नई दिल्ली। दुनिया की बढ़ती आबादी से शहरीकरण की रफ्तार बढ़ गई है. इससे खेती की जमीन कम होती जा रही है. प्राकृतिक आपदाएं भी उपजाऊ जमीनों को कम कर रहीं हैं. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में हर साल करीब 10 करोड़ हेक्टेयर खेती लायक जमीन बर्बाद हो जा रही है. अलग-अलग देशों में छिड़े युद्ध से भी कृषि योग्य जमीन घट रही है. अंतरराष्ट्रीय पत्रिका नेचर फूड ने हाल ही में इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है.
स्टडी रिपोर्ट बताती है कि साल 2000 से लेकर 2020 के बीच दुनिया के विभिन्न देशों में छिड़े जंग से करीब 2.49 लाख वर्ग किलोमीटर खेती की जमीन बर्बाद हो गई. खेती वाली इतनी जमीनों पर उगी फसलों से सालभर करीब 25.5 करोड़ लोगों का पेट भर सकता था. वहीं गौर करने वाली बात ये भी है कि साल 2020 के बाद भी रूस-यूक्रेन समेत कई देशों में संघर्ष जारी है. इससे खेती वाली जमीनों के नुकसान का दायरा और भी ज्यादा बढ़ सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के करीब 3% इलाके युद्ध क्षेत्र रहे. खास बात ये है कि इन्हीं 3% क्षेत्र में करीब 6% से भी ज्यादा खेती योग्य जमीनें मौजूद थीं. यहां अब केवल 3% ही खेती लायक जमीनें बची हैं. यानी करीब-करीब 3% खेती वाली जमीनें कम हो गईं. शांतिपूर्ण इलाकों से तुलना करने पर यह भी पता चला कि वहां अगर प्राकृतिक आपदा या अन्य कारणों से खेती की जमीन कुछ कम हो रही है तो युद्ध वाले इलाकों में 23.7% ज्यादा जमीनें कम हो रहीं हैं.
कुछ देशों में उपजाऊ जमीनों को ज्यादा नुकसान : नेचर की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां युद्ध से खेती योग्य जमीनों का ज्यादा नुकसान हुआ. पश्चिमी अफ्रीका, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों पर इसका घातक असर पड़ा. इसके अलावा जिन देशों में मजबूत कानून व्यवस्था रही, वहां जंग से खेती की जमीनों को पहुंचने वाले नुकसान को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया गया. यानी वहां नुकसान काफी कम हुआ.
जंग से एक इलाके में 14.5 हेक्टेयर जमीन का नुकसान : रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न देशों के जिन इलाकों में बार-बार तेज जंग छिड़ी वहां खेती की जमीन का ज्यादा नुकसान हुआ. जबकि जिन इलाकों में इस तरह के तनाव कम रहे, वहां खेती की जमीनों को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा. शोधकर्ताओं ने पाया कि जंग से प्रभावित एक इलाके में औसतन सालाना 14.5 हेक्टेयर खेती की जमीन बर्बाद हो गई. इन जमीनों पर फसलें उगाई जाती थीं.
क्यों कम हो रहीं जमीनें? : युद्ध की वजह से खेतों में बिछाई जाने वाली बारूदी सुरंगें और मोर्टार उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी परत को नष्ट कर देती हैं. इसके अलावा खेतों में मिसाइल, रॉकेट आदि गिरने पर खेती योग्य जमीन बेकार हो जाती है. युद्ध खत्म होने के बाद भी इन खेतों में ट्रैक्टर चलाना या यहां जाना खतरे से खाली नहीं रहता है. इससे किसानों को अपने खेत छोड़ने पड़ते हैं. कई जगह सिंचाई समेत अन्य इंतजाम भी ध्वस्त हो जाते हैं. इससे वहां दोबारा खेती करना मुश्किल हो जाता है.
सही प्रयास से खेतों को सुधारना संभव : खेती की जमीनों के नुकसान के बीच रिपोर्ट में राहत की बात का भी जिक्र है. बताया गया है कि जिन इलाकों में युद्ध पूरी तरह खत्म हो गए, वहां खेती की जमीनों को होने वाले नुकसान के आंकड़ों पर तत्काल रोक लग गई. यानी जंग के कारण नुकसान पहुंचने के बाद भी उपजाऊ जमीन पूरी तरह बंजर नहीं हो जाती है. यदि वहां की सरकारें और समाज के लोग मिलकर प्रयास करें तो खेतों को फिर से सुधारा जा सकता है. वहां फिर से हरियाली लाई जा सकती है.
तत्काल मदद देना काफी नहीं, सही प्लानिंग की भी जरूरत : रिपोर्ट के अनुसार युद्ध प्रभावित इलाकों में खेती की जमीनों को पहुंचे नुकसान पर केवल तत्काल मदद देना ही काफी नहीं है. बल्कि तमाम बिंदुओं पर सही प्लानिंग बननी चाहिए, और उन पर पूरी तरह अमल भी करना जरूरी है. खेतों को फिर से फसल उगाने लायक कैसे बनाया जाए, इस पर ठोस रणनीति की जरूरत होती है. इसके अलावा सिंचाई इंतजामों की जल्द मरम्मत आदि पर ध्यान देना चाहिए.
