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फॉर्म 6 का राज़, बदलाव किसने किया और किसके आदेश पर? चुनाव आयोग की शक्ति पर सुप्रीम सवाल, जानिए फॉर्म 6, 7 और 8 का पूरा सच !

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
October 6, 2026
in राष्ट्रीय, विशेष
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प्रकाश मेहरा


नई दिल्ली: भारत में मतदाता सूची में नाम जुड़वाने, हटाने या उसमें सुधार कराने की प्रक्रिया को लेकर आम मतदाताओं के लिए फॉर्म 6, फॉर्म 7 और फॉर्म 8 बेहद महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इन दिनों फॉर्म 6 से जुड़े एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र और ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में किए गए बदलाव को लेकर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

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सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग वैधानिक नियमों में बदलाव किए बिना फॉर्म 6 की ऑनलाइन प्रक्रिया में नई अनिवार्य जानकारी जोड़ सकता है ? और यदि ऑनलाइन प्रक्रिया में बदलाव किया गया, तो उसे किसने मंजूरी दी?

मामला अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है और अदालत ने रिकॉर्ड मंगाकर यह जानने की दिशा में कदम बढ़ाया है कि विवादित बदलाव आखिर किस स्तर पर और किसकी अनुमति से किया गया।

क्या है फॉर्म 6 ?

फॉर्म 6 भारत में पहली बार मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला वैधानिक आवेदन है। इसके माध्यम से योग्य भारतीय नागरिक अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए आवेदन करता है। इसमें आवेदक का नाम, जन्मतिथि, पता और अन्य आवश्यक जानकारी ली जाती है।

यह प्रक्रिया Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित है। भारत में अब वर्ष में चार क्वॉलिफाइंग डेट 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर के आधार पर 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले नागरिक मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं।

एक महत्वपूर्ण उदाहरण

मान लीजिए किसी व्यक्ति की उम्र 15 फरवरी 2026 को 18 वर्ष पूरी होती है। 1 जनवरी 2026 को वह 18 वर्ष का नहीं था, लेकिन 1 अप्रैल 2026 तक उसकी उम्र 18 वर्ष हो चुकी होगी। ऐसे में उसे जनवरी 2027 तक इंतजार करने की जरूरत नहीं होगी। 1 अप्रैल 2026 उसकी पहली लागू क्वॉलिफाइंग डेट होगी।

विवाद की शुरुआत कहां से हुई ?

विवाद उस समय सामने आया जब ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया में SIR यानी Special Intensive Revision से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र/सेक्शन दिखाई दिया। रिपोर्टों के मुताबिक इसमें आवेदक को तीन विकल्पों में से एक चुनना था-

  • क्या आवेदक का नाम पिछली SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची में था?
  • क्या आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पुरानी मतदाता सूची में था?
  • क्या आवेदक, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पुरानी मतदाता सूची में नहीं था?

इसके बाद कुछ मामलों में पुराने मतदाता रिकॉर्ड से संबंधित अतिरिक्त जानकारी मांगी जा सकती थी, जैसे नाम, संबंध, EPIC नंबर, राज्य, जिला, विधानसभा क्षेत्र, पार्ट नंबर और क्रम संख्या।

यहीं से विवाद ने जन्म लिया।

पहली बार के मतदाताओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सवाल ?

18 वर्ष की उम्र में पहली बार मतदाता बनने वाला व्यक्ति पुरानी SIR के समय स्वयं मतदाता नहीं रहा होगा। ऐसे में उससे उसके माता-पिता या दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड की जानकारी मांगना एक अलग तरह की सत्यापन प्रक्रिया बन जाती है।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पुरानी मतदाता सूची में माता-पिता या दादा-दादी का नाम नहीं होना अपने आप में किसी व्यक्ति को वर्तमान में मतदाता बनने से अयोग्य नहीं बनाता।

आखिर फॉर्म 6 में बदलाव किसने किया ?

यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम प्रश्न है। चुनाव आयोग का कहना है कि वैधानिक फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया , बल्कि SIR के दौरान एक अलग घोषणा-पत्र/एनेक्सर जोड़ा गया था।

दूसरी ओर, रिपोर्ट किए गए आंतरिक रिकॉर्ड में चुनाव आयुक्तों की ओर से इस बात पर आपत्ति दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई कि यदि आवेदन प्रक्रिया में वैधानिक फॉर्म से संबंधित नई शर्त या जानकारी जोड़ी जाती है, तो इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि ऑनलाइन पोर्टल पर बदलाव किस व्यक्ति या प्राधिकरण की मंजूरी से लागू हुआ , यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

क्या चुनाव आयोग को फॉर्म 6 बदलने का अधिकार है ?

यहां वैधानिक अधिकार और प्रशासनिक प्रक्रिया के बीच अंतर समझना जरूरी है। Representation of the People Act, 1950 की धारा 28 के तहत मतदाता पंजीकरण से जुड़े नियम बनाने की शक्ति केंद्र सरकार के पास है और यह प्रक्रिया चुनाव आयोग से परामर्श के साथ होती है।

इसलिए यदि वैधानिक फॉर्म या उसके नियमों में औपचारिक बदलाव करना हो तो उसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और अधिसूचना जरूरी होती है।

इसी संदर्भ में 2021 के चुनाव कानून में संशोधन के बाद 17 जून 2022 को संबंधित नियमों और फॉर्म 6 में औपचारिक संशोधन अधिसूचित किए गए थे।

यही वजह है कि वर्तमान विवाद में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि “क्या ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में नया अनिवार्य सेक्शन जोड़ना केवल प्रशासनिक व्यवस्था थी या प्रभावी रूप से वैधानिक फॉर्म में बदलाव ? इसका अंतिम निर्धारण अभी अदालत के समक्ष विचाराधीन है।

चुनाव आयुक्तों की आपत्ति से बढ़ा विवाद

रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई 2026 को यह आपत्ति दर्ज की थी कि वैधानिक फॉर्म 6 और 8 में केवल SIR के आदेश या दिशा-निर्देश के माध्यम से बदलाव नहीं किया जा सकता और इसके लिए नियमों में औपचारिक संशोधन की जरूरत होगी।

इसके बाद 19 मई 2026 को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई। 13 अगस्त 2026 को संधू की ओर से कथित तौर पर अनधिकृत या अवैध बदलाव हटाने और पहली बार के मतदाताओं को अनावश्यक परेशानी से बचाने की चिंता भी सामने आई।

हालांकि, इन घटनाक्रमों के आधार पर किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आपराधिक या कानूनी जिम्मेदारी तय नहीं हुई है। संबंधित आरोप और प्रक्रियात्मक सवाल अभी न्यायिक विचार के अधीन हैं।

क्या सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 में बदलाव को मंजूरी दी थी ?

यह विवाद का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न बन गया है।चुनाव आयोग ने 26 सितंबर 2026 के अपने बयान में बिहार में SIR से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि SIR के दौरान इस्तेमाल किए गए घोषणा-पत्र को अदालत ने बरकरार रखा है।

लेकिन बाद में 5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने किसी संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अदालत रिकॉर्ड देखना चाहती है और यह पता लगाना चाहती है कि फॉर्म में बदलाव किसने किया।

इसका अर्थ यह है कि फिलहाल अदालत ने यह अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है कि विवादित घोषणा-पत्र निश्चित रूप से गैर-कानूनी है। अदालत का ध्यान इस समय बदलाव की प्रक्रिया, अधिकार और उसकी मंजूरी पर है।

क्या मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे आरोप साबित हो चुके हैं?

