नई दिल्ली। दिल्ली में विपक्षी दल की रैली से ठीक अगले दिन हैदराबाद में गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्षी दलों के नेताओं और खासतौर पर राहुल गांधी को जिस तरह निशाने पर लिया, उससे यह स्पष्ट है कि सत्ताधारी दल उनके दुष्प्रचार आधारित दबाव के आगे झुकने के बजाय उनके झूठे बृत्तांत का जवाब देने के लिए प्रतिबद्ध है। अमित शाह ने 3 करोड़ बंग्लादेशी घुसपैठियों की बात करके विपक्ष के उस दोहरे मापदंडों का भी पर्दाफाश कर दिया है जो इस समस्या को जन्म देने के साथ साथ इसे पाल पोस कर बड़ा करने के बाद अब इसके लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश कर रहा है।
एसआईआर पर जज की भूमिका में विपक्ष
वोटर सूचियों की शुद्धता के लिए चलाई जा रही प्रक्रिया यानी एसआईआर के तहत जारी किए गए मसौदा सूची में से करीब 13 करोड़ नाम वोटर सूची से हटाए जाने को विपक्षी दल सिर्फ ‘वोट चोरी’ करार देने में ही नहीं लगा हुआ, बल्कि इस मामले में वकील के साथ-साथ जज की भूमिका भी निभा रहा है। वह यह सुनने और समझने के लिए तैयार नहीं है कि इन 13 करोड़ लोगों में से 6.30 करोड़ ऐसे हैं जो पक्के तौर पर किसी अन्य स्थान पर जाकर बस गए हैं, करीब 2.80 करोड़ लोगों की मौत हो चुकी है, एक करोड़ से अधिक लोगों के नाम दो या तीन जगहों पर दर्ज थे और लगभग तीन करोड़ लोग सत्यापन के दौरान अपने पते पर मिले ही नहीं।
घुसपैठियों पर स्पष्टता
गृह मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ये तीन करोड़ लोग असल में घुसपैठिए हैं और इनके नाम वोटर सूची से बाहर ही रहेंगे। उनका यह दावा इसलिए सही प्रतीत होता है, क्योंकि इन तीन करोड़ लोगों के बारे में उनके पड़ोसी भी कोई जानकारी नहीं दे पा रहे हैं। आखिर विपक्षी दल इस बात पर क्यों अड़ा हुआ है कि जो लोग किसी अन्य स्थान पर जाकर बस गए हैं, या जिनकी मौत हो चुकी है, या जिनके नाम एक से अधिक जगहों पर दर्ज हैं और जो ढूंढने पर भी नहीं मिल रहे, उनके नाम वोटर सूची में क्यों होने चाहिए?
बड़े पैमाने पर हुई घुसपैठ
वह इस सच्चाई से अनजान नहीं है कि देश में दशकों से बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी नागरिकों की घुसपैठ होती रही है और उन्होंने पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा के कुछ हिस्सों में जनसांख्यिकी का स्वरूप भी बदल दिया है। कांग्रेस, वामपंथी पार्टियां और तृणमूल कांग्रेस इस बात को अच्छी तरह जानती हैं कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिकों ने धोखे और जालसाजी के जरिए हर तरह के पहचान पत्र हासिल करके अपने आप को भारतीय नागरिक के रूप में दर्शाना शुरू कर दिया है, क्योंकि इन पार्टियों ने अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के कारण उन्हें संरक्षण देकर अपना वोट बैंक बनाया है। इसी कारण पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों के अलावा अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी, उत्तरी और पश्चिमी भारत के साथ-साथ दक्षिण भारत के कई राज्यों में भी वोटर बन गए हैं।
विपक्षी दल ने बिहार में एसआईआर के तहत 65 लाख नाम हटाए जाने पर भी ‘वोट चोरी’ का शोर मचाया था, लेकिन वह ऐसे 65 लोगों को भी सामने नहीं ला सका था जिनके नाम गलत तरीके से हटाए गए हों। यह तथ्य भी है कि कांग्रेस के नेता कर्नाटक और केरल में एसआईआर की प्रक्रिया को सही करार देकर चुनाव आयोग का धन्यवाद कर चुके हैं।
बिना किसी शक के यह संभव है कि किसी जायज वोटर का नाम किसी गलती या लापरवाही के कारण वोटर सूची से बाहर हो गया हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उसका नाम दोबारा शामिल नहीं किया जा सकता। आखिर जब इसकी सुविधा उपलब्ध है, तो फिर ‘वोट चोरी’ के बारे में विपक्षी दल द्वारा बार-बार अलापा जा रहा राग बेसरा और लोगों को गुमराह करने वाला ही कहा जाएगा।
