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दुनिया को मंदी के भंवर में न फंसा दे डोनाल्ड ट्रंप की जिद!

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
April 7, 2025
in विश्व
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नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से छेड़े गए टैरिफ वॉर की आंच में पूरी दुनिया झुलसने लगी है। ट्रंप जिसे कड़वी ‘दवा’ बता रहे, उससे दुनियाभर के बाजारों में कोहराम मचा हुआ है। भारत में सोमवार को बाजार खुलते ही सेंसेक्स 3000 तो निफ्टी 1000 अंक से ज्यादा टूट गए। निवेशकों के 19 लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गए हैं। यही हाल दुनियाभर के बाजारों का है। अमेरिका भी अछूता नहीं है। शुक्रवार को अमेरिका के सभी तीन प्रमुख स्टॉक इंडेक्स 5 प्रतिशत से ज्यादा गिर गए। अमेरिका के बैंकिंग दिग्गज जेपी मोर्गन की भविष्यवाणी तो बहुत डराने वाली है।

इस बात की 60 प्रतिशत आशंका है कि अमेरिका और पूरी दुनिया में मंदी की चपेट में आ जाए। ये भी एक संयोग है कि 1930 के महामंदी यानी ग्रेट डिप्रेशन के वक्त भी अमेरिका की अति संरक्षणवादी नीति और आयात पर टैरिफ बढ़ाए जाने से हालात और बिगड़े थे। 1930 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर ने स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट को लागू किया था जिसके तहत 20,000 से ज्यादा सामानों के आयात पर 20 प्रतिशत तक टैरिफ बढ़ा दिया। जवाब में कई देशों ने भी अमेरिका से आयात पर टैरिफ लगा दिया।

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टैरिफ वॉर ने आग में घी का काम किया और महामंदी बद से बदतर हो गई। हालात इतने बिगड़ गए कि अमेरिका समेत दुनियाभर में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, महंगाई चरम पर पहुंच गई, बैंक फेल होने लगे, वैश्विक अर्थव्यस्था की कमर टूट गई। आइए जानते हैं आखिर क्या था स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट और क्या ट्रंप भी वही गलती कर रहे हैं जो कभी हर्बर्ट हूवर ने की थी।

क्यों लाया गया स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट?

‘अमेरिका फर्स्ट’ और ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ की हुंकार भर रहे डोनाल्ड ट्रंप आज जिस अति संरक्षणवादी रुख पर चल रहे हैं, 1930 में भी तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर भी इसी राह पर चले थे। फायदा तो नहीं हुआ लेकिन इसने ट्रेड वॉर को जन्म दिया जिससे पहले से चल रही वैश्विक मंदी की स्थिति ने विकराल रूप ले लिया। स्मूट-हॉले एक्ट को अमेरिकी कारोबार और किसानों को मदद पहुंचाने के उद्देश्य से लाया गया था। वो प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वाला दौर था। 1920 के दशक में यूरोप के किसान तो प्रथम विश्व युद्ध के नकारात्मक प्रभाव से उबर चुके थे लेकिन अमेरिकी किसान जूझ रहे थे।

यूरोप में कृषि उत्पादन बहुत ज्यादा होने की वजह से कीमतें घट गईं। तगड़े कंपटिशन की वजह से अमेरिकी किसानों की हालत खराब हो चुकी थी। कम कीमतों की वजह से अमेरिकी किसानों की लागत तक निकलनी मुश्किल हो गई। तब कृषि क्षेत्र से जुड़े लॉबिस्टों ने एग्रिकल्चरल इम्पोर्ट से सुरक्षा के लिए सरकार से दखल की मांग करने लगे। 1928 के चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार हर्बर्ट हुवर ने अपने कैंपेन के दौरान वादा किया कि वह किसानों के तारणहार बनेंगे। कृषि से जुड़ी वस्तुओं के आयात पर टैरिफ बढ़ाएंगे।

राष्ट्रपति चुनाव में हुवर की जीत हुई। संयोग से 1929 में अमेरिकी शेयर बाजार बुरी तरह टूट गए। आगे उसकी भी कहानी बताएंगे कि कैसे शेयर बाजार में हाहाकार से महामंदी की एक तरह से नींव पड़ गई थी। स्टॉक मार्केट क्रैश के बाद हुवर का ‘अति संरक्षणवाद’ वाला कीड़ा ऐसा कुलबुलाया कि उन्होंने कानून बनाकर दुनियाभर से आयात होने वाले तमाम सामानों पर टैरिफ बढ़ा दिया।

क्या था स्मूट-हॉले टैरिफ?

