नई दिल्ली: नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। भारत इस वर्ष ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब वैश्विक राजनीति, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया की स्थिति लगातार बदल रही है। सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भागीदारी की पुष्टि ने इसकी अहमियत और बढ़ा दी है। चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को भारत आएंगे। आइये विस्तार में एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से समझते हैं।
दिल्ली में सुरक्षा के व्यापक इंतज़ाम
सम्मेलन को देखते हुए दिल्ली में सुरक्षा के व्यापक इंतज़ाम किए गए हैं। तुगलक रोड इलाके में बड़ी संख्या में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और आयोजन स्थल के आसपास बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की गई है। करीब 15 हजार पुलिसकर्मियों तथा अर्धसैनिक बलों की कंपनियों की तैनाती की तैयारी की गई है। उद्देश्य यह है कि विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधिमंडलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ आम लोगों को भी कम से कम परेशानी हो।
भारत पहले भी 2012, 2016 और 2021 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर चुका है। इस वर्ष भारत की अध्यक्षता ऐसे दौर में है, जब ब्रिक्स का दायरा पहले की तुलना में काफी बड़ा हो चुका है। भारत की अध्यक्षता का आधिकारिक फोकस Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability यानी लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास पर है।
क्या है ब्रिक्स ?
ब्रिक्स मूल रूप से दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर लाने वाला समूह है। BRICS नाम इसके शुरुआती सदस्य देशों—Brazil, Russia, India, China और South Africa—के अंग्रेज़ी नामों के पहले अक्षरों से बना है। आज इसका स्वरूप काफी बदल चुका है। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार वर्तमान में ब्रिक्स में 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं: ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ़्रीका,मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, सऊदी अरब हैं।
मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात 1 जनवरी 2024 से ब्रिक्स के विस्तार का हिस्सा बने, जबकि इंडोनेशिया जनवरी 2025 में पूर्ण सदस्य बना। इसके अलावा ब्रिक्स ने पार्टनर देशों की व्यवस्था भी विकसित की है। बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कज़ाखस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा और उज़्बेकिस्तान समेत कई देशों को पार्टनर देश का दर्जा दिया गया है।
इस विस्तार से साफ है कि “ब्रिक्स अब केवल पांच देशों का आर्थिक समूह नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्लोबल साउथ की बढ़ती राजनीतिक और आर्थिक आवाज़ का एक महत्वपूर्ण मंच बनता जा रहा है।”
ब्रिक्स नाम कैसे पड़ा ?
BRICS शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले ब्रिटिश अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने 2001 में गोल्डमैन सैक्स के एक शोधपत्र में किया था। उस समय इसमें दक्षिण अफ़्रीका शामिल नहीं था, इसलिए इसे BRIC कहा जाता था। ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन के बीच 2006 में औपचारिक स्तर पर सहयोग की शुरुआत हुई। 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला BRIC शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ।
2010 में दक्षिण अफ़्रीका को समूह में शामिल करने का फैसला हुआ और इसके बाद BRIC का नाम BRICS हो गया। दक्षिण अफ़्रीका ने 2011 में सान्या, चीन में आयोजित तीसरे शिखर सम्मेलन में पहली बार भाग लिया।
BRICS की ताकत कितनी बड़ी है ?
ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत इसकी जनसंख्या और आर्थिक क्षमता है। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, 11 सदस्य देशों की आबादी दुनिया की कुल आबादी का करीब 49.5 प्रतिशत है। वैश्विक GDP में इनकी हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार में करीब 26 प्रतिशत है। यही वजह है कि “ब्रिक्स को अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बदलाव की संभावनाओं वाले समूह के रूप में देखा जाता है।”
हालांकि इसके सदस्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाएँ, विदेश नीति और रणनीतिक प्राथमिकताएँ एक जैसी नहीं हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव तथा अमेरिका के साथ चीन के व्यापार और रणनीतिक मतभेद भी ब्रिक्स की आंतरिक जटिलताओं को दिखाते हैं। इसलिए ब्रिक्स की असली चुनौती यही है कि इतने अलग-अलग हितों वाले देशों को साझा आर्थिक और कूटनीतिक एजेंडे पर कितनी दूर तक साथ लाया जा सकता है।
ब्रिक्स और डोनाल्ड ट्रंप की चिंता
ब्रिक्स के बढ़ते प्रभाव को अमेरिका भी गंभीरता से देखता है। 2025 के ब्रिक्स सम्मेलन के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन देशों के खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ की चेतावनी दी थी, जो अमेरिका-विरोधी नीतियों का समर्थन करते हैं। ट्रंप का रुख यह संकेत देता है कि वॉशिंगटन ब्रिक्स के विस्तार और डॉलर-केंद्रित वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली संभावनाओं को हल्के में नहीं ले रहा।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि ब्रिक्स निकट भविष्य में डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का विकल्प बन जाएगा। लेकिन यह जरूर है कि ब्रिक्स के विस्तार से वैश्विक आर्थिक शक्ति का संतुलन पहले की तुलना में अधिक बहुध्रुवीय हो रहा है।
नई दिल्ली सम्मेलन क्यों महत्वपूर्ण है ?
