नई दिल्ली। 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद यह 26वां संसदीय चुनाव है। कुल 120 सीटों वाली संसद के लिए 38 पंजीकृत राजनीतिक दल चुनाव मैदान में हैं। हालांकि, अनुमान है कि इनमें से करीब 11 दल ही संसद में पहुंच पाएंगे, क्योंकि संसद में प्रवेश करने के लिए हर दल को कुल वैध मतों का कम से कम 3.25 फीसदी मत हासिल करना होगा।
पिछले कुछ वर्षों में देश ने न्यायिक सुधारों को लेकर तीखी बहस, 7 अक्टूबर के हमले के बाद गंभीर सुरक्षा संकट और लंबे समय तक चले युद्ध जैसे हालात का सामना किया है। इसलिए यह चुनाव सिर्फ प्रधानमंत्री चुनने तक सीमित नहीं है। इसके नतीजे यह भी तय करेंगे कि इजरायल की सरकार किस दिशा में आगे बढ़ेगी, देश के भीतर सामाजिक एकता कैसे बनी रहेगी, सुरक्षा व्यवस्था कैसी होगी और लोकतंत्र का भविष्य किस दिशा में जाएगा।
इजरायल चुनाव में कौन-कौन हैं प्रमुख दावेदार?
इजरायल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत चुनाव होते हैं। यहां दो तरह से चुनाव लड़ा जा सकता है राजनीतिक दल के माध्यम से या फिर चुनावी सूची के माध्यम से। चुनावी सूची में किसी दल या कई दलों के गठबंधन के उम्मीदवार शामिल होते हैं।
हालांकि, इजरायल के मूल कानून ‘नेसेट’ की धारा 7A के तहत चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट किसी दल या उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोक सकता है। ऐसा तब हो सकता है, जब वह इजरायल को यहूदी और लोकतांत्रिक देश मानने से इनकार करे, नस्लवाद को बढ़ावा दे या इजरायल के खिलाफ किसी दुश्मन देश या आतंकवादी संगठन के सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करे।
चुनाव लड़ने की मंजूरी देने से पहले संबंधित अधिकारी यह भी देखते हैं कि दल की नीतियां और गतिविधियां लोकतांत्रिक नियमों के अनुरूप हों और वह अपने खातों का सही रिकॉर्ड रखता हो।
इस बार चुनाव में प्रमुख दलों और गठबंधनों की स्थिति इस प्रकार है-
सत्तारूढ़ गठबंधन और दक्षिणपंथी दल– प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सत्तारूढ़ खेमे की प्रमुख पार्टी है। इसके अलावा, इतामार बेन-ग्विर की ओत्जमा येहुदित, बेजालेल स्मोट्रिच की रिलिजियस जायनिस्ट पार्टी और आर्ये डेरी की शास पार्टी भी इस खेमे में हैं। यूनाइटेड तोराह यहूदी धर्म और नोआम जैसे दल धार्मिक रूप से रूढ़िवादी यहूदी समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अमखा इजरायल भी नया दक्षिणपंथी गठबंधन है।
विपक्ष और मध्य-वामपंथी दल– विपक्ष में नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड की संयुक्त चुनावी सूची टुगेदर, पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट का मध्यमार्गी गठबंधन याशर! और लेबर पार्टी व मेरेत्ज पार्टी के विलय से बने द डेमोक्रेट्स शामिल हैं। इसके अलावा, अविग्दोर लिबरमैन की दक्षिणपंथी इजरायल बेइतेनु और बेनी गैंट्ज की मध्यमार्गी ब्लू एंड व्हाइट पार्टी भी चुनाव मैदान में हैं। द रिजर्विस्ट्स और द इकोनॉमिक पार्टी ने भी संयुक्त सूची बनाई है।
अरब समुदाय के दल– इजरायल के अरब नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख चुनावी गठबंधनों में जॉइंट लिस्ट और यूनाइटेड अरब लिस्ट (राआम) शामिल हैं। जॉइंट लिस्ट में कई अरब राजनीतिक गुट हैं, जबकि राआम का नेतृत्व मंसूर अब्बास करते हैं।
इजरायल की संसदीय व्यवस्था कैसे काम करती है?
