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Home दिल्ली

बरी होने के बाद क्या सीबीआई के खिलाफ केस कर सकते हैं केजरीवाल, जानें क्या हैं नियम?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
February 27, 2026
in दिल्ली, राजनीति
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Kejriwal
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नई दिल्ली: दिल्ली की 2022-23 एक्साइज पॉलिसी से जुड़े मामले में अदालत से बरी होने के बाद दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री रहे अरविंद केजरीवाल ने कहा कि उनके खिलाफ फर्जी केस बनाया गया था. उन्होंने आरोप लगाया कि यह राजनीतिक साजिश थी. यह मामला CBI ने दर्ज किया था. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बरी होने के बाद कोई व्यक्ति सीबीआई के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकता है.

क्या कोई भी कर सकता है केस?

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कानून के जानकारों के अनुसार, बरी होना अपने आप में सीबीआई पर केस करने का अधिकार नहीं देता है, लेकिन इससे कुछ कानूनी रास्ते खुलते हैं. इन रास्तों पर आगे बढ़ने के लिए यह साबित करना जरूरी होता है कि जांच सिर्फ कमजोर नहीं थी, बल्कि दुर्भावना या बिना उचित आधार के की गई थी.

मुआवजा मांग सकते हैं

अगर कोई व्यक्ति यह मानता है कि उसके खिलाफ जानबूझकर गलत केस बनाया गया, तो वह मैलिशियस प्रोसिक्यूशन. यानी दुर्भावनापूर्ण अभियोजन का सिविल केस दायर कर सकता है. इसमें वह अपनी बदनामी, मानसिक पीड़ा और कानूनी खर्च के लिए मुआवजा मांग सकता है. इसके लिए दो मुख्य बातें साबित करनी होती हैं- पहली, एजेंसी के पास केस दर्ज करने के लिए उचित और संभावित कारण नहीं था. दूसरी, केस किसी गलत मंशा से किया गया हो.

ऐसा केस आमतौर पर बरी होने के एक साल के भीतर दायर करना होता है. इसके अलावा, सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के तहत सरकार या संबंधित एजेंसी को पहले नोटिस देना जरूरी होता है.

झूठे आरोप पर आपराधिक शिकायत

भारतीय दंड संहिता की धारा 182 और 211 के तहत झूठी सूचना देना या किसी को नुकसान पहुंचाने के इरादे से गलत आपराधिक मामला दर्ज कराना अपराध है. अगर कोई व्यक्ति यह साबित कर दे कि जांच एजेंसी ने जानबूझकर झूठे सबूत बनाए या बिना किसी कानूनी आधार के केस दर्ज किया, तो आपराधिक शिकायत की जा सकती है.

हालांकि, केंद्रीय एजेंसियां कानून के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करती हैं, इसलिए उनके खिलाफ ऐसे मामलों में सफलता पाना आसान नहीं होता है. अदालत में ठोस सबूत देना जरूरी होता है.

गलत अभियोजन पर मुआवजा

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 250 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 273 के तहत अदालत मुआवजा दे सकती है, अगर उसे लगे कि आरोप झूठे और परेशान करने वाले थे. यह मुआवजा उसी अदालत द्वारा दिया जाता है, जिसने केस की सुनवाई की हो. इसके लिए अदालत को स्पष्ट रूप से यह कहना होगा कि आरोप बेबुनियाद थे और शिकायत गलत मंशा से की गई थी.

संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन पर याचिका

अगर जांच के दौरान मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन हुआ हो, जैसे गैरकानूनी हिरासत या बुनियादी अधिकारों का हनन, तो उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के तहत या सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की जा सकती है. इसमें मुआवजा और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की जा सकती है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट रूप से अधिकारों के उल्लंघन को साबित करना जरूरी है.

क्या सिर्फ बरी होना ही काफी है?

कानूनी स्थिति साफ है कि सिर्फ बरी होना पर्याप्त नहीं है. अदालत कई बार सबूतों की कमी के कारण भी बरी करती है. इसका मतलब यह नहीं होता कि जांच एजेंसी ने जानबूझकर गलत काम किया हो. अगर कोई व्यक्ति एजेंसी के खिलाफ केस करना चाहता है, तो उसे यह दिखाना होगा कि जांच में दुर्भावना थी, उचित आधार नहीं था या कानून का गंभीर उल्लंघन हुआ हो.

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