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क्या वाकई पाकिस्तान से करतारपुर गुरुद्वारा छीन सकता था भारत?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 28, 2024
in राष्ट्रीय
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Kartarpur
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नई दिल्ली। पंजाब के पटटटियाला में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए, भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है, कि अगर वह साल 1971 में प्रधानमंत्री होते, तो वह सुनिश्चित करते, कि 1971 की लड़ाई के बाद 90,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों की रिहाई से पहले, भारत करतारपुर साहिब गुरुद्वारा पर अपना ‘कब्जा’ ले लेता।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के सांतवें और आखिरी चरण से पहले विरोधियों के खिलाफ करतारपुर साहिब गुरुद्वारा को लेकर एक और चुनावी चाल चली है। हालांकि, इसका कितना असर होगा, ये चुनावी नतीजों में दिखेगा, लेकिन आइये जानते हैं, कि प्रधानमंत्री मोदी किस बारे में बात कर रहें हैं और क्या वाकई भारत, पाकिस्तान से गुरुद्वारे ले पाता?

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करतारपुर साहिब गुरुद्वारा के पास 1971 में क्या हुआ था?

1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, पाकिस्तान के करतारपुर साहिब गुरुद्वारे से कुछ ही दूरी पर पंजाब के डेरा बाबा नानक सेक्टर में भारतीय और पाकिस्तानी सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ था। गुरु नानक देव से जुड़ा गुरुद्वारा, भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज 2.46 किलोमीटर दूर स्थित है।

हालांकि, डेरा बाबा नानक सेक्टर में भारतीय सैनिकों की लड़ाई का मकसद, गुरुद्वारे के पास एक पाकिस्तानी इलाके पर कब्जा करना और पाकिस्तानी सेना को रावी नदी पर बने एक रेल-रोड पुल तक पहुंचने से रोकने को लेकर थी, जो उन्हें डेरा बाबा नानक शहर तक सीधी पहुंच प्रदान करता था। ये रेल-रोड ब्रिज बाकी के पंजाब के लिए कनेक्टिविटी प्रदान करता है।

डेरा बाबा नानक सेक्टर में लड़ाई कैसे आगे बढ़ी?

भारतीय सेना की जालंधर-मुख्यालय वाली 11 कोर, उत्तर में डेरा बाबा नानक एन्क्लेव से लेकर राजस्थान में अनूपगढ़ के दक्षिण तक फैले क्षेत्र की रक्षा के लिए जिम्मेदार थी। डेरा बाबा नानक एन्क्लेव की रक्षा के लिए अमृतसर मुख्यालय वाली 15 डिवीजन जिम्मेदार थी, और 86 इन्फैंट्री ब्रिगेड को क्षेत्र में तैनात किया गया था।

86 इन्फैंट्री ब्रिगेड को रावी नदी के पार भारतीय क्षेत्र के एक हिस्से कस्सोवाल एन्क्लेव से किसी भी पाकिस्तानी खतरे को रोकने की जिम्मेदारी दी गई थी, जो क्षेत्र में भारतीय सुरक्षा पर हमला करने के लिए पाकिस्तानी सेना को एक तैयार लॉन्चपैड प्रदान कर सकता था। इसके अलावा, ब्रिगेड को जस्सर एन्क्लेव में पाकिस्तानी डिफेंस पर हमला करना था, ताकि रेल-रोड पुल की रक्षा की जा सके और किसी भी संभावित पाकिस्तानी खतरे को हराया जा सके।

इस संबंध में किसी किताब में ऐसा दावा नहीं किया गया है, कि जो बताता हो, कि ऐतिहासिक गुरुद्वारे पर कब्जा, डेरा बाबा नानक ब्रिगेड के लिए एक सैन्य उद्देश्य था, जो क्रमशः भारत और पाकिस्तान से संबंधित रावी के उत्तर और दक्षिण के दो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण परिक्षेत्रों पर केंद्रित था।

भारतीय सेना जस्सर एन्क्लेव में पाकिस्तानी सेना पर काबू पाने में सक्षम थी, जिसकी रक्षा पाकिस्तानी रेंजर्स की अर्धसैनिक बल कर रही थी। 5-6 दिसंबर 1971 की मध्यरात्रि को जब भारतीय सैनिकों ने हमला किया तो पाकिस्तानी सेना के कमांडर, कंपनी मुख्यालय पर मौजूद नहीं थे।

