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भारतीय क्रूज मिसाइल खरीदने के लिए लाइन में लगे देश… जानिए क्यों दीवानी बनी है दुनिया?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
February 24, 2024
in राष्ट्रीय
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hypersonic missile
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नई दिल्ली: भारत और रूस ने एक ऐसा मिसाइल तैयार किया है, जिसे खरीदने के लिए कई देश लाइन में लगे हुए हैं। इस मिसाइल का नाम है ब्रह्मोस, जो एक क्रूज मिसाइल है और इसका निर्माण भारत में ही किया जाता है। भारत पहले ही ब्रह्मोस मिसाइल दक्षिण चीन सागर में चीन के दुश्मन फिलीपींस को बेच चुका है, लेकिन इसकी डिमांड लगातार बढ़ती जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने के लिए सऊदी अरब, भारत से बात कर रहा है और अगर ये डील हो जाती है, तो ये ब्रह्मोस मिसाइल के आयात-निर्यात को लेकर अभी तक की सबसे बड़ी डील होगी। जबकि, इंडोनेशिया भी भारतीय ब्रह्मोस खरीद सकता है।

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इकोनॉमिक टाइम्स (ईटी) की रिपोर्ट में दावा किया गया है, कि इंडोनेशिया के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति प्रबोवो सुबिआंतो, ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने में काफी दिलचस्पी रखते हैं। इसके अलावा, नई दिल्ली की ओर से वियतनाम को ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल और अन्य रक्षा सामान बेचने की भी पेशकश की गई है।

ब्रह्मोस मिसाइल में किन देशों की दिलचस्पी?

भारत ने साल 2025 तक 35,000 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात हासिल करने का लक्ष्य रखा है। लिहाजा, अगर ब्रह्मोस मिसाइल डील पक्की होती है, तो भारत काफी आसानी से अपने लक्ष्य को हासिल कर सकता है। जैसे-जैसे नये नये देश ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, वैसे वैसे भारतीय सुपरसोनिक मिसाइल अपनी अविश्वसनीय यात्रा को और आगे बढ़ा रहा है।

ब्रह्मोस मिसाइल की विकास यात्रा

भारत ने 1990 के दशक में क्रूज मिसाइलों की जरूरत महसूस की थी और इसके बाद ही ब्रह्मोस मिसाइल के निर्माण को लेकर कोशिशें शुरू की गई। लेकिन, जब खाड़ी युद्ध में क्रूज मिसाइलों को तैनात किया गया, उसके बाद नई दिल्ली ने तय किया, कि देश की रक्षा के लिए क्रूज मिसाइल सिस्टम की तैनाती करना अत्यधिक आवश्यक है।

जिसके बाद फरवरी 1998 में मॉस्को में तत्कालीन रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) प्रमुख डॉ एपीजे अब्दुल कलाम और तत्कालीन रूसी उप रक्षा मंत्री एनवी मिखाइलोव के बीच एक अंतर-सरकारी समझौते पर संयुक्त रूप से क्रूज मिसाइल के निर्माण के लिए हस्ताक्षर किए गए।

ब्रह्मोस नाम भारतीय ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्कवा नदियों से लिया गया है। 1998 के समझौते के तहत, ब्रह्मोस एयरोस्पेस का निर्माण हुआ, जो डीआरडीओ और एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया (एनपीओएम) के बीच एक संयुक्त उद्यम था। इसका उद्देश्य सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली का डिजाइन, विकास और निर्माण करना था।

12 जून 2001 को ब्रह्मोस मिसाइल का पहली बार ओडिशा के चांदीपुर में भूमि-आधारित लॉन्चर से टेस्ट किया गया था। तब से, मिसाइल के अलग अलग वेरिएंट बनाए जा चुके हैं और इसे कई बार अपग्रेड किया गया है। अभी ब्रह्मोस के नये वर्जन का निर्माण चल रहा है, जिसकी मारक क्षमता और स्पीड और भी ज्यादा होगी।

ब्रह्मोस मिसाइल की क्षमता

सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस की मारक क्षमता 292 किलोमीटर है और इसके नये वेरिएंट की मारक क्षमता 500 किलोमीटर तक किया जा रहा है। इस मिसाइल में इतनी खूबियां हैं कि कई छोटे देशों के लिए ब्रह्मोस मिसाइल फायदे का सौदा साबित हो रहा है।

