नई दिल्ली। चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर एक महत्वपूर्ण आंतरिक विवाद सामने आया है। The Indian Express की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम-से-कम 14 मौकों पर आयोग के फैसलों या आदेशों को लेकर लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, नए मतदाताओं के Form-6 में बदलाव तथा मतदाता डेटा तक अधिकारियों की पहुंच जैसे संवेदनशील मुद्दों से था। आइये इस पूरे मामले को एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से समझते हैं।
इन दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की एक खास बात यह रही कि कई मामलों में उनकी टिप्पणियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गईं। Indian Express ने दावा किया है कि उसने संबंधित आंतरिक पत्राचार और दस्तावेज देखे तथा दिल्ली, कोलकाता, गोवा और मुंबई में अधिकारियों से बातचीत के आधार पर घटनाक्रम को तैयार किया।
SIR के बीच उठे सवाल
पूरे विवाद में Special Intensive Revision यानी SIR है। यह प्रक्रिया जून 2025 में बिहार से शुरू हुई और बाद में दूसरे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक विस्तारित हुई। Indian Express के अनुसार, SIR के दौरान 30 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नामों को लेकर प्रक्रिया चली, जिससे यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया कि किसका नाम मतदाता सूची में रहेगा और किसका नहीं।
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां केवल SIR की राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं थीं। उनका संबंध चुनावी प्रक्रिया के प्रशासनिक और तकनीकी ढांचे से भी था।
1. Form-6 में बदलाव पर कानूनी सवाल
सबसे महत्वपूर्ण विवादों में से एक Form-6 को लेकर सामने आया। Form-6 वह वैधानिक फॉर्म है जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करता है। Indian Express की एक अलग जांच के अनुसार, जुलाई 2026 में इस फॉर्म में SIR से जुड़ा एक नया सवाल दिखाई देने लगा। नए आवेदक से पूछा जा रहा था कि क्या उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची में था। रिपोर्ट के मुताबिक, यह सवाल अनिवार्य के रूप में चिन्हित नहीं था, लेकिन इसका जवाब दिए बिना आवेदन आगे नहीं बढ़ रहा था।
मई में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज की थी। उनका तर्क था कि Form-6 वैधानिक नियमों में निर्धारित फॉर्म है और इसे केवल SIR के आदेश या दिशा-निर्देश के माध्यम से नहीं बदला जा सकता। इसके लिए संबंधित नियमों में संशोधन की जरूरत होगी।
रिपोर्ट के अनुसार, 19 मई को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी जोशी की आपत्ति से सहमति जताई। इसके बावजूद बाद में Form-6 में नया सवाल दिखाई दिया। अगस्त में संधू ने इसे “unauthorised and illegal” बताते हुए तत्काल हटाने की मांग की। यहां मूल सवाल केवल एक अतिरिक्त कॉलम का नहीं है। मामला इस बात का है कि क्या वैधानिक रूप से निर्धारित चुनावी फॉर्म को नियमों में संशोधन किए बिना बदला जा सकता है?
2. मतदाता डेटा के केंद्रीकरण पर चिंता
दूसरा बड़ा मुद्दा चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़ा है। परंपरागत रूप से मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन की जिम्मेदारी स्थानीय स्तर पर निर्धारित Electoral Registration Officers यानी EROs की होती है। यह व्यवस्था चुनावी सूची को विकेंद्रीकृत रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा मानी जाती रही है।
Indian Express के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मतदाता डेटाबेस के “gradual centralisation” को लेकर चिंता जताई और ऐसे ऑडिट की बात कही जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि मतदाता डेटाबेस में बदलाव करने की अनुमति केवल संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास हो।
अगस्त में संधू ने भी कहा कि “राज्य स्तर के अधिकारियों से यह शिकायतें आ रही हैं कि उन्हें ERONet तक “proper and complete access” नहीं मिल रहा। संधू ने यह सवाल भी उठाया कि चुनाव आयोग के IT विभाग के महानिदेशक के पास वैधानिक अधिकारियों की पहुंच सीमित करने का अधिकार किस आधार पर है।”
इसका महत्व क्या है ?
