Upgrade
पहल टाइम्स
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
No Result
View All Result
पहल टाइम्स
No Result
View All Result
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • ईमैगजीन
Home विशेष

पत्रकारों की कमी नहीं, पत्रकारिता की कीमत समझने वाले समाज की कमी है!

हम पत्रकार से स्वतंत्र रहने, सत्ता से सवाल पूछने और सच बोलने की उम्मीद करते हैं; लेकिन जब उसकी स्वतंत्रता की कीमत चुकाने की बारी आती है, तो सरकार, विपक्ष और समाज—तीनों पीछे हट जाते हैं।

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
August 22, 2026
in विशेष
A A
journalist
26
SHARES
875
VIEWS
Share on FacebookShare on Whatsapp

सी.एम. जैन


नई दिल्ली: सरकार को अपनी बात जनता तक पहुँचाने के लिए पैसा देना पड़े, यह समझ में आता है। लेकिन जनता की ओर से सरकार से सवाल पूछने वाले पत्रकार को स्वतंत्र रहने के लिए पैसा कौन देगा—यह सवाल हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने कहीं बड़ा है।

इन्हें भी पढ़े

कार्यकर्ता अभय त्यागी

गढ़मुक्तेश्वर सीट पर बढ़ी सियासी हलचल: युवा जोश के साथ भाजपा कार्यकर्ता अभय त्यागी ने पेश की मजबूत दावेदारी

August 22, 2026
cm Dhami

इकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच संतुलन बनाते हुए विकास को आगे बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता : CM धामी

August 20, 2026
Krishna Kumar Khanna

भारत छोड़ो आंदोलन के आखिरी क्रांतिकारी कृष्ण कुमार खन्ना!

August 18, 2026
National Award to WCL

प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना में सर्वोत्कृष्ट योगदान के लिए वेकोलि को राष्ट्रीय सम्मान

August 17, 2026
Load More

बिहार सरकार ने सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों पर वीडियो बनाने वाले एम्पैनल्ड सोशल मीडिया क्रिएटर्स के लिए व्यूज के आधार पर भुगतान की व्यवस्था को मंजूरी दी है। उपलब्ध विवरण के अनुसार पात्र वीडियो को हर एक लाख व्यूज पर 10 हजार रुपये तक और एक वीडियो पर अधिकतम एक लाख रुपये तक का भुगतान मिल सकता है; व्यूज की गणना और सत्यापन की प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है। सरकार का तर्क सीधा है—डिजिटल माध्यमों की पहुंच का इस्तेमाल करके सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी ज्यादा लोगों तक पहुंचाई जाए।

इसमें पहली नजर में गलत क्या है? सरकार जनता को अपनी योजनाओं की जानकारी देना चाहती है, डिजिटल क्रिएटर उसे लोगों तक पहुंचाएगा और उसके काम के बदले भुगतान मिलेगा। बाजार की भाषा में यह बिल्कुल सामान्य व्यवस्था है। लेकिन लोकतंत्र बाजार से थोड़ा अलग होता है। यहां सवाल केवल यह नहीं होता कि किसे कितना पैसा मिला; सवाल यह भी होता है कि पैसा मिलने से उसकी आवाज किस दिशा में मुड़ सकती है।

एक लाख रुपये का असली मूल्य उसके नोटों में नहीं, उसके प्रभाव में है।

किसी पत्रकार से यह कहने की जरूरत नहीं कि सरकार की आलोचना मत करो। उसे बस इतना कह दीजिए कि सरकार की योजनाओं पर ऐसा वीडियो बनाओ जिससे व्यूज आएं और हर एक लाख व्यूज पर दस हजार रुपये मिलेंगे। फिर देखिए, सेंसर की जरूरत कितनी बचती है। आदमी के भीतर बैठा छोटा-सा आर्थिक गणित कई बार बाहर बैठे बड़े सेंसर से ज्यादा प्रभावी होता है।

