वाराणसी। उत्तर प्रदेश में सबसे पवित्र नदी गंगा के पश्चिमी किनारे पर बसा वाराणसी दुनिया का सबसे पुराना जीवित शहर और भारत की सांस्कृतिक राजधानी है। इसी शहर के केंद्र में काशी विश्वनाथ मंदिर अपनी पूरी भव्यता के साथ स्थित है, जिसमें शिव के ज्योतिर्लिंग- विश्वेश्वर या विश्वनाथ-विराजमान हैं। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, वाराणसी भगवान शिव का शाश्वत निवास स्थान है। काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग प्रकाश के उस ब्रह्मांडीय स्तंभ का प्रतीक है, जो सृष्टि की रचना और विनाश को दर्शाता है। माना जाता है कि जो भक्त यहा सच्ची श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं, उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।
विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की महत्ता
विश्वनाथ मंदिर में स्थित ‘विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग’ भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से सातवां है। ‘सावन माह में विशेष’ में हम आपको भारत में स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में बता रहे हैं। इससे पहले, आपने प्रथम सोमनाथ, दूसरे मल्लिकार्जुन, तीसरे महाकालेश्वर, चौथे ओंकारेश्वर, पांचवें केदारेश्वर और छठें भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के बारे में पढ़ा।
‘सावन माह में विशेष’ की इस कड़ी में हरियाली अमावस्या के दिन आप वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर में स्थित ‘विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग’ के बारे में जानेंगे, बारह ज्योतिर्लिंगों में से विश्वेश्वर या विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग सबसे प्रसिद्ध है क्योंकि इसे दुनिया के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। विश्वनाथ का अर्थ है ‘विश्व या ब्रह्मांड का शासक’। स्कंद पुराण में काशी खंड के अनुसार काशी को शिव को विष्णु जी ने दिया था उपहार के रूप में, और अग्नि पुराण में काशी को शिव ने कभी न छोड़ने को कहा।
माना जाता है कि भगवान शिव काशी में रहते थे, लेकिन उनकी सास उनके रहने की जगह से खुश नहीं थीं। अपनी पत्नी देवी पार्वती को खुश करने के लिए, भगवान शिव ने राक्षस निकुंभ से काशी में अपने परिवार के रहने लायक जगह बनाने को कहा। पार्वती उस जगह से इतनी खुश हुईं कि उन्होंने सभी को भोजन कराया, और इसीलिए उनकी पूजा अन्नपूर्णा या अन्नपूर्णी के रूप में की जाती है। यहां तक कि माना जाता है कि भगवान शिव भी भोजन पाने के लिए उनके सामने भिक्षा-पात्र लेकर खड़े होते हैं।
मान्यता है कि यह मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती का आदि स्थान है। इसके पीछे एक कहानी है। जब देवी पार्वती अपने पिता के घर रह रही थीं जहां उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। देवी पार्वती ने एक दिन भगवान शिव से उन्हें अपने घर ले जाने के लिए कहा। भगवान शिव ने देवी पार्वती की बात मानकर उन्हें काशी लेकर आए और यहां विश्वनाथ-ज्योतिर्लिंग के रूप में खुद को स्थापित कर लिया।
वाराणसी (काशी) का महत्व
अधिकांश लोग जानते हैं कि काशी दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है। यह शहर भगवान शिव के सबसे पवित्र स्थानों में से एक है और हिंदू धर्म के सात पवित्र शहरों में से एक भी है। हिंदू धर्म में सात पवित्र शहर हैं, जिन्हें “सप्त पुरी” कहा जाता है। ये शहर हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थल हैं और इनका बहुत महत्व है।
यह सात शहर हैं-
1-अयोध्या: भगवान राम की जन्मभूमि, उत्तर प्रदेश।
2-मथुरा: भगवान कृष्ण की जन्मभूमि, उत्तर प्रदेश।
3-काशी (वाराणसी): भगवान शिव की नगरी, उत्तर प्रदेश
4-कांति (कंति): भगवान विष्णु का मंदिर, पश्चिम बंगाल।
5-उज्जैन: भगवान शिव का मंदिर, मध्य प्रदेश।
6-द्वारका: भगवान कृष्ण की राजधानी, गुजरात।
7-हरिद्वार: गंगा नदी का उद्गम स्थल, उत्तराखंड।
वहीं, काशी भगवान शिव की त्रिशूल पर बसी एक अविमुक्ता नगरी है, जिसे हिन्दू धर्म में मोक्ष की राजधानी माना गया है। माना जाता है कि है कि प्रलय के समय भी यह नष्ट नहीं होती और यहां मृत्यु होने पर शिव स्वयं तारक मंत्र (राम नाम) का उपदेश देते हैं। मान्यता है कि जो लोग काशी में रहते हैं या जिनकी मृत्यु वहां होती है, उन्हें मोक्ष या ज्ञान की प्राप्ति होती है। यहां किया गया कोई भी अच्छा काम सारे पापों को मिटा देता है। वाराणसी (काशी) ज्ञान, संगीत, साहित्य और कला का केंद्र रही है। यहां की प्रसिद्ध गंगा आरती देखने देश-विदेश से लोग आते हैं।