भारत सरकार ने 2025 तक ब्रह्मोस मिसाइल बेचकर 5 बिलियन डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन उससे पहले ही इस ऑर्डर को पार करने की संभावना है। ब्रह्मोस का निर्माण हैदराबाद में हुआ है और इसकी रिपेयरिंग और मेंटिनेंस हैदराबाद में किया जाता है, साथ ही इसके क्रूशियल पार्ट्स रसियन हैं। इसमें लगा इंजन और रडार सिस्टम रूस का है जो बेहद खतरनाक माना जाता है।

ब्रह्मोस मिसाइल के अलग अलग वेरिएंट हैं और इसे पनडुब्बी से, पानी के जहाज से, किसी विमान से या फिर जमीन पर किसी भी चलते हुए ऑब्जेक्ट से फायर किया जा सकता है। यह मिसाइल रूस की पी-800 ओकिंस क्रूज मिसाइल टेक्नोलॉजी पर आधारित है और दुनिया में मौजूद चुनिंदा रडार सिस्टम ही इसे ट्रैक कर सकते हैं।

पिछले साल नवंबर में, भारतीय नौसेना ने बंगाल की खाड़ी में अपने युद्धपोत से विस्तारित दूरी की ब्रह्मोस मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इसे पूर्वी बेड़े द्वारा एक गुप्त विध्वंसक से लॉन्च किया गया, प्रक्षेप्य ने अपने लक्ष्य को सटीक रूप से मारा, जिससे भारतीय नौसेना में शामिल होने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

ब्रह्मोस को स्पेशल कौन सी क्षमता बनाता है?

ब्रह्मोस, दक्षिण पूर्व एशिया और अफ्रीका सहित अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी लोकप्रियता हासिल कर रहा है। कथित तौर पर पश्चिम एशिया के कई देशों ने भी इसमें रुचि दिखाई है।

ब्रह्मोस के बढ़ते वैश्विक आकर्षण के बारे में स्पुतनिक इंडिया से बात करते हुए, भारतीय नौसेना के अनुभवी शेषाद्री वासन ने कहा, कि “ब्रह्मोस दुनिया का ‘सुपरसोनिक डार्लिंग’ है, क्योंकि एक बार जब यह मैक-3 गति के साथ सुपरसोनिक मोड में चला जाता है, तो यह दुश्मन को बचने का बहुत कम समय देता है।”

ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने हाल ही में खुलासा किया है, कि मिसाइल के ऑर्डर का पोर्टफोलियो 7 अरब डॉलर के आंकड़े को छू गया है। कंपनी के निर्यात निदेशक प्रवीण पाठक ने इस महीने की शुरुआत में रियाद में वर्ल्ड डिफेंस शो में कहा था, कि “ब्रह्मोस के ऑर्डर का पोर्टफोलियो पहले ही 7 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जिसमें भारतीय और निर्यात दोनों ऑर्डर शामिल हैं।”

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिकों का कहना है, कि इस मिसाइल प्रणाली की सटीकता और बहुमुखी प्रतिभा इसे अद्वितीय बनाती है।

वासन ने स्पुतनिक इंडिया को बताया है, कि “ब्रह्मोस की बहुआयामी क्षमताओं के अलावा, जब भी भारत ने परीक्षण किया है, इसने 100 प्रतिशत परिणाम दिए हैं।”

डीआरडीओ के एक पूर्व वैज्ञानिक का मानना है, कि ब्रह्मोस प्रोजेक्टाइल की विशेषताएं इसे अलग बनाती हैं। डीआरडीओ के रिटायर्ड वैज्ञानिक रवि गुप्ता ने स्पुतनिक इंडिया को बताया, “किसी को ब्रह्मोस का कोई समानांतर नहीं मिलेगा और जो भी सशस्त्र बल अपने शस्त्रागार में रखेंगे, यह उन्हें अपने विरोधियों पर बढ़त देगा।”

सबसे खास बात ये है कि ब्रह्मोस मिसाइल थल सेना, वायु सेना और जल सेना तीनों के काम आता है। ब्रह्मोस 10 मीटर की ऊंचाई पर भी उड़ान भरने में सक्षम है और दुनिया की कोई रडार इसे पकड़ नहीं सकती है। रडार ही नहीं किसी भी मिसाइल डिटेक्टिव प्रणाली को धोखा देने में ब्रह्मोस मीलों आगे है और इसको मार गिराना करीब करीब असम्भव है।

ब्रह्मोस मिसाइल अमेरिका की टॉम हॉक से करीब दुगनी रफ्तार से वार करने में सक्षम है। भारत सरकार ने अगले 10 साल में करीब 2 हजार ब्रह्मोस मिसाइल बनाने का लक्ष्य रखा है और ब्रह्मोस मिसाइलों को रूस से लिए गये सुखोई विमानों में लगाया जाएगा।

 

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