जहां सवाल पूछने से कुछ नहीं मिलता और सरकार की उपलब्धि बताने से पैसा मिलता है, वहां धीरे-धीरे सवाल कम नहीं होते; सवाल पूछने की कीमत बढ़ जाती है।

यही इस व्यवस्था का सबसे गंभीर पक्ष है।

सरकार यह नहीं कह रही कि केवल प्रशंसा करो। यह कहना भी उचित नहीं होगा कि इस योजना से हर क्रिएटर बिक जाएगा। ऐसा निष्कर्ष तथ्य से आगे निकल जाना होगा। कोई पत्रकार सरकारी योजना की जानकारी लेते हुए उसकी कमियां भी बता सकता है। कोई क्रिएटर पैसा लेकर भी स्वतंत्र रह सकता है। भुगतान अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है।

लेकिन लोकतंत्र केवल वास्तविक सेंसरशिप से नहीं बचता। वह हितों के टकराव से भी बचाया जाता है। आज सरकारी योजना का प्रचार करने पर पैसा है। कल सरकार की किसी नीति की आलोचना करने पर क्या होगा? क्या उस आलोचना के लिए भी उतना ही संस्थागत समर्थन होगा? क्या कोई पत्रकार सरकार की योजना की जांच करके बताए कि पैसा कहां खर्च हुआ, लाभार्थी तक पहुंचा या नहीं, भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, आंकड़े सही हैं या नहीं—तो उसे भी वही आर्थिक सुरक्षा मिलेगी?

या फिर व्यवस्था का संदेश इतना भर होगा—सरकार के बारे में बोलिए, सरकार की तरफ से बोलिए; बस सरकार के खिलाफ बोलते समय अपनी जेब देख लीजिए।

यहीं से मामला बिहार की एक सोशल मीडिया नीति से निकलकर भारतीय पत्रकारिता की उस पुरानी बीमारी तक पहुंच जाता है, जिसका इलाज आज तक किसी सरकार ने गंभीरता से नहीं खोजा—स्वतंत्र पत्रकारिता आखिर जिएगी कैसे?

बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की अपनी समस्याएं हैं, लेकिन सबसे कठिन स्थिति उस पत्रकार की है जो छोटे शहर, कस्बे या गांव में कलम-कैमरा लेकर निकलता है। उसके पास न बड़ी संस्था का कानूनी विभाग है, न सुरक्षा तंत्र, न स्थायी वेतन, न आर्थिक संकट के समय कोई सुरक्षा कवच। वह भ्रष्टाचार पर खबर करता है तो सामने केवल अधिकारी या नेता नहीं होता; कई बार स्थानीय दबंग, कारोबारी, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक दबाव भी होता है। CPJ की पुरानी जांचों ने भी दर्ज किया है कि भारत में भ्रष्टाचार और राजनीति पर रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों में छोटे शहर और ग्रामीण पत्रकार विशेष जोखिम में रहे हैं।

CPJ के अनुसार, 1992 से अब तक भारत में पत्रकारों की हत्याओं के 94 मामले दर्ज हैं।लेकिन इस संख्या के पीछे 94 परिवार हैं, जिनके घर से कोई एक आदमी निकला था—सवाल पूछने, सच सामने लाने और दूसरों की आवाज बनने। वह लौटकर नहीं आया। उसके बाद उसके परिवार को क्या मिला? कुछ मामलों में न्याय का इंतजार, कुछ में चुप्पी और बहुतों में वह खालीपन, जिसे कोई पुरस्कार, कोई सम्मान और कोई सरकारी बयान कभी भर नहीं सकता। हम पत्रकार से मरते दम तक सच मांगते रहे, लेकिन जब सच के लिए उसकी जान चली गई, तब उसके परिवार के हिस्से में हमारा कर्ज भी नहीं आया।

