Upgrade
पहल टाइम्स
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन
No Result
View All Result
पहल टाइम्स
No Result
View All Result
  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • ईमैगजीन
Home राष्ट्रीय

प्रतीकों के खेल में मोदी बेजोड़

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
August 21, 2022
in राष्ट्रीय
A A
1
VIEWS
Share on FacebookShare on Whatsapp

अजीत द्विवेदी

राजनीति धारणा और प्रतीकों का खेल है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि प्रतीकों के जरिए धारणा बनाने का खेल है। इस खेल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेमिसाल खिलाड़ी हैं। प्रतीकों का इस्तेमाल उनसे बेहतर कोई नहीं कर सकता है और न उन प्रतीकों से धारणा बनाने-बदलने का काम कोई उनसे अच्छा कर सकता है। उन्होंने आजादी की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर लाल किले से भाषण देते हुए एक के बाद एक कई प्रतीकों का इस्तेमाल किया और उनसे जनमानस को प्रभावित किया या करने का प्रयास किया। आजादी के अमृत वर्ष में उनकी पार्टी ने देश को पहली आदिवासी राष्ट्रपति दिया था। वह भी एक महिला के रूप में। आजादी दिवस से ठीक पहले द्रौपदी मुर्मू देश की राष्ट्रपति बनीं। यह महिला और आदिवासी दोनों प्रतीकों को चुनावी विमर्श में स्थापित करने का प्रयास था। लाल किले से भाषण में भी प्रधानमंत्री ने इसका इस्तेमाल किया।

इन्हें भी पढ़े

climate change

क्लाइमेट चेंज का सबसे ज्यादा असर झेल रहे भारत के बच्चे, UNICEF रिपोर्टसावधान!

June 25, 2026
ice of the arctic

आर्कटिक की पिघलती बर्फ में भारत तलाश रहा अपना भविष्य!

June 25, 2026
BJP and Congress

नागरिकता पर कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरा, BJP ने किया पलटवार!

June 25, 2026
UGC NET

NEET के बाद अब UGC NET में भी री-एग्जाम, क्या है पूरा मामला?

June 23, 2026
Load More

प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से अपने भाषण की शुरुआत में खासतौर पर आजादी की लड़ाई में आदिवासी योद्धाओं के योगदान और उनकी शहादत को याद किया। उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा और सिद्धो-कान्हो का नाम लिया। ये नाम आदिवासी गौरव से जुड़े हैं, उनकी अस्मिता से जुड़े हैं और उनको लोक कथाओं का हिस्सा हैं। लाल किले से शायद ही कभी किसी प्रधानमंत्री ने इनका नाम लिया होगा। वह सचमुच गर्व का क्षण था, जब ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने भगवान बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हो और सीताराम राजू का नाम लिया। सोचें, इस संबोधन से देश के आदिवासी समाज ने अपने को किस तरह से प्रधानमंत्री के साथ जुड़ा हुआ महसूस किया होगा! ध्यान रहे आदिवासी बहुल झारखंड और छत्तीसगढ़ में भाजपा बेहद कमजोर हुई है और ओडिशा में अभी अपनी जगह ही तलाश रही है। लेकिन आदिवासी राष्ट्रपति के बाद आदिवासी योद्धाओं का लाल किले से जिक्र करके प्रधानमंत्री ने उन्हें अपने साथ जोडऩे की पहल की है।

