीमावर्ती जिलों में मूल तिब्बतियों की उपस्थिति को धीरे-धीरे कम कर जनसांख्यिकीय संतुलन बदलना है। साथ ही स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों में पुतोंगहुआ (मंदारिन चीनी) का अनिवार्य इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है, जबकि तिब्बती भाषा, लिपि और सांस्कृतिक शिक्षा को तेजी से किनारे किया जा रहा है। जानकारों का मानना है कि इन नीतियों का उद्देश्य युवा पीढ़ी को उनकी भाषा, इतिहास और धार्मिक परंपराओं से दूर कर लंबे समय में तिब्बती सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करना है।
भारत के लिए रणनीतिक दांव
अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि तिब्बत का महत्व क्षेत्रीय नियंत्रण से कहीं ज्यादा है। तिब्बती पठार ब्रह्मपुत्र, सिंधु और सतलुज जैसी बड़ी नदियों का उद्गम स्थल है। यह इसे एशिया के सबसे महत्वपूर्ण जल स्रोतों में से एक बनाता है। पारंपरिक तिब्बती समुदायों की जगह सरकारी संस्थाओं को लाने और बांध समेत अन्य बुनियादी ढांचे बनाने से बीजिंग को भारत और बांग्लादेश जैसे निचले देशों पर ज्यादा रणनीतिक फायदा मिल सकता है।
तिब्बत की पहचान में बदलाव
खुफिया आकलन में यह भी बताया गया है कि चीन आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय संचार में ‘तिब्बत’ की जगह ‘शिजांग’ शब्द का इस्तेमाल बढ़ा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ भाषाई बदलाव नहीं है। यह तिब्बत को चीन के अविभाज्य प्रशासनिक क्षेत्र के रूप में फिर से परिभाषित करने की कानूनी और कूटनीतिक कोशिश का हिस्सा है। इससे ‘तिब्बत’ नाम से जुड़ी ऐतिहासिक और सभ्यतागत पहचान कमजोर हो रही है।
बताया जा रहा है कि ऐसे कदमों का मकसद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बीजिंग के क्षेत्रीय दावों को मजबूत करना है, जिसमें विवादित हिमालयी सीमा भी शामिल है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए ये घटनाक्रम एक समन्वित रणनीति की ओर इशारा करते हैं, जिसमें सांस्कृतिक समावेशन, जनसांख्यिकीय इंजीनियरिंग और सैन्य बुनियादी ढांचा एक साथ आगे बढ़ रहे हैं। इसका असर न सिर्फ तिब्बत की पहचान पर बल्कि भारत की उत्तरी सीमाओं पर बदलते सुरक्षा माहौल पर भी पड़ रहा है और आने वाले समय में इसका असर भी दिखेगा।