और यहीं हमारी सबसे बड़ी विडंबना सामने आती है। हम पत्रकार से कहते हैं—सच बोलो। लेकिन यह नहीं पूछते कि सच बोलने के बाद उसका घर कैसे चलेगा। हम कहते हैं—भ्रष्टाचार उजागर करो। लेकिन जब वह उजागर कर देता है तो मुकदमा हो जाए, धमकी मिले, विज्ञापन बंद हो जाए या परिवार पर आर्थिक संकट आए, तब हम उसकी कहानी को अगले दिन की खबर भी नहीं बनने देते।

हम पत्रकार से ईमानदारी की उम्मीद करते हैं, लेकिन ईमानदारी की आर्थिक कीमत चुकाने को तैयार नहीं हैं। फिर जब वही पत्रकार मजबूरी में किसी राजनीतिक दल, कारोबारी, विज्ञापनदाता या सत्ता के दरवाजे पर जाता है तो हम पूछते हैं—तुम बिक गए?

सवाल यह है कि उसे बिकने की मजबूरी किसने पैदा की?

सरकारों ने पत्रकारिता को अक्सर विज्ञापनदाता की नजर से देखा। विपक्ष ने पत्रकारिता को अक्सर अपने संघर्ष के साथी की नजर से देखा। लेकिन दोनों ने एक बुनियादी सवाल से बचने की कोशिश की—पत्रकार को स्वतंत्र रहने की कीमत कौन देगा?

सरकार को अपनी योजनाओं के प्रचार के लिए बजट मिलता है। राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए संसाधन मिलते हैं। नेताओं के पास संगठन होते हैं। बड़े संस्थानों के पास पूंजी होती है। लेकिन वह पत्रकार जो इन सबके बीच खड़ा होकर पूछता है कि “हिसाब कहां है?” उसके पास अक्सर केवल उसका कैमरा और उसकी हिम्मत होती है। और हिम्मत से घर नहीं चलता।

यहीं विपक्ष भी कटघरे में खड़ा होता है।

सरकार अगर अपने संदेश को डिजिटल दुनिया तक पहुंचाने के लिए आर्थिक मॉडल बना सकती है तो विपक्ष क्यों नहीं? यदि विपक्ष को लगता है कि स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक है तो उसने कितने छोटे पत्रकारों के लिए कानूनी सहायता कोष बनाया? कितने पत्रकारों के परिवारों के लिए आपातकालीन सहायता की व्यवस्था की? कितने पत्रकारों को उपकरण, प्रशिक्षण या स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लिए अनुदान दिया?

सत्ता से लड़ते समय पत्रकार विपक्ष का साथी है, लेकिन संकट में पड़ते ही वह अचानक “व्यक्तिगत मामला” क्यों हो जाता है?

राजनीतिक दलों को पत्रकार का कैमरा चाहिए, पत्रकार की जिंदगी नहीं—तो फिर स्वतंत्र पत्रकारिता की रक्षा का दावा किसलिए?

यही कारण है कि बिहार की नीति को केवल “सरकार क्रिएटरों को पैसा दे रही है” कहकर छोड़ देना आसान है, लेकिन पर्याप्त नहीं। असली प्रश्न यह है कि लोकतंत्र में सूचना का आर्थिक ढांचा किस दिशा में जा रहा है।

अगर सरकार अपनी उपलब्धियां बताने के लिए डिजिटल आवाजों को प्रोत्साहित करती है, तो उसी अनुपात में स्वतंत्र तथ्य-जांच, खोजी रिपोर्टिंग और जनहित पत्रकारिता के लिए भी पारदर्शी, गैर-पक्षपाती और संपादकीय स्वतंत्रता सुरक्षित रखने वाली व्यवस्था क्यों नहीं बन सकती?

