डॉ. लोकेन्द्र सिंह
नई दिल्ली। सोशल मीडिया के इस दौर में एक बात सबको साफ़ समझ आ गई है कि पत्रकारिता में संपादन का बहुत महत्व है। पत्रकारिता केवल रिपोर्टिंग नहीं है। यह सत्य है कि पत्रकारिता में जानकारी एकत्र करके लाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है यह तय करना कि उस जानकारी को किस प्रकार से प्रसारित करना है—या प्रसारित करना भी है या नहीं? संपादन की अच्छी समझ होने पर ही हम उस जानकारी को लोकोपयोगी बना सकते हैं।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारिता की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बहुत हद तक उसके संपादन पक्ष पर टिकी होती है। इसलिए संपादन-कला का कौशल सबको सीखना चाहिए। सूचनाओं के प्रचार-प्रसार में शामिल सभी लोगों को संपादन की बुनियादी बातें पता होनी चाहिए।
मीडिया के आचार्य रहे वरिष्ठ लेखक एवं बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन-कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’ इन बुनियादी बातों को सिखाने में बहुत उपयोगी साबित होगी। पुस्तक के शीर्षक और उसकी विषय-वस्तु को देखकर यह अनुमान न लगाएं कि यह केवल पत्रकारिता के विद्यार्थियों के उपयोग की पुस्तक है। यह उन सबके लिए उपयोगी है, जो सोशल मीडिया में लिख-पढ़ रहे हैं।
प्रो. भगत ने अपने अनुभव का निचोड़ इस पुस्तक में उतार दिया है। उन्होंने संपादन को एक जीवंत शिल्प, सौंदर्य और प्रबंधन कौशल के रूप में प्रस्तुत किया है। पुस्तक के आरंभ में लेखक ने संपादन के अर्थ और अवधारणा को परिभाषित किया है ताकि कोई भी संपादन कला को केवल सामग्री की काट-छाँट तक सीमित करके न देखे। सामान्य तौर पर संपादन का अर्थ यह लगाया जाता है कि किसी समाचार या पाठ्य सामग्री को छोटा करने के साथ-साथ उसे चुस्त-दुरुस्त करना। संपादन का अर्थ अनेक अवसरों पर सामग्री का विस्तार करना भी होता है। सामग्री में तथ्यों की कोई कमी दिखे तो उसे जोड़ना भी संपादन है।
लेखक ने संपादन कला को और सरल ढंग से समझाने के लिए बताया है कि जिस प्रकार माली बगीचे को सजाता है और मूर्तिकार अनगढ़ पत्थर को तराशकर सजीव बना देता है, उसी प्रकार संपादक कच्ची सामग्री को परिमार्जित कर उसे पठनीय और संप्रेषणीय बनाता है। इसमें केवल सामग्री का संक्षेपण ही नहीं, बल्कि आवश्यकतानुसार ‘वैल्यू एडिशन’ (पल्लवन) और संदर्भ जोड़ना भी शामिल है।
लेखक प्रो. भगत ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि पुस्तक संपादन के सैद्धांतिक पक्ष से परिचय कराने के साथ-साथ व्यावहारिक कौशल भी सिखाए। कहना होगा कि यह पुस्तक पाठकों को सीधे न्यूजरूम की कार्यप्रणाली से जोड़ती है। इसलिए पाठकों को पत्र-पत्रिकाओं के आंतरिक कार्यालयीन स्वरूप, संपादकीय कक्ष की संरचना, पदानुक्रम और कार्य-प्रणाली का सूक्ष्म विवरण मिलता है। एक अध्याय में आकर्षक शीर्षक लिखने के सूत्र भी दिए गए हैं।
आपने अच्छी कहानी या समाचार लिखा है लेकिन उसके शीर्षक में दम नहीं है, तब आपको अपेक्षित संख्या में पाठक नहीं मिलेंगे। पाठकों को आमंत्रित करने का काम शीर्षक ही करता है। इसलिए इस अध्याय में हम शीर्षक की आत्मा, उसके प्रकार, तकनीक और सौंदर्य को जानने के साथ ही आकर्षक एवं तथ्यपरक शीर्षक गढ़ने की कला सीखते हैं। पुस्तक में संपादन के साथ-साथ सामग्री के प्रस्तुतिकरण, ले-आउट एवं डिजाइन पर उपयोगी सैद्धांतिक सामग्री दी गई है।
भाषा-शैली और दृष्टि
लेखक प्रो. भगत की लेखन-शैली की सबसे बड़ी खूबी उनकी प्रांजल, प्रवाहपूर्ण और मानक हिंदी है। वे जटिल तकनीकी अवधारणाओं को भी सहज और ग्राह्य उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट करते हैं। पुस्तक में सैद्धांतिक परिभाषाओं के साथ-साथ व्यावहारिक सुझावों का जो संतुलन साधा गया है, वह लेखक के अकादमिक और व्यावहारिक अनुभव की गहरी छाप छोड़ता है। एक और बहुत महत्व की बात है—लेखक ने विदेशी विद्वानों की अपेक्षा भारत के मूर्धन्य पत्रकारों एवं लेखकों के दृष्टिकोण से संपादन कला को परिभाषित किया है। सामान्य तौर पर लेखक किसी भी विषय के सैद्धांतिक पक्ष को परिभाषित करने के लिए विदेशी विद्वानों को उद्धृत करते हैं।
हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में संपादन पर पुस्तकों का अभाव नहीं है, परंतु ऐसी कृतियाँ कम हैं जो संपादकीय डेस्क के दैनिक दबाव, समय-सीमा (डेडलाइन), पुनर्लेखन की चुनौतियों और विजुअल एस्थेटिक्स को एक साथ समाहित करती हों। यह पुस्तक इस शून्यता को प्रभावी ढंग से भरती है। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रो. अरुण कुमार भगत की पुस्तक ‘संपादन कला : सिद्धांत से व्यवहार तक’ पत्रकारिता एवं जनसंचार के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, मीडिया प्राध्यापकों और मुख्यधारा की पत्रकारिता में कार्यरत उप-संपादकों के लिए एक उपयोगी एवं मार्गदर्शक पुस्तक सिद्ध होगी।
- पुस्तक : संपादन कला : सिद्धांत से व्यवहार तक
- लेखक: अरुण कुमार भगत
- प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
- पृष्ठ संख्या: 160
- मूल्य: ₹325
समीक्षक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।