घुसपैठ एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या
भारत-बांग्लादेश सीमा से पश्चिम बंगाल, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा और असम में घुसपैठ की समस्या है और इन राज्यों में बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। पश्चिम बंगाल में घुसपैठ को लेकर विभाजन के समय से ही राजनीति होती रही है, तो असम में भी बांग्लादेशी घुसपैठ के नाम पर बवाल मच चुका है। इसी तरह से त्रिपुरा के चुनाव में भी बांग्लादेशी घुसपैठ एक बड़ा मुद्दा रहा है। यह मुद्दा कुल मिलाकर राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है और इसे लेकर राष्ट्रीय स्तर और विभिन्न राज्यों में जमकर राजनीति होती रही है।
पश्चिम बंगाल का बांग्लादेश से सीमाई इलाका सबसे अधिक है और इसमें भी सबसे ज्यादा सीमा समुद्री इलाकों से गुजरती हैं। इस कारण इन समुद्री इलाकों में निगरानी अपेक्षाकृत कम होती है और इन इलाकों से बंगाल में सबसे ज्यादा घुसपैठ होते हैं और बंगाल की राजनीति में घुसपैठ का मुद्दा छाया रहता है। बीजेपी से पहले चाहे वह लेफ्ट की सरकार हो या फिर तृणमूल कांग्रेस की सरकार घुसपैठ को राजनीतिक मजबूती का आधार बनाती रही है।
पूर्व सीएम ममता बनर्जी की सरकार पर आरोप है कि पार्टी और सरकार के स्तर पर घुसपैठ और एक विशेष समुदाय के लोगों की तुष्टिकरण की रणनीति करती रही है। केंद्र सरकार ने इस बाबत बीएसएफ को अधिकार दिये और सीमा पर सख्ती बढ़ाने का काम किया। ममता बनर्जी ने बीएसएफ के अधिकार बढ़ाने को लेकर भी खुला विरोध किया था और बीजेपी पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ प्रताड़ना का आरोप लगाया था।दरअसल लेफ्ट के सीएम ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्या पर ममता घुसपैठ को लेकर आक्रामक रही लेकिन सत्ता में आने के बाद ममता के सुर और नीतियां इस मसले पर बदलती दिखी।
कोई भी प्रांत घुसपैठियों से अछूता नहीं
बांग्लादेश से सटे इलाकों के साथ-साथ देश के हिंदी प्रदेश वाले बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी कभी न कभी बांग्लादेशियों के घुसपैठ का मुद्दा उठता रहा है। बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर केंद्र सरकार जब भी कोई कदम उठाती है या फिर जब एनआरसी या सीएए लाने की बात हुई थी, तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियों ने इनका खुला विरोध किया था।
एसआईआर के विरोध के पीछे घुसपैठियों का प्यार तो नहीं?
वोटर सूचियों की शुद्धता के लिए चलाई जा रही प्रक्रिया यानी एसआईआर (SIR) के तहत जारी किए गए मसौदा (ड्राफ्ट) सूची में से करीब 13 करोड़ नाम वोटर सूची से हटाए जाने को विपक्षी दल सिर्फ ‘वोट चोरी’ करार देने में ही नहीं लगा हुआ, बल्कि इस मामले में वकील के साथ-साथ जज की भूमिका भी निभा रहा है। वह यह सुनने और समझने के लिए तैयार नहीं है कि इन 13 करोड़ लोगों में से 6.30 करोड़ ऐसे हैं जो पक्के तौर पर किसी अन्य स्थान पर जाकर बस गए हैं, करीब 2.80 करोड़ लोगों की मौत हो चुकी है, एक करोड़ से अधिक लोगों के नाम दो या तीन जगहों पर दर्ज थे और लगभग तीन करोड़ लोग सत्यापन के दौरान अपने पते पर मिले ही नहीं।
गृह मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ये तीन करोड़ लोग असल में घुसपैठिए हैं और इनके नाम वोटर सूची से बाहर ही रहेंगे। उनका यह दावा इसलिए सही प्रतीत होता है, क्योंकि इन तीन करोड़ लोगों के बारे में उनके पड़ोसी भी कोई जानकारी नहीं दे पा रहे हैं। आखिर विपक्षी दल इस बात पर क्यों अड़ा हुआ है कि जो लोग किसी अन्य स्थान पर जाकर बस गए हैं, या जिनकी मौत हो चुकी है, या जिनके नाम एक से अधिक जगहों पर दर्ज हैं और जो ढूंढने पर भी नहीं मिल रहे, उनके नाम वोटर सूची में क्यों होने चाहिए?