सरकारी योजना का प्रचार करने वाले को पैसा देना आसान है। सरकार की उसी योजना की जांच करने वाले को स्वतंत्र रखने की व्यवस्था करना लोकतंत्र है।

फर्क यहीं है।

पहले राजा दरबारियों को पालता था और दरबारी राजा की प्रशंसा करते थे। आज लोकतंत्र में वही दृश्य हूबहू लौट आए, ऐसा कहना अतिशयोक्ति होगा। लेकिन खतरा किसी पुराने दृश्य की वापसी में नहीं, उसके आधुनिक रूप में छिपा है। आज दरबारी शायद पगड़ी पहनकर दरबार में नहीं बैठता। वह कैमरे के सामने बैठता है, हाथ में मोबाइल रखता है और कहता है—“दोस्तों, आज हम आपको सरकार की इस शानदार योजना के बारे में बताते हैं।”

समस्या यह नहीं कि वह योजना बताए। समस्या तब शुरू होगी जब वह यह भूल जाए कि योजना जनता के पैसे से बनी है और सरकार जनता की है; इसलिए उसकी भूमिका सरकार की प्रशंसा करना नहीं, जनता को सच बताना है। और सच केवल वह नहीं जो सरकार बताना चाहती है। सच वह भी है जो सरकार छिपाना चाहती है। सच वह भी है जो सरकार को असहज करता है। सच वह भी है जिसमें सरकार की उपलब्धि है। और सच वह भी है जिसमें सरकार की विफलता है।

सरकार को केवल अपने अनुकूल सच पसंद आने लगे तो पत्रकारिता सूचना विभाग बन जाती है। और पत्रकार केवल वही दिखाने लगे जिससे उसका भुगतान सुरक्षित रहे तो जनता धीरे-धीरे दर्शक नहीं, ग्राहक बन जाती है।

लेकिन इस कहानी का सबसे दुखद हिस्सा सरकार नहीं है। सबसे दुखद हिस्सा हम हैं।

हम एक ईमानदार पत्रकार को देखकर कहते हैं—“बहुत अच्छा काम कर रहे हो।” लेकिन जब उसे कैमरा खरीदना हो, कानूनी लड़ाई लड़नी हो, घर चलाना हो या उसके बच्चे की फीस भरनी हो, तब हमारी ईमानदारी जेब में हाथ डालते ही गायब हो जाती है।

हम चाहते हैं कि कोई हमारे लिए सच बोले, लेकिन उस सच की कीमत कोई और चुकाए। हम चाहते हैं कि कोई भ्रष्टाचार उजागर करे, लेकिन विज्ञापनदाता नाराज न हो। हम चाहते हैं कि कोई सत्ता से सवाल करे, लेकिन मुकदमा उसके ऊपर आए तो हम चुप रहें। हम चाहते हैं कि पत्रकार बिके नहीं, लेकिन उसे जिंदा रहने के लिए क्या मिले—इस पर बात नहीं करना चाहते।

शायद इसलिए हमारी सबसे बड़ी समस्या पत्रकारों की कमी नहीं, पत्रकारिता की कीमत समझने वाले समाज की कमी है।

और यही वह जगह है जहां सरकार और विपक्ष दोनों से बड़ा सवाल जनता के सामने खड़ा होता है। अगर सरकार अपनी बात कहने के लिए पैसा खर्च कर सकती है, तो जनता को अपनी बात कहने वाले पत्रकार के लिए क्या करना चाहिए?

अगर विपक्ष सत्ता की आलोचना करने वाले पत्रकार को अपना स्वाभाविक साथी मानता है, तो उसे संकट में पड़े पत्रकार के साथ खड़ा होने की कीमत क्यों नहीं चुकानी चाहिए? और अगर जनता चाहती है कि उसके पास कल भी कोई ऐसा व्यक्ति हो जो बिना डरे पूछ सके—“सरकार, हिसाब दो”—तो क्या उसे आज उस व्यक्ति को केवल लाइक और शेयर देकर छोड़ देना चाहिए?

