नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र महासभा में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का भाषण तीखे आरोपों और राजनीतिक संदेशों से भरा रहा. उन्होंने ईरान के साथ-साथ तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस की भी आलोचना की. उनके भाषण के दौरान कई देशों के प्रतिनिधि हॉल से बाहर चले गए. नेतन्याहू ने इसे विरोध का संकेत माना, लेकिन अपने संबोधन से पीछे नहीं हटे. इस भाषण को सिर्फ कुछ देशों से नाराजगी के रूप में देखना अधूरा होगा. इसके पीछे गाजा युद्ध, फिलिस्तीन को राज्य के रूप में मान्यता देने की बहस, हमास को लेकर आरोप और इजराइल पर अंतरराष्ट्रीय दबाव जैसे मुद्दे हैं.
नेतन्याहू ने इन सभी विषयों को जोड़कर अपना पक्ष रखा. आइए, इसी बहाने समझते हैं कि तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस से क्यों चिढ़ता है इजराइल? संयुक्त राष्ट्र महासभा में इन देशों पर क्यों बरसे नेतन्याहू?
तुर्की से तनाव की वजह क्या है?
तुर्की और इजराइल के संबंध लंबे समय से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. गाजा युद्ध के बाद तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने इजराइल की सैन्य कार्रवाई की कड़ी आलोचना की. उन्होंने फिलिस्तीनियों के समर्थन में बयान दिए और इजराइल पर हमले रोकने का दबाव बनाया.
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन.
तुर्की की सरकार का कहना है कि गाजा में आम लोगों की जान और बुनियादी सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा है. नेतन्याहू ने अपने भाषण में एर्दोगन पर हमास के नेताओं को शरण देने और इजराइल के खिलाफ नफरत फैलाने का आरोप लगाया. उन्होंने तुर्की के राष्ट्रपति को तानाशाह तक कहा. ये नेतन्याहू के आरोप और राजनीतिक दावे हैं. तुर्की और इजराइल की असहमति का केंद्र हमास और गाजा है. इजराइल हमास को आतंकवादी संगठन मानता है और कहता है कि उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई देश की सुरक्षा के लिए जरूरी है. उधर तुर्की गाजा में इजराइली कार्रवाई की निंदा करता है और फिलिस्तीनी अधिकारों की बात उठाता है. इस मतभेद के कारण दोनों देशों के बीच राजनयिक बयानबाजी तेज होती रही है.
ब्रिटेन और फ्रांस पर निशाना क्यों?
ब्रिटेन और फ्रांस पश्चिमी देशों में इजराइल के पुराने साझेदार माने जाते हैं. लेकिन गाजा युद्ध और फिलिस्तीनी राज्य के सवाल पर दोनों देशों की आलोचना अधिक मुखर हुई है. नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों के नेता इजराइल पर उपनिवेशवाद का आरोप लगाते हैं, जबकि उनके अपने इतिहास में उपनिवेशवादी शासन रहा है. यह टिप्पणी उनके भाषण का राजनीतिक हिस्सा कही जा सकती है.
इसका उद्देश्य आलोचना को चुनौती देना और उन देशों के ऐतिहासिक अनुभवों की ओर ध्यान दिलाना था. लेकिन ब्रिटेन और फ्रांस की आलोचना का आधार उनका औपनिवेशिक इतिहास नहीं, बल्कि आज की नीतियां और गाजा में युद्ध को लेकर चिंता भी है. दोनों देशों ने इजराइल की कुछ नीतियों पर आपत्ति जताई है. उनकी चिंता में फिलिस्तीनी नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय सहायता की पहुंच और संघर्ष को रोकने की जरूरत शामिल रही है. नेतन्याहू इन आलोचनाओं को इजरायल पर अनुचित दबाव के रूप में पेश करते हैं. आलोचक इसे युद्ध के मानवीय असर पर जवाबदेही की मांग बताते हैं.
फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता का विवाद
ब्रिटेन और फ्रांस का नाम चर्चा में आने की एक वजह फिलिस्तीन को राज्य के रूप में मान्यता देने की बहस भी है. फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता के समर्थकों का कहना है कि इससे दो-राज्य समाधान की दिशा में राजनीतिक रास्ता मजबूत हो सकता है. इस विचार में इजरायल और फिलिस्तीन को अलग-अलग देशों के रूप में सुरक्षित और मान्यता प्राप्त अस्तित्व देने की बात शामिल है. नेतन्याहू ने फिलिस्तीन को मान्यता देने की कोशिशों की आलोचना की है.