अगर किसी मतदाता का नाम जोड़ने, हटाने या बहाल करने का वैधानिक अधिकार किसी स्थानीय अधिकारी के पास है, लेकिन वह अधिकारी सॉफ्टवेयर के स्तर पर उस निर्णय को लागू ही नहीं कर सकता, तो कानूनी अधिकार और तकनीकी नियंत्रण के बीच अंतर पैदा हो सकता है।यही वह बिंदु है जिस पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने बार-बार सवाल उठाए।
3. ECINet बना विवाद का केंद्र
जनवरी 2026 में चुनाव आयोग ने ECINet लॉन्च किया। इसे चुनाव आयोग के विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म और सेवाओं को एकीकृत करने वाली तकनीकी व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
लेकिन Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद कुछ राज्य स्तरीय अधिकारियों की पहुंच को लेकर शिकायतें सामने आईं। दो चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर चिंता जताई कि कहीं तकनीकी केंद्रीकरण से उन अधिकारियों की वैधानिक भूमिका कमजोर तो नहीं हो रही जो मतदाता सूची तैयार करने के लिए कानूनन जिम्मेदार हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस मुद्दे पर संधू और जोशी ने अलग-अलग समय पर अपने विचार दर्ज किए और कुछ पत्रों में मुख्य चुनाव आयुक्त को भी कॉपी किया। मामला इतना गंभीर हुआ कि दोनों ने कैबिनेट सचिव को भी अलग-अलग पत्र लिखे।
4. पश्चिम बंगाल में 16 लाख अपीलों का सवाल
पश्चिम बंगाल SIR को लेकर भी एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया। Indian Express के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बड़ी संख्या में मतदाताओं से संबंधित मामलों की सुनवाई न्यायिक अधिकारियों के माध्यम से हुई। बाद में हटाए गए नामों के खिलाफ अपील की प्रक्रिया शुरू हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि ट्रिब्यूनल के सामने लगभग 38 लाख अपीलें लंबित थीं। इनमें लगभग 22.21 लाख अपीलें हटाए गए मतदाताओं की ओर से नाम बहाल कराने के लिए थीं, जबकि लगभग 16.10 लाख अपीलें ऐसे मतदाताओं के खिलाफ थीं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने शामिल किया था।
यहीं पर चुनाव आयुक्त संधू ने सवाल उठाया। उन्होंने अधिकारियों से पूछा कि इन अपीलों को चुनाव आयोग की ओर से दाखिल करने का अधिकार किसने दिया और इन्हें वास्तव में किसने दाखिल किया। रिपोर्ट के अनुसार, संधू ने यह भी कहा कि उन्हें, विवेक जोशी को और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इन अपीलों के आधार या प्रक्रिया के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी।
5. गोवा में 97 मतदाताओं का मामला
इस विवाद का एक व्यावहारिक उदाहरण गोवा से सामने आया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद SIR में “logical discrepancies” के कारण चिन्हित मतदाताओं को दस्तावेज पेश करने और अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया था। Indian Express के मुताबिक, गोवा में EROs ने दस्तावेजों की जांच के बाद 97 मतदाताओं को अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने के योग्य पाया।
लेकिन समस्या यह थी कि संबंधित सॉफ्टवेयर में उन मतदाताओं के पहले हटाए गए नामों को वापस दर्ज करने के लिए आवश्यक विकल्प उपलब्ध नहीं था। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने 11 से 17 फरवरी के बीच इस तकनीकी सुविधा के लिए आठ बार पत्र/ईमेल भेजे। रिपोर्ट के मुताबिक, सुविधा समय पर उपलब्ध नहीं हुई और वे 97 नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए।
यह संख्या छोटी हो सकती है, लेकिन इस घटना ने एक बड़ा प्रशासनिक सवाल खड़ा किया: क्या किसी नागरिक का कानूनी रूप से मतदाता बनने का अधिकार केवल इसलिए प्रभावित हो सकता है क्योंकि सरकारी सॉफ्टवेयर में संबंधित अधिकारी के पास निर्णय दर्ज करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था?
6. 14 आपत्तियों का संवैधानिक पहलू
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू चुनाव आयोग की संवैधानिक संरचना है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त होते हैं। 2023 के कानून की धारा 18 के अनुसार आयोग का काम जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। यदि सदस्यों के बीच मतभेद हो तो मामला बहुमत के आधार पर तय किया जा सकता है। इसी धारा में आयोग की कार्यप्रणाली और काम के बंटवारे से जुड़े प्रावधान भी हैं।
Indian Express के मुताबिक, संधू और जोशी ने अपने पत्रों में इसी व्यवस्था का हवाला देते हुए अधिकारियों को यह याद दिलाया कि आयोग के नाम से जारी होने वाले महत्वपूर्ण संचार के लिए आयोग की स्वीकृति जरूरी है। 16 अप्रैल को संधू और 24 अप्रैल को जोशी ने अलग-अलग टिप्पणियों में इस बात पर आपत्ति दर्ज की कि आयोग के नाम से कुछ संचार कथित तौर पर आयोग की आवश्यक मंजूरी के बिना जारी किए जा रहे थे।
7. क्या यह केवल मतभेद है या संस्थागत संकट ?