क्योंकि पत्रकारिता की स्वतंत्रता केवल प्रेस क्लबों, संसद के भाषणों और संविधान की किताबों में सुरक्षित नहीं रहती। वह उस छोटे से कैमरे के पीछे भी रहती है, जिसे लेकर कोई पत्रकार अकेला सड़क पर निकलता है। वह उस रिपोर्ट में रहती है जिसे छापने के बाद विज्ञापन बंद हो सकता है। वह उस सवाल में रहती है जिसके बाद फोन आ सकता है। वह उस परिवार में रहती है जो जानता है कि उसका आदमी आज फिर किसी ताकतवर व्यक्ति के खिलाफ खबर करने गया है।

और कभी-कभी वह उस खाली कुर्सी में भी रह जाती है, जहां बैठने वाला पत्रकार वापस नहीं लौटता।

इसलिए असली सवाल यह नहीं कि बिहार सरकार एक लाख रुपये किसे दे रही है। असली सवाल यह है कि जिस दिन सरकार की ओर से बोलने वाले हर डिजिटल व्यक्ति के पास संसाधन होंगे और जनता की ओर से सवाल पूछने वाला पत्रकार अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा होगा, उस दिन लोकतंत्र में आवाज किसकी बचेगी?

उस दिन सेंसरशिप की जरूरत नहीं होगी। क्योंकि आवाजें खुद अपने भीतर चुप हो चुकी होंगी।

और शायद लोकतंत्र की सबसे खतरनाक हार वही होगी—जब सरकार को चुप कराने के लिए किसी पत्रकार का मुंह बंद करने की जरूरत ही न पड़े; उसकी मजबूरी ही उसकी आवाज बन जाए।

 

इन्हें भी पढ़ें

  • All
  • विशेष
  • लाइफस्टाइल
  • खेल
Buses in Delhi

दिल्ली में चलेगी ‘भगवा’ रंग की बसें, सीएम रेखा गुप्ता ने दिखाई हरी झंडी !

June 27, 2025
Tejashwi and Nitish

बिहार चुनाव 2025: पहला चरण ही तय करेगा तेज, तेजस्वी और नीतीश के दो डिप्टी की किस्मत !

November 3, 2025
cultural program

राष्ट्रीय रंगशाला शिविर नई दिल्ली में सांस्कृतिक कार्यक्रम में उत्तराखण्ड के झांकी के कलाकारों को मिला द्वितीय पुरस्कार

January 23, 2025
पहल टाइम्स

पहल टाइम्स का संचालन पहल मीडिया ग्रुप्स के द्वारा किया जा रहा है. पहल टाइम्स का प्रयास समाज के लिए उपयोगी खबरों के प्रसार का रहा है. पहल गुप्स के समूह संपादक शूरबीर सिंह नेगी है.

Learn more

पहल टाइम्स कार्यालय

प्रधान संपादकः- शूरवीर सिंह नेगी

9-सी, मोहम्मदपुर, आरके पुरम नई दिल्ली

फोन नं-  +91 11 46678331

मोबाइल- + 91 9910877052

ईमेल- pahaltimes@gmail.com

Categories

  • Uncategorized
  • खाना खजाना
  • खेल
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • दिल्ली
  • धर्म
  • फैशन
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • विश्व
  • व्यापार
  • साक्षात्कार
  • सामाजिक कार्य
  • स्वास्थ्य

Recent Posts

  • दिल्लीवालों को सस्ती बिजली पाने को हर साल कराना होगा रजिस्ट्रेशन! चूके तो बंद होगी सुविधा
  • 19वीं सदी के बाद सबसे ताकतवर अल-नीनो, 2026-27 में टूटेंगे तापमान के रिकॉर्ड
  • FD जैसी पोस्ट ऑफिस की इस स्कीम में लगाएं पैसा, मिलेगा तगड़ा मुनाफा!

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.

  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.