86 इन्फैंट्री ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर गौरी शंकर, जो क्षेत्र में ऑपरेशन के लिए जिम्मेदार थे, उन्हें 6 दिसंबर की सुबह तक पाकिस्तानी जस्सर/डेरा बाबा नानक एन्क्लेव को खत्म करने का आदेश दिया गया था।

यह काम 10 डोगरा और 1/9 गोरखा राइफल्स के सैनिकों ने पूरा किया, जिसमें 71 बख्तरबंद रेजिमेंट और आर्टिलरी के टैंक शामिल थे। ब्रिगेड ने करतारपुर साहिब गुरुद्वारा, जो कि भारतीय सैनिकों की कंट्रोल में आ गया था, उसपर कब्जा करने के लिए एन्क्लेव पर कब्जा करने के लिएआगे बढ़ने की कोशिश नहीं की।

इंडियन डिफेंस रिव्यू में इस लड़ाई पर लिखते हुए, मेजर जनरल सुखवंत सिंह (सेवानिवृत्त) ने कहा, “ऊपर से देखने पर, यह ऑपरेशन ‘मूंगफली को हथौड़े से कुचलने’ जैसा लगता है, लेकिन रणनीतिक महत्व को देखते हुए एन्क्लेव में, भारतीय योजनाकार कोई रिस्क नहीं ले सकते थे।”

हालांकि, मेजर जनरल सुखवंत सिंह (सेवानिवृत्त) ने भी गुरुद्वारे पर कब्ज़ा करने के किसी इरादे का कोई जिक्र नहीं किया।

गुरुद्वारे पर कब्ज़ा करने का मतलब क्या होता?

1971 की लड़ाई में भारतीय सैनिकों के करतारपुर साहिब गुरुद्वारा वाले हिस्से पर अपना कंट्रोल कर दिया था और पूरे एन्क्लेव से पाकिस्तानी खतरे को पूरी तरह से खत्म कर दिया था। करतारपुर साहिब गुरुद्वारा पर कब्जा करने के लिए भारतीय सैनिकों को सिर्फ एक किलोमीटर और आगे बढ़ना था और गुरुद्वारे वाले क्षेत्र से पाकिस्तान की सेना पूरी तरह से हट चुकी थी, लेकिन इंडियन आर्मी को जो आदेश मिले थे, उसके तहत सिर्फ एन्क्लेव पर ही कब्जा करना था।

माना जाता है, कि अगर करतारपुर साहिब गुरुद्वारा पर कब्जा किया जाता, तो ये युद्ध को आगे बढ़ा सकता था और उस वक्त भारत इस क्षेत्र में युद्ध को बढ़ाना नहीं चाहता था, क्योंकि पूरा फोकस बांग्लादेश की तरफ था, लिहाजा जम्मू और कश्मीर के कुछ विवादित क्षेत्रों को छोड़कर, भारत ने युद्ध के दौरान पाकिस्तान के किसी भी क्षेत्र पर कब्जा नहीं किया।

विभाजन में गुरुद्वारा पाकिस्तान की ओर कैसे चला गया?

पंजाब सीमा आयोग, जिसने विभाजन के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा खींची थी, उसने तत्कालीन गुरदासपुर जिले की चार तहसीलों को हिंदू/सिख और मुस्लिम आबादी के आधार पर दोनों देशों के बीच विभाजित किया था।

शकरगढ़ तहसील, जिसमें गुरुद्वारा आ रहा था, वो पाकिस्तान को दे दी गई, जबकि गुरदासपुर, बटाला और पठानकोट तहसीलें भारत को दे दी गईं। कांग्रेस ने पंजाब सीमा आयोग के सामने एक आवेदन दिया था और गुरु नानक के जन्मस्थान ननकाना साहिब और शेखूपुरा में गुरु नानक से जुड़े एक अन्य गुरुद्वारे सच्चा सौदा के साथ-साथ करतारपुर को पंजाब में शामिल करने की मांग की थी। लेकिन, भारत की इस मांग को सीमा आयोग ने नजरअंदाज कर दिया।

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