जनसांख्यिकी परिवर्तन का प्रयास
वह इस सच्चाई से अनजान नहीं है कि देश में दशकों से बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी नागरिकों की घुसपैठ होती रही है और उन्होंने पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा के कुछ हिस्सों में जनसांख्यिकी का स्वरूप भी बदल दिया है। कांग्रेस, वामपंथी पार्टियां और तृणमूल कांग्रेस इस बात को अच्छी तरह जानती हैं कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिकों ने धोखे और जालसाजी के जरिए हर तरह के पहचान पत्र हासिल करके अपने आप को भारतीय नागरिक के रूप में दर्शाना शुरू कर दिया है, क्योंकि इन पार्टियों ने अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के कारण उन्हें संरक्षण देकर अपना वोट बैंक बनाया है। इसी कारण पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों के अलावा अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी, उत्तरी और पश्चिमी भारत के साथ-साथ दक्षिण भारत के कई राज्यों में भी वोटर बन गए हैं।
विपक्षी दल ने बिहार में एसआईआर के तहत 65 लाख नाम हटाए जाने पर भी ‘वोट चोरी’ का शोर मचाया था, लेकिन वह ऐसे 65 लोगों को भी सामने नहीं ला सका था जिनके नाम गलत तरीके से हटाए गए हों। यह तथ्य भी है कि कांग्रेस के नेता कर्नाटक और केरल में एसआईआर की प्रक्रिया को सही करार देकर चुनाव आयोग का धन्यवाद कर चुके हैं।
बिना किसी शक के यह संभव है कि किसी जायज वोटर का नाम किसी गलती या लापरवाही के कारण वोटर सूची से बाहर हो गया हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उसका नाम दोबारा शामिल नहीं किया जा सकता। आखिर जब इसकी सुविधा उपलब्ध है, तो फिर ‘वोट चोरी’ के बारे में विपक्षी दल द्वारा बार-बार अलापा जा रहा राग बेसरा और लोगों को गुमराह करने वाला ही कहा जाएगा।
परेशानी पैदा कर रहे हैं घुसपैठिए
इसी तरह से अब यह मुद्दा कभी उत्तर प्रदेश तो कभी झारखंड पहुंच गया है और झारखंड के अब आदिवासी इलाकों में भी संथालियों की जगह बांग्लादेशी घुसपैठियों को प्रश्रय देने को लेकर विवाद चल रहा है। अब स्थिती यह बन गयी है कि पहले घुसपैठ का मुद्दा केवल सीमावर्ती राज्यों पश्चिम बंगाल और असम तक सीमित था, लेकिन अब यह पूरी तरह से एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है, क्योंकि घुसपैठ के साथ-साथ आतंकवाद भी जुड़ गया है। उत्तराखंड में धामी की सरकार अवैध घुसपैठ को लेकर कारगर कदम उठा रही है।
घुसपैठ के नाम पर अलकायदा से लेकर जमात उल उलेमा के आतंकियों के प्रवेश की बात भी सामने आई है। इस वजह से केंद्र सरकार ने वर्तमान सरकार से पहले भी घुसपैठ को रोकने के लिए पहल की है, लेकिन लोकल राजनीति और वोट बैंक की वजह से अलग अलग सियासी पार्टियां इसका विरोध करती रही है। अमित शाह ने अपनी रैलियों में सरकार की इन घुसपैठियों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति स्पष्ट कर इन असामाजिक और अवांछित तत्वों के साथ साथ इनके भारतीय वकीलों को भी कड़ा संदेश दे कर अच्छा काम किया है।