इस पूरे विवाद में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का नाम भी राजनीतिक और कानूनी बहस के केंद्र में आया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त पर फॉर्म 6 में कथित तौर पर एकतरफा और गैर-कानूनी बदलाव करने के आरोप लगाए।

लेकिन यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक आरोप और न्यायिक निष्कर्ष अलग-अलग चीजें हैं। अब तक अदालत ने यह न्यायिक निष्कर्ष नहीं दिया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने व्यक्तिगत रूप से इस बदलाव का आदेश दिया था।

एक संबंधित याचिका में चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नोटिस जारी किया है, लेकिन अंतरिम तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज पर रोक नहीं लगाई है।

5 अक्टूबर की सुनवाई क्यों महत्वपूर्ण है ?

5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने विवाद को एक नया कानूनी आयाम दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है और रिकॉर्ड देखकर यह पता लगाया जाएगा कि इसमें बदलाव किसने किया।

अब अदालत के सामने मूल सवाल यह है क्या यह वास्तव में फॉर्म 6 में संशोधन था, या SIR के दौरान इस्तेमाल किया गया एक अलग प्रशासनिक घोषणा-पत्र ? इसी अंतर से यह तय होगा कि किस प्रकार की कानूनी प्रक्रिया लागू होनी चाहिए थी।

क्या इससे नए मतदाताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ा?

विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं से जुड़ा है। आलोचना यह है कि यदि किसी युवा के माता-पिता या दादा-दादी का नाम पुरानी मतदाता सूची में नहीं था, तो उसे अतिरिक्त जानकारी या सत्यापन की प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि *पुरानी मतदाता सूची में माता-पिता या दादा-दादी का नाम होना मतदाता बनने की अनिवार्य कानूनी शर्त है।*

ऑनलाइन प्रक्रिया में तीसरा विकल्प भी मौजूद था, जिसमें यह बताया जा सकता था कि आवेदक या उसके परिवार के संबंधित सदस्यों का नाम पुरानी सूची में नहीं था।

इसलिए इस पूरे विवाद को समझते समय ‘अतिरिक्त जानकारी मांगना’ और ‘मतदाता बनने की कानूनी पात्रता की अनिवार्य शर्त’इन दोनों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

पूरा विवाद कब क्या हुआ ?

24 जून 2025: चुनाव आयोग ने बिहार में SIR कराने का आदेश दिया। नए नाम जोड़ने वाले आवेदनों के साथ अलग घोषणा-पत्र/एनेक्सर डी का प्रावधान सामने आया।

16 मई 2026: चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने वैधानिक फॉर्म 6 और 8 में SIR आदेश या दिशा-निर्देश के जरिए बदलाव किए जाने पर आपत्ति दर्ज की।

19 मई 2026: चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने जोशी की आपत्ति से सहमति जताई।

27 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को बरकरार रखा, लेकिन आयोग की शक्तियों को असीमित नहीं माना।

13 अगस्त 2026: संधू की ओर से कथित अनधिकृत/अवैध बदलाव हटाने और नए मतदाताओं को परेशान किए जाने से बचाने की चिंता सामने आई।

23 सितंबर 2026: द इंडियन एक्सप्रेस ने चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से संबंधित अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की।

26 सितंबर 2026: चुनाव आयोग ने कहा कि SIR से संबंधित घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है और सामान्य परिस्थितियों में वैधानिक फॉर्म लागू होते हैं।

5 अक्टूबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने किसी संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है और रिकॉर्ड मंगाकर यह जांचने की बात कही कि फॉर्म में बदलाव किसने किया।

अब समझिए फॉर्म 6, 7 और 8 का अंतर

मतदाता सूची से संबंधित तीनों प्रमुख फॉर्म का उद्देश्य अलग-अलग है।

फॉर्म 6 नया मतदाता बनने के लिए

यदि कोई व्यक्ति पहली बार मतदाता के रूप में अपना नाम दर्ज कराना चाहता है और पात्रता की शर्तें पूरी करता है, तो फॉर्म 6 इस्तेमाल किया जाता है।

पहली बार मतदाता के रूप में पंजीकरण।
मतदाता सूची में नया नाम शामिल कराना।

फॉर्म 7 — नाम हटाने या आपत्ति के लिए

फॉर्म 7 का इस्तेमाल किसी मतदाता का नाम हटाने का अनुरोध करने या मतदाता सूची में किसी व्यक्ति के नाम को शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है।

इसके प्रमुख आधार हो सकते हैं !