एग्रिकल्चरल और इंडस्ट्रियल गुड्स के आयात पर जिस कानून के तहत टैरिफ बढ़ाया गया, उसका नाम था यूनाइटेड स्टेट्स टैरिफ एक्ट 1930। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर ने 17 जून 1930 पर इस पर दस्तखत किए। इस कानून के तहत 20 हजार के करीब वस्तुओं के आयात पर टैरिफ 20 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया। एग्रिकल्चरल गुड्स पर पहले से ही हाई इम्पोर्ट ड्यूटी था जो टैरिफ बढ़ने की वजह से आसमान छूने लगा। तब दुनियाभर के 1000 से ज्यादा अर्थशास्त्रियों ने राष्ट्रपति हूवर को इसके खिलाफ आगाह किया था लेकिन वह चेतावनियों को नजरअंदाज कर गए।

स्मूट-हार्ले टैरिफ नाम क्यों पड़ा?

कानून का नाम वैसे तो यूनाइटेड स्टेस्ट टैरिफ एक्ट था लेकिन उसे स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट के तौर पर जाना जाता है। ये नाम इस कानून के चीफ स्पॉन्सरों के नाम पर पड़ा। इनमें से एक थे यूटा प्रांत से सीनेटर रीड स्मूट और जो सीनेट फाइनेंस कमिटी के चेयरमैन थे। दूसरे चीफ स्पॉन्सर थे ओरेगॉन से सांसद विलिस हॉले। दोनों के नाम को जोड़कर इस कानून को स्मूट-हॉले कानून के रूप में जाना गया।

जवाबी टैरिफ से ट्रेड वॉर, ठहर गया अंतरराष्ट्रीय व्यापार

अमेरिका की तरफ से आयात पर टैरिफ बढ़ाने के जवाब में 25 से ज्यादा देशों ने अमेरिकी सामानों पर भी टैरिफ बढ़ा दिया। अमेरिका की तरफ से टैरिफ और उसके बाद तमाम देशों की तरफ से जवाबी टैरिफ से ट्रेड वॉर छिड़ गई। दुनिया पहले ही महामंदी की चपेट में थी, ऊपर से अमेरिका की तरफ से टैरिफ वॉर ने कोढ़ में खाज का काम किया। जल्द ही 25 से ज्यादा देशों ने अमेरिका पर जवाबी टैरिफ लगा दिया। इससे अमेरिकी निर्यात में भी भारी गिरावट दर्ज की गई। अंतरराष्ट्र व्यापार एक तरह से ठप पड़ गया। देशों के लिए अमेरिका को सामान बेचना मुश्किल हो गया। यूएस में आयात इतना मुश्किल हो गया कि सुपर रिच को छोड़कर किसी अन्य के लिए आयात के बारे में सोचना तक मुश्किल हो गया। 1929 से 1934 के बीच अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 65 प्रतिशत तक गिरावट आ गई।

महामंदी वाली टाइमिंग

स्मूट-हॉले टैरिफ की टाइमिंग ऐसी थी कि हालात नियंत्रण से बाहर होते चले गए। ये कानून उस वक्त लागू हुआ जब वैश्विक मंदी की पहले ही शुरुआत हो चुकी थी। महामंदी की शुरुआत सबसे पहले अमेरिका में 1929 में हुई थी जो जल्द ही पूरी दुनिया में फैल गई। यह आधुनिक इतिहास में सबसे भीषण और सबसे ज्यादा समय तक चलने वाली वैश्विक मंदी थी।

महामंदी का विकराल रूप, अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी हो गई धराशायी