उनका तर्क है कि ऐसे कदम से हमास को फायदा मिल सकता है और इजराइल की सुरक्षा कमजोर हो सकती है. दूसरी ओर, मान्यता के समर्थक इसे फिलिस्तीनी लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं और शांति प्रक्रिया से जोड़ते हैं. इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के विचार बुनियादी रूप से अलग हैं. इजराइल की सरकार सुरक्षा और हमास की भूमिका को प्राथमिकता देती है. फिलिस्तीनी राज्य के समर्थक राजनीतिक अधिकारों और भविष्य की स्वतंत्रता पर जोर देते हैं. इसी वजह से मान्यता का सवाल कूटनीतिक तनाव बढ़ाता है.
गाजा युद्ध पर अलग-अलग दावे क्यों?
नेतन्याहू ने अपने भाषण में गाजा में नरसंहार के आरोपों को खारिज किया. उन्होंने कहा कि इजराइल ने नरसंहार नहीं किया, बल्कि उसे रोका. गाजा में इजराइली कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आलोचना और कानूनी बहस जारी है. इजराइल इन आरोपों से इनकार करता है और अपनी कार्रवाई को हमास के खिलाफ युद्ध बताता है. हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इजराइल पर हमला किया था.
उसके बाद इजराइल ने गाजा में सैन्य अभियान शुरू किया. इस संघर्ष में आम नागरिकों की सुरक्षा और मानवीय स्थिति को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ी. कई देशों ने युद्धविराम और सहायता पहुंचाने की मांग की. इजराइल का कहना है कि हमास नागरिक इलाकों में काम करता है और बंधकों की रिहाई जरूरी है. हमास और इजरायल के दावों के बीच आम लोगों की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है.
क्या है UN में वॉकआउट का राजनीतिक संदेश?
नेतन्याहू के भाषण के दौरान कई प्रतिनिधियों ने हॉल छोड़ दिया. ऐसा कदम कूटनीतिक विरोध का सार्वजनिक संकेत माना जाता है. नेतन्याहू ने बाहर जाने वाले प्रतिनिधियों पर तंज किया और उन्हें नैतिक रूप से कमजोर बताया. उनके समर्थकों ने भाषण के दौरान तालियां बजाईं. वॉकआउट से यह साफ हुआ कि इजराइल की नीतियों को लेकर संयुक्त राष्ट्र में मतभेद गहरे हैं. लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि सभी देश इजराइल के विरोध में एक जैसी नीति रखते हैं. हर देश का रुख उसके अपने हितों, घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय संबंधों से प्रभावित होता है.
भाषण का घरेलू और अंतरराष्ट्रीय असर
नेतन्याहू का भाषण केवल विदेश नीति का बयान नहीं था. यह इजराइल के नागरिकों और समर्थकों को दिया गया संदेश भी था. उन्होंने दिखाने की कोशिश की कि इजराइल बाहरी दबाव के बावजूद अपनी सुरक्षा नीति पर कायम रहेगा. उन्होंने अपने विरोधियों को यह संकेत दिया कि वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने पक्ष को जोर से रखेंगे.
तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस को निशाना बनाने के पीछे अलग-अलग कारण हैं. तुर्की के साथ गाजा और हमास को लेकर सीधा टकराव है. ब्रिटेन और फ्रांस से तनाव फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता तथा इजरायल की सैन्य कार्रवाई की आलोचना से जुड़ा है. इन देशों की आलोचना को नेतन्याहू इजरायल पर दबाव मानते हैं, जबकि वे देश इसे मानवीय और राजनीतिक चिंताओं के रूप में पेश करते हैं.
इस तरह कहा जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिया गया नेतन्याहू का भाषण इन मतभेदों को खत्म नहीं करता. उलटे, इससे इजराइल और उसके आलोचकों के बीच दूरी और साफ दिखती है. आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि गाजा में युद्ध और मानवीय संकट को लेकर क्या कदम उठते हैं? बंधकों और युद्धविराम पर क्या प्रगति होती है, और फिलिस्तीनी राज्य के सवाल पर देश किस तरह आगे बढ़ते हैं? फिलहाल, नेतन्याहू का संदेश साफ है.
वे आलोचना का सामना करते हुए इजरायल की सुरक्षा नीति का बचाव करेंगे. तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस का संदेश भी अलग है. वे गाजा और फिलिस्तीनी अधिकारों पर अपनी चिंता उठाते रहेंगे. इन दो रुखों के बीच संयुक्त राष्ट्र में बहस आगे भी जारी रह सकती है.