  • मतदाता की मृत्यु हो चुकी है।
  • व्यक्ति पात्रता की आयु पूरी नहीं करता।
  • व्यक्ति उस पते पर अब नहीं रहता।
  • व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज है।
  • व्यक्ति नागरिकता संबंधी आवश्यक शर्त पूरी नहीं करता।

व्यक्ति अपना नाम स्वयं हटाने के लिए भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत फॉर्म 7 का उपयोग कर सकता है।

फॉर्म 8 मौजूदा मतदाता की जानकारी अपडेट करने के लिए

फॉर्म 8 पहले से पंजीकृत मतदाता के लिए है। इसके प्रमुख उपयोग

1. निवास स्थान बदलना

यदि मतदाता दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में चला गया है तो अपने पंजीकरण को नए पते पर स्थानांतरित कराने के लिए फॉर्म 8 का उपयोग किया जाता है।

2. जानकारी में सुधार

मतदाता सूची या EPIC में दर्ज जानकारी गलत होने पर उसमें सुधार कराया जा सकता है।

3. नया EPIC प्राप्त करना

वोटर आईडी कार्ड खो जाने, खराब होने या संबंधित स्थिति में नया EPIC प्राप्त करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत फॉर्म 8 का इस्तेमाल किया जा सकता है।

4. दिव्यांगता संबंधी जानकारी

मतदाता रिकॉर्ड में दिव्यांगता संबंधी जानकारी दर्ज कराने के लिए भी फॉर्म 8 का उपयोग किया जाता है।

एक आसान उदाहरण से समझिए

मान लीजिए कोई व्यक्ति पहले से पटना का मतदाता है और अब स्थायी रूप से नोएडा चला गया है। उसे नए मतदाता के रूप में फॉर्म 6 भरने की जरूरत नहीं है। उसे अपने मौजूदा मतदाता पंजीकरण को नए पते पर स्थानांतरित कराने के लिए फॉर्म 8 के माध्यम से आवेदन करना चाहिए।

इसी तरह, यदि किसी मतदाता की जानकारी में गलती है तो वह फॉर्म 8 का उपयोग कर सकता है।

वहीं, यदि किसी व्यक्ति के नाम को मतदाता सूची से हटाने या किसी नाम पर आपत्ति करने की जरूरत है, तो फॉर्म 7 प्रासंगिक है।

असली सवाल अभी बाकी

फॉर्म 6 विवाद केवल एक ऑनलाइन फॉर्म में कुछ अतिरिक्त सवाल जोड़े जाने का मामला नहीं है। इसके केंद्र में चुनाव आयोग की प्रशासनिक शक्तियां, वैधानिक नियम, संस्थागत निर्णय प्रक्रिया और मतदाता पंजीकरण की पारदर्शिता जैसे बड़े सवाल हैं।

सबसे अहम प्रश्न अब भी यही हैं

  • क्या विवादित घोषणा-पत्र वैधानिक फॉर्म 6 का हिस्सा था या अलग प्रशासनिक दस्तावेज ?
  • यदि यह फॉर्म की प्रक्रिया में प्रभावी बदलाव था, तो इसकी कानूनी मंजूरी किसने दी ?
  • क्या ऐसा बदलाव नियमों में औपचारिक संशोधन किए बिना किया जा सकता था ?
  • और क्या इससे पहली बार मतदाता बनने वाले योग्य नागरिकों पर अनावश्यक अतिरिक्त बोझ पड़ा?

इन सवालों का अंतिम जवाब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखे जाने वाले रिकॉर्ड और आगे की न्यायिक सुनवाई से स्पष्ट होगा।

फिलहाल इतना साफ है कि “फॉर्म 6 में बदलाव किसने किया और किस अधिकार के तहत किया- यह सवाल अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिकॉर्ड मंगाए जाने के बाद इस विवाद के कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।”

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