नई दिल्ली। सच्चाई के धरातल पर देश में हुए मतदाता सूचियों के गहन शुद्धिकरण अभियान (एसआईआर) में गड़बड़ी जैसे नॉन इश्यू को इश्यू बना कर राहुल गांधी जिस तरह से एक नवम्बर को नई दिल्ली में रैली करने पर अड़े हुए हैं, उसे नेता प्रतिपक्ष का दम्भ न कहा जाए तो और क्या कहें? क्योंकि इस तारीख की घोषणा खुद राहुल ने की है इसलिए इसे बदला नहीं जा सकता, का यह भाव कांग्रेस में दशकों से चले आरहे गांधी परिवार के मालिकाना हक वाले अहंकार के अतिरिक्त कुछ नहीं लगता।
रैली की तारीख से जनता और कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नाराजगी
साल 1974-75 में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष देवकांत बरुआ द्वारा दिया गया ‘इन्दिरा इन इण्डिाया, इण्डिया इन इन्दिरा’का परिवारवादी नारा हंसते हंसते स्वीकारने वाली कांग्रेस में आज अगर उसी खानदान का एक नैसर्गिक वारिस सर्वेसर्वा हो जाए और मनमानी करने लगे तो इसमें किसी को अधिक आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन धरातल की सच्चाई यह है कि इस दिन रैली को लेकर जहां जनसाधारण में रोष है, वही कांग्रेस के कार्यकर्ता भी रैली की इस तारीख से प्रसन्न नहीं हैं।
रैली की जिद से व्यापारियों को आर्थिक नुकसान की आशंका
दिल्ली के व्यापारियों और उद्यमियों के प्रमुख संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एण्ड इण्डस्ट्री ने राहुल गांधी से विपक्षी दलों की 1 नवंबर को रामलीला मैदान में प्रस्तावित रैली को टालने का जो अनुरोध किया था, उसे उन्होंने ठुकरा कर संवेदनहीनता और हठधर्मिता का परिचय दिया है। व्यापारियों का ये संगठन बस इतना चाह रहा था कि रैली भाई दूज के बाद की जाए, ताकि वे व्यापारिक नुकसान से बच सकें। राहुल गांधी और उनके सहयोगी-साथी इससे अनभिज्ञ नहीं कि वर्तमान में त्यौहारी सीजन चल रहा है।
धनतेरस एवं दीवाली के पहले बड़े पैमाने पर खरीदारी होती है। दिल्ली उत्तर भारत का बड़ा व्यापारिक केन्द्र है, देश के इस हिस्से के व्यापारी दिल्ली से माल खरीद कर अपने यहां दुकानों में बेचते हैं। रैली के चलते अगर यहां के व्यापारियों पर इसका असर पड़ता है तो यह असर नीचे तक जाएगा। राहुल को इसका भी आभास होना चाहिए था कि दिल्ली के कनाट प्लेस के व्यापारी कांग्रेस और काकरोच जनता पार्टी के अनवरत धरना-प्रदर्शन से पहले ही लगभग 20000 करोड़ का आर्थिक नुकसान उठा चुके हैं।
राहुल की जिद, जनभावनाओं और संवैधानिक मर्यादाओं की अनदेखी
एक साधारण नागरिक भी इन दिनों अपने घरों में शादी-विवाह या अन्य कोई समारोह का आयोजन यह सोच कर नहीं करता कि यह त्यौहारी सीजन है। ऐसे में रिश्तेदारों का आना-जाना भी मुश्किल होता है। ऐसा नहीं कि देश में आने वाले दिवाली व इसके आसपास के त्यौहार केवल व्यापारी और समाज के लोग ही मनाते हैं, यह त्यौहार तो खुद कांग्रेसी परिवारों में भी मनाए जाते हैं। रैली की तैयारी कोई घण्टे दो घण्टों का काम नहीं, बल्कि इसमें कई दिन लगते हैं।
समाज के साथ-साथ यह कांग्रेसी कार्यकर्ता भी तो त्यौहारों में व्यस्त हैं और राहुल गांध के अहंकार की भेंट ये लोग भी चढ़ते दिख रहे हैं। यह राहुल का दम्भ है है कि उन्होंने व्यापारियों के अनुरोध के साथ-साथ अपने कार्यकर्ताओं की विवशता पर तनिक भी संवेदनशीलता नहीं दिखाई, बल्कि यह भी है कि व्यापारियों को पीएम मोदी से मुख्य चुनाव आयुक्त को बर्खास्त करने को कहना चाहिए। इसे पारिवारिक अहंकार के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता। राहुल अच्छे से जानते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल महाभियोग से ही हटाया जा सकता है और उसे संसद से पारित कराने की उनमें सामथ्र्य नहीं। राहुल अपने झूठे आरोपों की बलिवेदी पर न केवल संविधान बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं व जनभावाओं को निष्ठुरता से चढ़ाते नजर आ रहे हैं।
जैसा कि सभी जानते हैं कि वोट चोरी का राहुल गांधी का आरोप भी झूठ पर ही टिका है। वे और अन्य विपक्षी नेता वोट चोरी का झूठ कितना ही दोहराएं, वे इसे सच सिद्ध करने में नाकाम हैं। राहुल वोट चोरी का तबसे शोर मचा रहे, जबसे बिहार में एसआईआर हुआ था, लेकिन वे अपने पक्ष में जनमत बनाने में समर्थ नहीं हुए। शायद इसी से वे खीझे हुए हैं। वे झूठ के सहारे कई बार अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन उनकी दाल नहीं गली।
इससे पहले राहुल और उनके साथियों ने ईवीएम को निशाने पर लिया था, लेकिन नाकाम ही रहे। जिस कथित वोट चोरी का आरोप लगाकर वे मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफा मांग रहे हैं, उसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो रही है और एक याचिका तो खुद उन्होंने दायर कर रखी है। रोचक बात है कि अपनी याचिका को लेकर अभी तक उन्होंने न्यायालय में कोई प्रमाण नहीं दिखाए हैं। आखिर वे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा क्यों नहीं कर रहे हैं? न तो संवैधानिक संस्थाओं पर विश्वास, न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा और न ही जनभावनाओं का आदर।
राहुल गांधी की नीति इस गीत पर आधारित लगती है कि ‘साडे अपने असूल, साडे अपने रूप-असी जित्थे चाहवांगे गड्डी मोड़ांगे, असी सारे दे सारे सिग्नल तोड़ांगे।’ राहुल को ध्यान में रखना होगा कि देश की जनता दम्भी रावण के पुतले हर साल जलाती है और उसके सिद्धांतों की राजनीति तो बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करती।