विश्वेश्वर मंदिर
अब बात करते हैं, ‘काशी विश्वनाथ मंदिर’ की, इसका सबसे पहला उल्लेख पुराणों में मिलता है। मंदिर के गर्भगृह के केंद्र में चांदी के वेदी पर ज्योतिर्लिंग स्थापित है। यहां विष्णु, विनायक, कालभैरव और शनिश्वर जैसे अन्य देवताओं के भी मंदिर हैं। मंदिर के अंदर एक कुआं है, जिसे ज्ञान का कुआं या ज्ञानवापी कहा जाता है। प्राप्त जानकारियों के अनुसार, जब मुगल मंदिर को नष्ट करने आए थे, तब लिंग को यहीं छिपा दिया गया था। इस मंदिर के शिखर को महाराजा रणजीत सिंह (जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम पर शासन किया) द्वारा 1835 में दान किए गए सोने से मढ़ा गया था। इसके तीनों गुंबदों पर सोने की परत चढ़ी होने के कारण पर्यटक इसे ‘वाराणसी का स्वर्ण मंदिर’ कहते हैं।
इसे 1194 ईस्वी में कुतुब-उद-दीन-ऐबक द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था और फिर सदियों से अन्य आक्रमणकारियों द्वारा, जिनमें मुगल सम्राट औरंगजेब भी शामिल है, जिसने 1669 में इसके स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण किया था। इसका पुनर्निर्माण मुगल सम्राट अकबर के सेनापति राजा मान सिंह और उनके वित्त मंत्री राजा टोडरमल सहित विभिन्न शासकों द्वारा किया गया था।
मंदिर की वर्तमान संरचना 1780 में इंदौर के मराठा शासक अहिल्याबाई होल्कर द्वारा तत्कालीन काशी नरेश महाराजा चेत सिंह के सहयोग से निकटवर्ती स्थान पर बनाई गई थी। काशी नरेश महाराजा चेत सिंह ने सभी मराठा सैनिकों एवं कारीगरों को सुरक्षा प्रदान किया था। जिसके कारण काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कार्य आसानी से पूरा हो पाया।
काशी विश्वनाथ मंदिर के निर्माण के लिए काशी नरेश महाराजा बलवंत सिंह ने “काशी मुक्ति अभियान” चलाकर काशी को अवध के नवाब के नियंत्रण से मुक्त करवा दिया था। काशी में सनातन संस्कृति के पुनर्निर्माण के लिए काशी नरेश महाराजा बलवंत सिंह को उत्तर भारत का शिवाजी कहा जाता था। सनातन संस्कृति को स्वतंत्र कराने में महाराजा बलवंत सिंह का मुख्य योगदान था। वर्तमान मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा सन् 1780 में करवाया गया था।
तत्कालीन काशी नरेश महाराजा चेत सिंह ने मंदिर निर्माण कार्य में लगे सभी कारीगरों को सुरक्षा प्रदान करवाया था। मंदिर निर्माण में महाराजा चेत सिंह ने भी धन का योगदान दिया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 1835 में 1000 कि.ग्रा शुद्ध सोने द्वारा बनवाया गया था। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सदियों से काशी विश्वनाथ मंदिर का संचालन काशी नरेशों के द्वारा किया जाता रहा है लेकिन सन् 1983 ईस्वी में उत्तरप्रदेश सरकार ने इस मंदिर को तत्कालीन काशी नरेश महाराजा विभूति नारायण सिंह के प्रबंधन से छीनकर अपने अधीन ले लिया। काशी विश्वनाथ मंदिर को हिंदू शास्त्रों द्वारा शैव संस्कृति में पूजा का एक केंद्रीय हिस्सा माना जाता है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ, गोस्वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ है। यहीं पर सन्त एकनाथजी ने वारकरी सम्प्रदाय का महान ग्रन्थ श्रीएकनाथी भागवत लिखकर पूरा किया और काशीनरेश तथा विद्वतजनों द्वारा उस ग्रन्थ की हाथी पर धूमधाम से शोभायात्रा निकाली गयी। महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभा यात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है।
श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर
यह भी उल्लेखनीय है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 दिसंबर 2021 को वाराणसी में भव्य श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर (श्री काशी विश्वनाथ धाम) का लोकार्पण किया था। इस ड्रीम प्रोजेक्ट का उद्देश्य मां गंगा के तट को सीधे ऐतिहासिक मंदिर से जोड़ना और श्रद्धालुओं को विश्व स्तरीय सुविधाएं देना है। कॉरिडोर के उद्घाटन के बाद, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। पहले मंदिर का क्षेत्रफल केवल 3,000 वर्ग फीट तक सीमित था जो अब बढ़कर लगभग 5 लाख वर्ग फीट हो गया है। अब 50,000 – 75,000 श्रद्धालु मंदिर और मंदिर परिसर में दर्शन कर सकते हैं।
काशी विश्वनाथ मंदिर के पूजा और कार्यक्रम
काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा और कार्यक्रम बहुत ही विशेष और आकर्षक होते हैं। मंदिर में महाशिवरात्रि, चैत्र नवरात्र, और अन्य महत्वपूर्ण त्योहारों पर विशेष पूजा और आरती आयोजित की जाती है।