इजरायल एक संसदीय लोकतंत्र है। यहां सत्ता के तीन प्रमुख अंग हैं—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका।
देश की संसद को नेसेट कहते हैं। इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं, जिन्हें चार साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता है। भारत की तरह इजरायल में भी सरकार चलाने की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की होती है। प्रधानमंत्री को सरकार चलाने के लिए संसद का विश्वास हासिल करना होता है और बहुमत बनाए रखना पड़ता है। बहुमत के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के नेतृत्व में न्यायपालिका मूल कानूनों की व्याख्या करती है और कानूनों की समीक्षा करती है। चुनाव कराने और उनकी निगरानी की जिम्मेदारी केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) की होती है।
3.25 फीसदी वोट का नियम इतना अहम क्यों है?
इजरायल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत पार्टियों को उनके वोटों के अनुपात में संसद में सीटें मिलती हैं। लेकिन संसद में जगह बनाने के लिए हर दल को एक न्यूनतम सीमा पार करनी होती है। इसे चुनावी सीमा कहते हैं।
फिलहाल यह सीमा 3.25 फीसदी है। 2014 में कानून के जरिए इसे तय किया गया था। इस सीमा को पार करने वाले दल को 120 सदस्यीय संसद में कम से कम चार सीटें मिल सकती हैं।
अगर कोई दल 3.25 फीसदी वोट हासिल नहीं कर पाता, तो उसके पक्ष में पड़े वोटों को सीटों के बंटवारे में शामिल नहीं किया जाता। ऐसे वोटों को अक्सर ‘बर्बाद हुए वोट’ कहा जाता है, क्योंकि इनसे उस दल को संसद में प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।
इस नियम का मकसद संसद में बहुत ज्यादा छोटे दलों को आने से रोकना और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना है। इजरायल में चुनावी सीमा 1951 में महज एक फीसदी थी। बाद में इसे 1992 में 1.5 फीसदी, 2003 में दो फीसदी और 2014 में बढ़ाकर 3.25 फीसदी कर दिया गया।
इजरायल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता प्रोफेसर ओफर केनिग के मुताबिक, इस ऊंची सीमा के कारण छोटे दल अक्सर चुनाव से पहले गठबंधन बना लेते हैं। इससे उन्हें मिलकर जरूरी वोट हासिल करने का मौका मिलता है।
इसलिए यह नियम केवल यह तय नहीं करता कि कौन-सा दल संसद में पहुंचेगा। इसका असर इस बात पर भी पड़ता है कि चुनाव के बाद कौन-सा गठबंधन बहुमत जुटाकर सरकार बना पाएगा।
इजरायल में सरकार कैसे बनती है?
इजरायल के इतिहास में किसी एक राजनीतिक दल ने अपने दम पर कभी भी संसद की 61 सीटों का बहुमत हासिल नहीं किया है। इसलिए देश में अब तक हर सरकार गठबंधन के सहारे बनी है। चुनाव के बाद अलग-अलग दलों के बीच बातचीत और समर्थन जुटाने की प्रक्रिया में समय लगता है।
चुनाव के बाद केंद्रीय चुनाव समिति मतों की अंतिम गिनती और सीटों के बंटवारे की पुष्टि करती है। इसके बाद राष्ट्रपति उन दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत करते हैं, जिन्होंने चुनावी सीमा पार की हो। इन चर्चाओं में प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवारों और सरकार बनाने की उनकी संभावनाओं पर विचार किया जाता है।
बातचीत के बाद राष्ट्रपति उस उम्मीदवार को सरकार बनाने का न्योता देते हैं, जिसके 61 सांसदों का समर्थन जुटाने की सबसे ज्यादा संभावना होती है।
राष्ट्रपति इस उम्मीदवार को गठबंधन बनाने के लिए 28 दिन देते हैं। जरूरत पड़ने पर उसे 14 दिन की अतिरिक्त मोहलत भी मिल सकती है।
अगर पहला उम्मीदवार जरूरी समर्थन नहीं जुटा पाता, तो राष्ट्रपति किसी दूसरे उम्मीदवार को सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं। दूसरे उम्मीदवार को भी गठबंधन बनाने के लिए 28 दिन मिलते हैं।
गठबंधन पर सहमति बनने के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए चुना गया उम्मीदवार नई सरकार, उसकी नीतियों और मंत्रियों की सूची संसद के सामने रखता है। इसके बाद नेसेट में विश्वास मत होता है।
अगर कम से कम 61 सांसद सरकार के पक्ष में वोट देते हैं, तो नई सरकार को मंजूरी मिल जाती है और मंत्री अपने पद की शपथ लेते हैं।
बेंजामिन नेतन्याहू के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट विपक्ष के साथ मिलकर उन्हें सत्ता से हटाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में यह चुनाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हो गया है।







