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ज्ञान बटोरिए पर पहले थोड़ा टटोलिए!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 22, 2022
in विशेष
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अजीत द्विवेदी

लंबे समय से टेलीविजन पर ऐसा कोई विज्ञापन नहीं आया था, जिसकी चर्चा हो या जिसके मुहावरे लोगों की जुबान पर चढ़ जाएं। कुछ विज्ञापनों का धार्मिक व सांस्कृतिक कारणों से विरोध जरूर हुआ लेकिन कोई विज्ञापन ऐसा नहीं आया था, जो समाज की किसी भी हकीकत पर उंगली रखता हो। यह सूखा दूर हुआ है ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के नए सीजन के विज्ञापन से। नए सीजन के तीन विज्ञापनों ने भारत की मौजूदा समय की सबसे बड़ी समस्याओं पर उंगली रखी है। इस समय भारत की सबसे बड़ी समस्या है, झूठ! और दूसरी समस्या है वैकल्पिक सच की प्रस्थापना! ये दोनों काम पारंपरिक और सोशल मीडिया के जरिए बहुत व्यवस्थित तरीके से किया जा रहा है। कुछ लोग किसी खास मकसद से इस काम को अंजाम दे रहे हैं तो कुछ लोग अपनी धार्मिक-सामाजिक आस्था की वजह से इसमें शामिल हैं और कुछ लोग अनजाने में इसका हिस्सा बन रहे हैं। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के नए सीजन के विज्ञापन में अमिताभ बच्चन इन तीनों किस्म के लोगों को बेनकाब कर रहे हैं।

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पहली किस्म उन लोगों की है, जो पारंपरिक मीडिया से जुड़े हैं और जिन लोगों ने दो हजार रुपए के नए नोट में चिप लगी होने की खबर दी थी। एक विज्ञापन में इन लोगों का मजाक उड़ाया गया है। बताया गया है कि आंख मूंद कर टेलीविजन चैनलों की खबरों पर भरोसा करने वालों को कितना नुकसान हो सकता है। दूसरी किस्म उन लोगों की है, जिनके लिए न्यूज का एकमात्र स्रोत व्हाट्सऐप संदेश हैं। उनके पास व्हाट्सऐप पर फॉरवर्ड होकर मैसेज आते हैं और वे उन पर भरोसा करते हैं। उनको पता नहीं होता है कि सोशल मीडिया पर उनकी प्रोफाइलिंग हुई है और जो मैसेज उनको मिल रहा है वह उनकी जाति, धर्म और राजनीतिक रूझान को जानने के बाद डिलीवर किया जा रहा है। अपने विश्वास या अपनी कंडीशनिंग की वजह से वे इस मैसेज को दिल से स्वीकार करते हैं और उस पर भरोसा करते हैं। दूसरे विज्ञापन में ऐसे लोगों पर तंज है, जो सोशल मीडिया के फॉरवर्ड को अंतिम ज्ञान समझते हैं। तीसरी किस्म उन लोगों की है, जो बेवजह हड़बड़ी में हैं और बिना जांचे-समझे खबरों पर यकीन करते हैं और उसे फॉरवर्ड भी करते हैं। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के तीसरे विज्ञापन में, ऐसे लोगों पर तंज है, जिनको लगता है कि उनके पास समय बहुत कम है और बहुत काम करना है।

तीनों विज्ञापनों की टैगलाइन है कि ‘ज्ञान जहां से मिले बटोर लीजिए पर पहले जरा टटोल लीजिए’। यह अच्छी लाइन है। हालांकि यह अलग बात है कि किसी भी सूचना या जानकारी को ज्ञान नहीं कहा जा सकता है। यह भी सही है कि भले ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के निर्माता इसे ज्ञान का कार्यक्रम बताएं लेकिन यह सूचना और जानकारी का कार्यक्रम है। दूसरे, यह एक ‘ग्लोरिफायड गैम्बलिंग’ की तरह है क्योंकि लोग महीनों, बरसों तक फोन लगाते हैं, तब जाकर उनको इस कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिलता है। शुरू के कुछ सीजन में तो इसमें सिर्फ मध्यम या उच्च वर्ग के पढ़े-लिखे और अमीर लोगों को ही मौका मिला। लेकिन बाद में टीआरपी घटने की वजह से इसका फॉर्मेट बदला गया। निर्माताओं ने सामाजिक सरोकार दिखाए और इसे पिछड़े व वंचित भौगोलिक क्षेत्रों और सामाजिक समूहों के लोगों के सशक्तिकरण का माध्यम बनाया। गैर सरकारी संगठनों की मदद के लिए भी इसके कार्यक्रम हुए। इसके बावजूद यह ज्ञान की बजाय सामान्य ज्ञान का कार्यक्रम ही है। पर ध्यान रहे सामान्य ज्ञान ही ज्ञान की ओर यात्रा की पहली सीढ़ी है। सफर वहीं से शुरू होता है।