दूसरा बेहद प्रभावशाली प्रतीक, जिसे प्रधानमंत्री ने चुना वह महिलाओं का है। उन्होंने बहुत भावुक और कुछ हद तक असहज होते हुए नारी के अपमान की बात कही। उनका भावुक और असहज होना बड़ा स्वाभाविक था लेकिन अगर वह अभिनय था तो बेहद दमदार था। उन्होंने कहा कि पता नहीं कैसे नारी का अपमान हमारी बोलचाल से लेकर सहज स्वभाव का हिस्सा हो गया है। प्रधानमंत्री का इसके लिए आभार व्यक्त किया जाना चाहिए कि उन्होंने लाल किले से यह बात कही। सोचें, किस तरह से नारी का अपमान भारतीय समाज में स्वीकार्य हो गया है। नारी के सम्मान में सैकड़ों श्लोक और कविताएं लिखी गईं हैं लेकिन लगभग सारी गालियां भी स्त्रियों को लेकर ही बनी हैं। अगर प्रधानमंत्री की अपील से जरा सा भी बदलाव आता है तो वह बहुत बड़ी बात होगी। अब सवाल है कि प्रधानमंत्री ने जो कहा उसे प्रतीकात्मक क्यों माना जाए? इसलिए क्योंकि वास्तविकता कुछ और है। प्रधानमंत्री ने खुद विपक्ष की महिला नेताओं- सोनिया गांधी, रेणुका चौधरी, ममता बनर्जी और दिवंगत सुनंदा पुष्कर के बारे में ऐसी ऐसी बातें कहीं हैं, जो किसी भी स्त्री के लिए अपमानजनक है। उनकी पार्टी और सरकार स्त्रियों के प्रति कैसा भाव रखती है यह आजादी दिवस के भाषण के अगले ही दिन पता चल गया, जब गुजरात में एक गर्भवती स्त्री से बलात्कार करने और उसकी नवजात बच्ची सहित कई लोगों की हत्या करने के दोषियों को जेल से रिहा कर दिया गया।

तीसरा प्रतीक परिवारवाद का है। परिवारवाद राजनीति की या समाज की एक बुराई हो सकती है लेकिन प्रधानमंत्री के लिए यह प्रतीकात्मक ही है क्योंकि उनको सिर्फ विपक्षी पार्टियों के नेताओं का परिवारवाद दिखता है। किसी न किसी राजनीतिक परिवार से जुड़े दर्जनों नेता इस समय भाजपा में भी हैं। वे सांसद हैं, विधायक हैं, केंद्र व राज्य सरकार में मंत्री हैं और यहां तक कि मुख्यमंत्री भी हैं। लेकिन उसमें प्रधानमंत्री को कोई बुराई नहीं दिखती है। भाजपा की कई सहयोगी पार्टियां राजनीतिक परिवारों की हैं, जिनका नेतृत्व एक ही परिवार की दूसरी या तीसरी पीढ़ी कर रही है। लेकिन उसमें भी कोई दिक्कत नहीं है। इतना होते हुए भी प्रधानमंत्री इतनी जोर से परिवारवाद के खिलाफ बोलते हैं कि सबको लगता है कि यह आदमी कुछ भी हो सकता है परिवारवादी नहीं होगा। उन्हें और उनकी पार्टी को लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी यादव का उप मुख्यमंत्री बनना परिवारवादी लगता है लेकिन चौधरी देवीलाल के पड़पोते, ओमप्रकाश चौटाला के पोते और अजय चौटाला के बेटे दुष्यंत चौटाला का उप मुख्यमंत्री बनना लोकतांत्रिक लगता है! उन्हें मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव का मुख्यमंत्री बनना परिवारवादी लगता है लेकिन दोरजी खांडू के बेटे पेमा खांडू का मुख्यमंत्री बनना लोकतांत्रिक लगता है। इस किस्म की अनगिनत मिसालें हैं, सब लिखने की जरूरत नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने परिवारवाद के प्रतीक का इस्तेमाल विपक्ष को बैकफुट पर लाने के लिए सफलतापूर्वक किया है।