स्मूट-हॉले टैरिफ से महामंदी ने और विकराल रूप धर लिया। 1929 से 1933 के बीच में अमेरिका का इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन 47 प्रतिशत तक गिर गया। जीडीपी में 30 प्रतिशत की गिरावट आई। प्रोडक्शन तो गिरा ही, कीमतें भी 33 प्रतिशत गिर गईं यानी अपस्फीति वाली स्थिति पैदा हो गई। बेरोजगारी चरम पर पहुंच गई। बैंक फेल होने लगे। टैरिफ वॉर की शुरुआत के बाद अगले 3 साल में 20 प्रतिशत बैंक ध्वस्त हो गए। अमेरिका के साथ-साथ दुनियाभर के तमाम देशों की अर्थव्यवस्था धड़ाम हो गई। इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन और कीमतों में नाटकीय गिरावट आई। दुनियाभर में भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी बढ़ गई। लोग बेघर हो गए।

स्टॉक मार्केट पर लगाम से पड़ी महामंदी की नींव

जैसा कि ऊपर जिक्र है कि महामंदी यानी ग्रेट डिप्रेशन की शुरुआत 1929 में अमेरिका से ही हुई थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उसकी नींव डालने में स्टॉक मार्केट पर लगाम की कोशिश का बड़ा हाथ था। 1920 का दशक अमेरिका के लिए वैसे तो समृद्धि का रहा था। पूरे दशकभर कीमते लगभग स्थिर रहीं। 1924 और 1927 में जरूर आर्थिक सुस्ती वाला माहौल रहा। स्टॉक मार्केट कुलाचे भर रहा था। 1929 में मार्केट अपने पीक के वक्त 1921 के निचले स्तर से करीब 4 गुना बढ़ चुका था। स्टॉक प्राइसेज में तेजी से बढ़ोतरी पर लगाम लगाने के मकसद से फेडरल रिजर्व ने इंट्रेस्ट रेट बढ़ा दिए। लेकिन नतीजे बहुत नकारात्मक रहे। ऊंची ब्याज दरों की वजह से कंस्ट्रक्शन और ऑटोमोबाइल जैसे सेक्टरों पर बहुत बुरा असर पड़ा। नतीजा ये हुआ कि प्रोडक्शन घट गया।

स्टॉक मार्केट में तेज गिरावट का दौर शुरू हो गया। निवेशकों का भरोसा डिग गया और 1929 में आखिरकार शेयर मार्केट का बुलबुला फूट गया। 24 अक्टूबर 1929 की तारीख ‘ब्लैक थर्सडे’ के तौर पर इतिहास के काले पन्नो में दर्ज हो गई। सितंबर के अपने पीक और नवंबर के अपने लो के बीच में अमेरिकी स्टॉक मार्केट 33 प्रतिशत तक गिर गया।

राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने खत्म किया टैरिफ वॉर

1932 के चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट की जीत हुई। उन्होंने अपने कैंपेन के दौरान टैरिफ घटाने और अर्थव्यवस्था को महासंकट से उबारने का वादा किया था। आखिरकार रूजवेल्ट प्रशासन ने 1934 में रेसिप्रोकल ट्रेड एग्रीमेंट एक्ट पास किया। इसके तहत टैरिफ घटाए गए।

क्या डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर वाली गलती दोहरा रहे?

डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में भी टैरिफ वॉर छेड़े थे लेकिन दूसरे कार्यकाल में उसे बहुत ही व्यापक कर दिया है। उन्होंने चीन पर 54 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया है। दोस्त भारत पर भी 26 प्रतिशत टैरिफ लगाया है। और तो और, श्रीलंका, म्यांमार, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया जैसे देशों में 44 प्रतिशत या उससे ज्यादा का रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया है। चीन समेत कई देशों ने जवाबी टैरिफ भी लगा दिया है। भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया जैसे देश जवाबी टैरिफ से बचते दिख रहे हैं।

टैरिफ वॉर का असर दुनियाभर के बाजारों पर देखने को मिल रहा है। मंदी की आशंका गहरा रही है। जेपी मोर्गन पहले ही भविष्यवाणी कर चुका है कि 60 प्रतिशत चांस है कि वैश्विक मंदी आएगी। वैसे वाइट हाउस का दावा है कि 50 से ज्यादा देशों ने अमेरिका के साथ टैरिफ पर बातचीत की पहल की है। यह स्वागत योग्य है। टैरिफ वॉर को कड़वी ‘दवा’ बता ट्रंप को भी लचीला रुख अपनाना होगा नहीं तो टैरिफ को लेकर उनकी जिद वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ अमेरिका के लिए भी बुरा सपना साबित हो सकती है।

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