यूक्रेन में भी खेती वाली कई लाख हेक्टेयर जमीनें खाली : यूक्रेन दुनिया भर में गेहूं, मक्का और सूरजमुखी के तेल का सबसे बड़ा उत्पादक रहा है. काफी मात्रा में ये ये चीजें दूसरे देशों में भी जाती रहीं हैं. अमेरिकी थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) की रिपोर्ट बताती है कि युद्ध के कारण यूक्रेन को करीब 10 लाख हेक्टेयर खेती वाली जमीन का नुकसान हुआ है. अब इन जमीनों पर बारूदी सुरंगें बिछी हैं. पहले यहां लाखों टन अनाज पैदा होते थे.
दुनिया के 155 देशों पर आधारित है स्टडी : नेचर में प्रकाशित स्टडी रिपोर्ट चीन के विज्ञान अकादमी के इंस्टीट्यूट ऑफ जियोग्राफिक साइंसेज एंड नेचुरल रिसोर्सेज रिसर्च से जुड़ी है. इस संस्थान के रिसर्चर ने यह अध्ययन पूरा किया. युद्ध से खेती की जमीनों को पहुंचे नुकसान के आकलन के लिए टीम ने साल 2000 से लेकर 2020 तक के संघर्ष से प्रभावित 155 देशों का डेटा जुटाया. रिसर्चर ने 4.6 लाख से अधिक छोटे-बड़े युद्ध स्थलों का सैटेलाइट नक्शा तैयार किया.
हर साल कम हो रही 10 करोड़ हेक्टेयर खेती वाली जमीन : संयुक्त राष्ट्र की मरुस्थलीकरण रोकथाम संस्था UNCCD (United Nations Convention to Combat Desertification) के डेटा के अनुसार दुनियाभर में हर साल करीब 10 करोड़ हेक्टेयर उपजाऊ जमीन बंजर हो जा रही है. इसके पीछे का कारण रासायनिक खेती, पेड़ों का कटान, सूखा, बाढ़ आदि है. रिपोर्ट के अनुसार हर एक सेकेंड में 4 फुटबॉल मैदानों के बराबर जितनी जमीन अपनी गुणवत्ता खो देती है. अब तक दुनिया की कुल 40% भूमि पूरी तरह खराब हो चुकी है.
दुनिया की 1.5 अरब हेक्टेयर खराब जमीन को उपजाऊ बनाने का लक्ष्य : UNCCD के डेटा के अनुसार जमीनों के बंजर होने की रफ्तार अगर ऐसे ही जारी रही तो इसके परिणाम काफी नुकसानदायक होंगे. मौजूदा समय ही विश्व की कुल 1.5 अरब हेक्टेयर उपजाऊ जमीन खराब हो चुकी है. यह पूरी दुनिया की कुल जमीन का करीब 10% है. इसे ध्यान में रखते हुए साल 2030 तक इतनी ही बंजर जमीनों को फिर से उपजाऊ बनाकर उन्हें नया जीवन देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. विशेषज्ञों के अनुसार अभी इस काम में लगाए गए 95 रुपये भविष्य में अच्छी फसल, रोजगार और शुद्ध पानी के रूप में करीब 2,855 लाभ के साथ वापस लौटते हैं.
दुनिया की 4.8 अरब हेक्टेयर जमीन खेती योग्य : इसी साल जुलाई में जारी संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के डेटा के अनुसार पूरी दुनिया में करीब 4.8 अरब हेक्टेयर खेती योग्य जमीन है. यह विश्व की कुल जमीन का करीब 37% है. इनमें से 1.6 अरब हेक्टेयर पर गेहूं, धान और मक्का आदि फसलें उगाई जाती हैं. यहां हर साल करीब 3 अरब टन अनाज पैदा होता है. जबकि लगभग 3.2 अरब हेक्टेयर जमीन का उपयोग चारागाह के रूप में किया जाता है. इनमें घास के मैदान भी शामिल हैं.
विश्व के करीब 92.8 करोड़ लोग खेती से जुड़े : संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के डेटा के अनुसार दुनियाभर में लगभग 92.8 करोड़ लोग सीधे तौर पर खेती से जुड़े हैं. दुनियाभर के कुल रोजगार में इस सेक्टर की हिस्सेदारी 25 से 26% है. विश्व में कुल जितने भी लोग कृषि सेक्टर में जुड़े हैं. उसका सबसे बड़ा कार्यबल एशिया और अफ्रीका में है. विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक भारत में कुल कार्यबल का लगभग 42% हिस्सा आज भी कृषि पर निर्भर है. जबकि चीन में ऐसे लोगों की संख्या करीब 22% है. यानी जिन देशों में खेती की जमीनें कम हो रहीं हैं, वहां रोजगार का भी संकट हो सकता है.