‘कौन बनेगा करोड़पति’ के विज्ञापनों का महत्व दो कारणों से है। पहला कारण तो यह है कि ज्ञान के सफर की पहली सीढ़ी यानी सूचना के माध्यमों को प्रदूषण से बचाने का प्रयास इसमें किया गया है या कम से कम उस खतरे की ओर इशारा किया गया है। मुख्य रूप से सूचना के दो माध्यम हैं- पारंपरिक मीडिया और सोशल मीडिया। इन दोनों पर जिस तरह की सूचनाओं का प्रसार हो रहा है उसके कई खतरे हैं। उससे लोगों में अज्ञानता बढ़ रही है और साथ साथ विभाजनकारी और कट्टरपंथी ताकतों को मदद मिल रही है। अगर इस कार्यक्रम के विज्ञापनों से प्रभावित होकर थोड़े से लोगों ने भी सूचनाओं के स्रोत तलाशने शुरू किए या यकीन करने से पहले उनकी छानबीन की तो देश और समाज का बहुत भला होगा। तीनों विज्ञापनों में प्रत्यक्ष  रूप से गलत जानकारी का शिकार हुए लोगों को नसीहत दी गई है लेकिन बहुत बारीकी से उन लोगों पर भी तंज किया गया है, जो इस तरह की सूचनाएं प्रचारित और प्रसारित करते हैं। अगर उन्हें जरा भी शर्म आती है तो इस विज्ञापन का बड़ा मकसद पूरा होगा।

इन विज्ञापनों को महत्वपूर्ण मानने का एक कारण यह है कि मौजूदा समय के दबावों के बावजूद  मुख्यधारा की किसी टेलीविजन मीडिया या किसी कंटेंट कंपनी या किसी जाने-माने प्रस्तोता ने सच कहने का जोखिम लिया है। आज के समय की सबसे बड़ी समस्या सच कहने की है। झूठ और वैकल्पिक सच गढऩे के समय में अगर कोई आईना दिखाता है तो वह बड़ी हिम्मत का काम है। सबको पता है कि कैसे झूठ का प्रचार करने और अफवाहें फैलाने वाले मजे से घूम रहे हैं और उनकी पोल खोलने वाले जेल भेजे जा रहे हैं! जिन्होंने धार्मिक भावनाएं भडक़ाईं उनका बाल भी बांका नहीं हुआ लेकिन जिसने उनकी पोल खोली, वह जेल चला गया। ऐसे मुश्किल समय में लोगों को यह सलाह देना कि वे किसी भी खबर पर यकीन करने से पहले उसकी छानबीन करें अन्यथा उनको नुकसान हो सकता है, बहुत साहस का काम है। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के निर्माताओं ने, उसका प्रसारण करने वाले सोनी नेटवर्क ने और उसके प्रस्तोता अमिताभ बच्चन ने सचमुच साहस का और जिम्मेदारी का काम किया है। महानायक होने के बावजूद अमिताभ बच्चन कभी व्यवस्था या लोकप्रिय विमर्श से बाहर नहीं जाते थे। उनके फिल्मी किरदार हमेशा व्यवस्था के खिलाफ लड़ते रहे लेकिन वे मोटे तौर पर व्यवस्था के साथ ही रहे। संभवत: पहली बार वे उस बुराई के खिलाफ खड़े हुए हैं, जो देश को मानसिक रूप से दिवालिया बना रही है।

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