सतीश मुखिया
मथुरा: भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां पर बहुदलीय प्रणाली है जैसा कि हमने कल देखा कि बिहार विधानसभा से विधायक नितिन नवीन के इस्तीफा देने और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा दतिया विधानसभा, मध्य प्रदेश के विधायक की विधायकी रद्द होने के बाद में राज्यों में हुए उपचुनाव का कल परिणाम घोषित हुआ जिसके नतीजे अप्रत्याशित रहे जिसमें एक तरफ राजनीति का केंद्र बिहार पटना की विधानसभा बांकीपुर और मां पीतांबरा की धरती दतिया क्षेत्र मां पीतांबरा की धरती से अप्रत्याशित नतीजे सामने आये।

जन स्वराज पार्टी के उम्मीदवार प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा बिहार से भारी बहुमत से विजय हासिल की वहीं दूसरी तरफ भारत के दिल मध्य प्रदेश और मां पीतांबरा की धरती दतिया से कांग्रेस के उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने भाजपा के उम्मीदवार को हराकर एक बार फिर से कांग्रेस का वर्चस्व कायम किया और लोगों के जहन में यह सवाल छोड़ दिया कि जिस उम्मीदवार को हटाकर बीजेपी द्वारा नया उम्मीदवार लाकर प्रयोग किया गया था वह प्रयोग धरातल पर फेल हो गया जैसा की आप सभी लोग जानते होंगे कि इस सीट से भाजपा के छह बार से डॉ नरोत्तम मिश्रा विधायक थे जो पिछला विधानसभा चुनाव कांग्रेस प्रत्याशी से हार गए थे । उनके स्थान पर स्थानीय स्तर पर भारी विरोध के बावजूद भाजपा ने नए प्रत्याशी आशुतोष तिवारी को मौका दिया था लेकिन वह आम जनता के बीच में अपनी छाप छोड़ने में नाकामयाब रहे।

चुनाव में हार जीत लगी रहती है और यही लोकतंत्र की खूबसूरती है लेकिन जिस तरह से विश्व की सबसे बड़ी पार्टी ने चुनाव हारी वह अपने आप में यक्ष प्रश्न खड़े करता है, विभिन्न समाचार पत्रों के विश्लेषण में यह देखने को मिला कि भारतीय जनता पार्टी बांकीपुर विधानसभा चुनाव क्षेत्र में दिग्गज राजनेताओं के बूथ से भी चुनाव हार गई अब सवाल तो उठता ही है कि जब यह इतने बड़े दिग्गज हैं तब वह अपने बूथ से भी पार्टी को चुनाव नहीं जितवा पा रहे वहीं दूसरी तरफ आज देश में जैन जी का आंदोलन चल रहा है और हम सभी ने आप लोगों के साथ मिलकर देखा कि जंतर मंतर पर किस तरह से पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की इस्तीफा को लेकर के छात्रों द्वारा आंदोलन किया गया।
अंत में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ और वह आंदोलन किसी प्रकार समाप्त कराया गया लेकिन सवाल फिर वही दोबारा से खड़ा होता है कि ऐसा क्या हो गया जो अपने आप को विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है और जिसको संगठन के दम पर चुनाव लड़ने की महारत हासिल है वह भी छोटे से उपचुनाव में इतनी बुरी तरह से आत्मसमर्पण कर दिया वह बड़ा ही पीड़ा दायक है।
डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं दीनदयाल उपाध्याय , बलराज मधोक के खून पसीने से सींची गई पार्टी में संगठन को हमेशा से बल दिया गया , संगठन से ही शक्ति है लेकिन आज संगठन से ज्यादा धनबल की शक्ति नजर आती है जिसका जिक्र पार्टी के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व सांसद रघुनंदन शर्मा द्वारा पूर्व में भी किया गया उन्होंने कहा कि कैसे वरिष्ठ नेताओं द्वारा जिले स्तर पर संगठन में अपने लोगों को बिठाया जाता है चाहे उनके पास में जन समर्थन हो या नहीं और जिलों में अधिकतर संगठन कागजों पर ही चल रहे हैं उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था कि जिसका परिणाम हमें भविष्य में भुगतना पड़ सकता है और वह दिखाई पड़ता हुआ नजर आता है ।