भ्रष्टाचार का विरोध भी ऐसी ही प्रतीकात्मक राजनीति का हिस्सा है। उन्होंने लाल किले के अपने भाषण में भ्रष्टाचार पर हमला बोलते हुए यहां तक कह दिया कि लोग भ्रष्टाचारियों से नफरत करें। बुद्ध से लेकर गांधी तक कहते रहे हैं कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं। लेकिन प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचारियों से घृणा करने की बात कही। यह अलग बात है कि भ्रष्टाचार के कितने ही आरोपी भाजपा में शामिल हो गए और पार्टी ने उनसे नफरत करने की बजाय उनको गले लगा लिया। ऐसे नेताओं की संख्या उंगलियों पर नहीं गिनी जा सकती है, जिनके खिलाफ पहले केंद्रीय एजेंसियों की जांच चल रही थी, छापे पड़े थे और वे भाजपा में शामिल हो गए तो सारी प्रक्रिया थम गई। भ्रष्टाचार के लडऩे का यह सेलेक्टिव तरीका इस सरकार की पहचान बन गया है। फिर भी प्रधानमंत्री ने बहुत ऊंची आवाज में और बहुत ऊंची जगह से भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेडऩे और उसमें जनता से सहयोग करने की अपील की। वास्तविकता अपनी जगह है कि लेकिन यह अपील देश के करोड़ों नागरिकों के कान में गूंजती रहेगी। प्रधानमंत्री ने भाषा से लेकर विरासत तक के प्रतीकों का इस्तेमाल किया और इतने शानदार तरीके से किया कि विपक्ष काफी समय तक हकबकाया रहा कि इसका कैसे जवाब दें। विपक्ष की मुश्किल यह है कि वह इन प्रतीकों का तिलिस्म उजागर करने में नाकाम हो रहा है, उलटे इसी तिलिस्म में उलझ जा रहा है।

इन्हें भी पढ़ें

  • All
  • विशेष
  • लाइफस्टाइल
  • खेल

नियोक्ता संघों की भूमिका को मजबूत करने पर विचार-विमर्श करती है भारतीय नियोक्ता परिषद

February 11, 2023
MSP

MSP की कानूनी गारंटी वित्तीय संकट का द्वार खोल देगा…

February 15, 2024
UNSC

पाकिस्तान की UNSC अध्यक्षता… भारत के खिलाफ चाल नाकाम, आतंकवाद पर फिर बेनकाब!

July 2, 2025
पहल टाइम्स

पहल टाइम्स का संचालन पहल मीडिया ग्रुप्स के द्वारा किया जा रहा है. पहल टाइम्स का प्रयास समाज के लिए उपयोगी खबरों के प्रसार का रहा है. पहल गुप्स के समूह संपादक शूरबीर सिंह नेगी है.

Learn more

पहल टाइम्स कार्यालय

प्रधान संपादकः- शूरवीर सिंह नेगी

9-सी, मोहम्मदपुर, आरके पुरम नई दिल्ली

फोन नं-  +91 11 46678331

मोबाइल- + 91 9910877052

ईमेल- pahaltimes@gmail.com

Categories

  • Uncategorized
  • खाना खजाना
  • खेल
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • दिल्ली
  • धर्म
  • फैशन
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • लाइफस्टाइल
  • विशेष
  • विश्व
  • व्यापार
  • साक्षात्कार
  • सामाजिक कार्य
  • स्वास्थ्य

Recent Posts

  • RBI ने बदले डिजिटल पेमेंट फ्रॉड के नियम, ऐसे मिलेगा मुआवजा
  • दिल्ली : MCD पार्किंग में बनेंगे बड़े EV चार्जिंग हब, मिलेगी बैटरी बदलने की भी सुविधा
  • मिर्जापुर का नया पोस्टर रिलीज, जानें कब आएगा फिल्म का टीजर

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.

  • होम
  • दिल्ली
  • राज्य
  • राष्ट्रीय
  • विश्व
  • धर्म
  • व्यापार
  • खेल
  • मनोरंजन
  • गैजेट्स
  • जुर्म
  • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • फैशन
    • यात्रा
  • विशेष
    • साक्षात्कार
  • ईमैगजीन

© 2021 पहल टाइम्स - देश-दुनिया की संपूर्ण खबरें सिर्फ यहां.