इंदौर,25 जून (आरएनएस)। था तो यह हास्य कवि सम्मेलन लेकिन इसमें हास्य की फुहारों के साथ ही कविता के दूसरे रंग भी थे। इसमें आंसुओं को पढऩे और समझने की बातें भी थीं तो इश्क-ओ-मोहब्बत के अहसास की बातें भी थीं। बेटी को विदाई के दृश्य थे तो एक फौजी की अपने तिरंगे के प्रति दीवानगी भी थी। यानी इस कवि सम्मेलन में कवियों-कवियत्रियेां ने श्रोताओं का हर रंग-ओ-खुशबू से सराबोर किया। युनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला और शाइनिंग डायमंडल सोशल वेलफेयर सेासायटी के इस साझा कवि सम्मेलन में श्रोताओं ने हर रस की कविताओं का आंनद लिया। शुरुआत की कवियत्री मनीषा शुक्ला ने। उन्होंने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। उन्होंने कविता पढ़ी : शब्द की आरती, व्याकरण के दीए, नवरसों की गमक, सर्जना के लिए। उन्होंने इसके बाद मोहब्बत के ठिकानों की बात खूब करती है, जऱा सी बात को नजऱें तराश करती हैं। लेकिन हास्य कवि पार्थ नवीन ने हास्य का आस्वादन कराया। उन्होंने एक बॉलीवुड गीत की पैरोडी पढ़ी : कोशिश करले ममता, मफलर और हजारे, कीमत कम नहीं होगी, दिख जाएंगे दिन में तारे, सौ रुपये लीटर के एक पेट्रोल को सलाम। ऐ पेट्रोल तेरी बढ़ती उमर को सलाम। लेकिन इस भावभूमि को बदलते हुए राजस्थान से आए कवि अशोक चरण श्रोताओं को देशभक्ति के रंग में सराबोर कर दिया। उन्होंने ओजस्वी स्वर में कविता पाठ किया और पढ़ा : मैं कितना दीवानी हूँ दुनिया को बतलाऊंगा, मेरी मौत को मिले तिरंगा मानकर भी जी जाऊंगा।
उनकी इस ओजस्वी कविता को श्रोताओं ने खूब सराहा। प्रज्ञा शर्मा ने प्रेम की बात करते हुए नाजुक $गज़ल पढ़ी : ज्य़ादा कहने को है भी नहीं सफाई में, सुना है उसकी तबियत खराब है कल से, मेरी दुआ भी मिला दो दवाई में। इसके बाद उन्होंने कविता पढ़ी कि कोई तो ऐसी किताब हो, कोई तो ऐसा कोर्स हो जो समझ ले आंसुओं को। लेकिन जल्द ही इस इश्क-ओ-मोहब्बत के बाद फिर हास्य की फुहारें उडऩे लगीं जब आगरा के कवि रमेश मुस्कान ने कविता पढ़ी: तुम फैशन ज्टीवी जैसी लगती हो, मैं संस्कार टीवी के चैनल जैसा लगता हूँ। जब तुमो देख सीटी बजती है, मैं खून का घूंट पीकर रह जाता हूँ। चिराग जैन ने रोचक संचालन करते हुए कवियों का बेहतर और चुटीला परिचय दिया और फिर अपनी हास्य कविता भी सुनाई। इसके बाद कवि और पुलिस अधिकारी पवन जैन ने कोरोना काल में पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारी, उनके संघर्ष और दुख-दर्द को मार्मिकता से अभिव्यक्त किया। उन्होंने कविता पड़ी : बंद हों थाने के पट, ऐसा कभी होता नहीं, शहर सोए चैन से, बस इसलिए सोता नहीं। इसके बाद उन्होंने कविता पढ़ी : कोरोना सेे जीत जाओ अब जंग, बस, इतना कह देना हम भी इंसान थे। इसके बाद चार लाइन के लिए मशहूर कवि सुरेंद्र शर्मा ने फरमाया : पहले हम दीवारों के साथ रहते थे, अब दीवारें हमारे बीच रहती हैं। अरुण जैमिनी ने भी अपनी कविताओं से रंग जमाया।
अनिल पुरोहित/अशफाक