यहीं इस पूरी रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण विश्लेषण सामने आता है। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान में सदस्यों के बीच मतभेद होना अपने-आप में असंवैधानिक नहीं है। कानून स्वयं यह मानकर चलता है कि सदस्यों में मतभेद हो सकते हैं और ऐसे मामलों में बहुमत से निर्णय लिया जा सकता है। लेकिन इस मामले में विवाद का विषय सामान्य प्रशासनिक निर्णयों से आगे जाकर मतदाता सूची, नए मतदाताओं का पंजीकरण, नाम हटाना, नाम बहाल करना और चुनावी डेटा के तकनीकी नियंत्रण जैसे मुद्दों तक पहुंच गया है।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि दो चुनाव आयुक्त किसी फैसले से सहमत थे या नहीं। बड़ा प्रश्न यह है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी, वैधानिक अधिकारियों की भूमिका कितनी सुरक्षित रही और तकनीकी व्यवस्था ने कानून में निर्धारित जिम्मेदारियों को किस हद तक प्रभावित किया। Indian Express ने इसे चुनाव आयोग के भीतर अभूतपूर्व स्तर का मतभेद बताया है। यह उसका विश्लेषण है; उपलब्ध रिपोर्टिंग से यह अपने-आप साबित नहीं होता कि चुनावी प्रक्रिया में जानबूझकर हेरफेर हुआ।
8. चुनाव आयोग का क्या कहना है ?
इस पूरे मामले में चुनाव आयोग का पक्ष महत्वपूर्ण है। 24 सितंबर को एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने 14 आंतरिक टिप्पणियों के अस्तित्व, उनकी तारीख या सामग्री से इनकार नहीं किया, लेकिन इन्हें सामान्य आंतरिक निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया। आयोग का कहना था कि केवल कुछ चुनिंदा आंतरिक नोटों को सामने रखने से तस्वीर का एक हिस्सा दिखाई देता है, जबकि पिछले 10 महीनों में आयोग के फैसलों, निर्देशों और पहलों का एक बड़ा हिस्सा भी मौजूद है।
आयोग ने यह भी कहा कि पिछले 10 महीनों में लिए गए निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। यह बयान तीनों चुनाव आयुक्तों की ओर से जारी किया गया था। इसलिए रिपोर्ट से सामने आने वाली तस्वीर में दो स्तर हैं: एक तरफ दो चुनाव आयुक्तों के लिखित आपत्तियां दर्ज करने के दस्तावेज हैं। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि ये टिप्पणियां सामान्य संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा थीं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
सबसे बड़ा सवाल: वोटर लिस्ट का नियंत्रण किसके पास ?
पूरे विवाद को एक वाक्य में समझें तो मुद्दा केवल SIR नहीं है। मुद्दा है- मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने का अंतिम प्रशासनिक और तकनीकी नियंत्रण किस स्तर पर होना चाहिए ? कानून में जिम्मेदारी स्थानीय वैधानिक अधिकारियों को दी गई है। लेकिन मतदाता सूची अब बड़े पैमाने पर डिजिटल सिस्टम के माध्यम से संचालित होती है।
ऐसे में यदि स्थानीय अधिकारी के पास कानूनी अधिकार है लेकिन सॉफ्टवेयर तक उसकी पहुंच सीमित है, तो कानूनी अधिकार और वास्तविक तकनीकी क्षमता के बीच अंतर पैदा हो सकता है। यही कारण है कि ECINet और ERONet से जुड़े सवाल इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं।
Indian Express की जांच पर सामने आए तथ्य
Indian Express की जांच के आधार पर सामने आए तथ्य यह बताते हैं कि पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के भीतर SIR, Form-6, मतदाता डेटा के केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में अपीलों और गोवा में सॉफ्टवेयर की तकनीकी बाधाओं को लेकर गंभीर लिखित सवाल उठाए गए।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये सवाल आयोग के दो मौजूदा चुनाव आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने स्वयं रिकॉर्ड पर दर्ज किए। लेकिन दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने इन आंतरिक मतभेदों को निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा बताते हुए कहा है कि उसके फैसले सर्वसम्मति से हुए।
चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया
इसलिए फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर सबसे सटीक निष्कर्ष यह है कि चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया, मतदाता डेटा के तकनीकी नियंत्रण और SIR के प्रशासनिक संचालन को लेकर गंभीर संस्थागत प्रश्न सामने आए हैं। इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर संबंधित दस्तावेजों, आयोग के विस्तृत स्पष्टीकरण और जहां लागू हो वहां न्यायिक समीक्षा से ही स्पष्ट होगा।
यानी असली मुद्दा सिर्फ 14 आपत्तियां नहीं हैं- मुद्दा यह है कि भारत की मतदाता सूची को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक व्यवस्था में निर्णय, अधिकार और तकनीकी नियंत्रण के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जा रहा है।