इस बार के सम्मेलन की अहमियत कई स्तरों पर है। पहला, भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। दूसरा, समूह का विस्तार हो चुका है और अब इसके भीतर दुनिया की बड़ी आबादी तथा महत्वपूर्ण ऊर्जा, विनिर्माण और कच्चे माल की अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं। तीसरा, सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम एशिया में तनाव, ऊर्जा सुरक्षा, तेल की कीमतों में अस्थिरता, वैश्विक व्यापार में बढ़ता संरक्षणवाद और भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसी चुनौतियाँ दुनिया के सामने हैं। ऐसे में भारत के सामने चुनौती केवल सम्मेलन की मेजबानी करना नहीं, बल्कि ब्रिक्स के भीतर सहमति बनाने और भारत के राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने की भी है।
भारत के लिए ब्रिक्स केवल सम्मेलन नहीं, रणनीतिक अवसर है: प्रकाश मेहरा
प्रकाश मेहरा का मानना है कि “नई दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी रणनीतिक भूमिका को और मजबूत करने का अवसर है। ब्रिक्स का विस्तार जितना बड़ा हुआ है, उतनी ही उसकी चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। भारत को एक तरफ चीन और रूस जैसे शक्तिशाली देशों के साथ मंच साझा करना है, तो दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक तथा आर्थिक संबंधों को भी संतुलित रखना है।”
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी रणनीतिक स्वायत्तता है। नई दिल्ली न तो ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनने देना चाहती है और न ही इसे केवल चीन-केंद्रित मंच बनने देना उसके हित में है। भारत के लिए बेहतर रास्ता यह है कि ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ की आवाज़, आर्थिक सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी साझेदारी और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के मंच के रूप में मजबूत किया जाए।
भारत और चीन के बीच मतभेद गंभीर
इस लिहाज से शी जिनपिंग की भारत यात्रा भी महत्वपूर्ण है। भारत और चीन के बीच मतभेद गंभीर हैं, लेकिन बहुपक्षीय मंचों पर संवाद के रास्ते खुले रखना भारत की कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है। ब्रिक्स इस संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण मंच उपलब्ध कराता है।
प्रकाश मेहरा के अनुसार, आने वाले वर्षों में ब्रिक्स की असली परीक्षा यह नहीं होगी कि इसमें कितने देश शामिल होते हैं, बल्कि यह होगी कि इतने अलग-अलग हितों वाले देश वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति के बड़े सवालों पर कितनी प्रभावी साझा आवाज़ बना पाते हैं।
भारत के लिए यह सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि नई दिल्ली ब्रिक्स के विस्तार को भारत की आर्थिक ताकत, ग्लोबल साउथ में उसकी स्वीकार्यता और रणनीतिक स्वायत्तता के साथ जोड़ने में सफल होती है, तो ब्रिक्स भारत की विदेश नीति का केवल एक मंच नहीं रहेगा—बल्कि 21वीं सदी की बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना में भारत की भूमिका को आकार देने का एक महत्वपूर्ण औजार बन सकता है।
दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था
ब्रिक्स अब वह पुराना BRIC नहीं है, जिसमें केवल चार उभरती अर्थव्यवस्थाएँ थीं। यह एक विस्तृत और प्रभावशाली समूह बन चुका है, जिसमें दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा शामिल है। नई दिल्ली में होने वाला 18वां शिखर सम्मेलन यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है कि ब्रिक्स आगे चलकर केवल आर्थिक सहयोग का मंच रहेगा या वैश्विक शासन व्यवस्था में एक प्रभावशाली शक्ति-केंद्र के रूप में भी उभरेगा।
और इस पूरे घटनाक्रम में भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है— क्योंकि इस समय ब्रिक्स की मेजबानी भारत कर रहा है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत अपनी जगह खुद तय कर रहा है।







